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कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: बंगाल में गोवंश वध पर पाबंदी रहेगी जारी, बकरीद से पहले सभी याचिकाएं खारिज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कोलकाता।
Published by: राकेश कुमार
Updated Thu, 21 May 2026 08:19 PM IST
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सार
कलकत्ता हाईकोर्ट का यह फैसला कानून व्यवस्था और प्रशासनिक नियमों को मजबूत करता है। कोर्ट ने साफ -साफ कहा है कि धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ पशु कल्याण के सरकारी नियमों का पालन करना भी जरूरी है। प्रशासन को नियमों को कड़ाई से लागू करने की खुली छूट दी गई है। अदालत ने बकरीद को लेकर क्या कहा है? जानिए...
हाईकोर्ट का बकरीद से पहले बड़ा फैसला
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार के आदेश में दखल देने से मना कर दिया है। सरकार ने बकरीद से पहले बड़े पशुओं के वध पर कुछ रोक लगाई थीं। मुख्य न्यायाधीश सुजय पॉल और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की बेंच ने इसके खिलाफ आई सभी याचिकाएं खारिज कर दी हैं। यह सरकारी नोटिस 13 मई को जारी हुआ था।
क्या हैं नए नियम और शर्तें?
कोर्ट ने कहा कि सरकार का यह फैसला साल 2018 के पुराने अदालती आदेश के मुताबिक ही है। इसलिए इस नोटिस पर रोक लगाने का कोई ठोस कारण नहीं है। नए नियमों के मुताबिक सांड, बैल, गाय, बछड़े और भैंस का वध आसानी से नहीं होगा। इसके लिए पहले डॉक्टरों से फिटनेस प्रमाण पत्र लेना होगा। प्रमाण पत्र में यह लिखा होना चाहिए कि पशु अब खेती या माल ढोने के लायक नहीं है। इसके बिना पशु का वध नहीं किया जा सकेगा। साथ ही, वध केवल सरकार से मान्यता प्राप्त बूचड़खानों में ही होगा। अधिकारियों को अवैध वध रोकने के लिए जांच करने का पूरा अधिकार दिया गया है।
यह भी पढ़ें: Bengal: 'मुस्लिम पति को हिंदू महिला को देना होगा भरण-पोषण', हाईकोर्ट ने बरकरार रखा मजिस्ट्रेट कोर्ट का फैसला
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हाईकोर्ट ने क्या-क्या कहा?
हाईकोर्ट ने सरकार से कहा कि वह प्रमाण पत्र देने के लिए एक अच्छी व्यवस्था बनाए। सरकार यह भी जांचे कि पूरे राज्य में इसके लिए पर्याप्त बूचड़खाने और जरूरी अधिकारी मौजूद हैं या नहीं। इस मामले में टीएमसी विधायक अखरुज्जामन ने भी याचिका लगाई थी। उनका कहना था कि बकरीद पर बकरे-भेड़ महंगे हो जाते हैं। ऐसे में गरीब परिवारों के लिए बड़े पशुओं की कुर्बानी आर्थिक रूप से आसान होती है। इसलिए सरकार को धार्मिक छूट देनी चाहिए थी।
'गाय की कुर्बानी इस्लाम धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं'
इस पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि गाय की कुर्बानी इस्लाम धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं है। कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया कि वह खुले और सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध रोकने के नियम भी इसमें जोड़े। चूंकि बकरीद 27 या 28 मई को है, इसलिए कोर्ट ने सरकार को छूट देने या न देने के मामले पर 24 घंटे में फैसला लेने को कहा है।
क्या हैं नए नियम और शर्तें?
कोर्ट ने कहा कि सरकार का यह फैसला साल 2018 के पुराने अदालती आदेश के मुताबिक ही है। इसलिए इस नोटिस पर रोक लगाने का कोई ठोस कारण नहीं है। नए नियमों के मुताबिक सांड, बैल, गाय, बछड़े और भैंस का वध आसानी से नहीं होगा। इसके लिए पहले डॉक्टरों से फिटनेस प्रमाण पत्र लेना होगा। प्रमाण पत्र में यह लिखा होना चाहिए कि पशु अब खेती या माल ढोने के लायक नहीं है। इसके बिना पशु का वध नहीं किया जा सकेगा। साथ ही, वध केवल सरकार से मान्यता प्राप्त बूचड़खानों में ही होगा। अधिकारियों को अवैध वध रोकने के लिए जांच करने का पूरा अधिकार दिया गया है।
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हाईकोर्ट ने क्या-क्या कहा?
हाईकोर्ट ने सरकार से कहा कि वह प्रमाण पत्र देने के लिए एक अच्छी व्यवस्था बनाए। सरकार यह भी जांचे कि पूरे राज्य में इसके लिए पर्याप्त बूचड़खाने और जरूरी अधिकारी मौजूद हैं या नहीं। इस मामले में टीएमसी विधायक अखरुज्जामन ने भी याचिका लगाई थी। उनका कहना था कि बकरीद पर बकरे-भेड़ महंगे हो जाते हैं। ऐसे में गरीब परिवारों के लिए बड़े पशुओं की कुर्बानी आर्थिक रूप से आसान होती है। इसलिए सरकार को धार्मिक छूट देनी चाहिए थी।
'गाय की कुर्बानी इस्लाम धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं'
इस पर अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि गाय की कुर्बानी इस्लाम धर्म का कोई अनिवार्य हिस्सा नहीं है। कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया कि वह खुले और सार्वजनिक स्थानों पर पशु वध रोकने के नियम भी इसमें जोड़े। चूंकि बकरीद 27 या 28 मई को है, इसलिए कोर्ट ने सरकार को छूट देने या न देने के मामले पर 24 घंटे में फैसला लेने को कहा है।