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कलकत्ता हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: क्या पत्नी का पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना भी दहेज? अदालत ने किया स्पष्ट

Wed, 08 Jul 2026 11:07 AM IST
Asmita Tripathi न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: Asmita Tripathi Updated Wed, 08 Jul 2026 11:07 AM IST
सार

कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी की है। कोर्ट का कहना है कि पत्नी का पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना उसका कानूनी अधिकार है, लेकिन अगर यह मांग पति के दबाव में की जाए तो इसे दहेज की मांग माना जा सकता है। 

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Calcutta High Court Does a wife claiming a share in ancestral property amount to a dowry demand?
कलकत्ता हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई पत्नी अपने पति के दबाव में पैतृक संपत्ति में अपने वैध हिस्से की मांग करती है, तो यह दहेज की मांग के बराबर हो सकती है।

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कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायमूर्ति अरिजीत बनर्जी और न्यायमूर्ति अपूर्बा सिन्हा राय की खंडपीठ ने दहेज हत्या के मामले में पति की सजा के खिलाफ अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए यह टिप्पणी की। 2 जुलाई के फैसले में न्यायालय ने कहा कि एक महिला पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से का दावा करने की कानूनी रूप से हकदार है, लेकिन अगर यह दावा पति के दबाव के कारण किया जाता है तो यह दहेज की मांग के दायरे में आएगा।

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क्या है पूरा मामला?
यह मामला एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी की मौत से जुड़ा है, जो जून 2014 में, महिला की शादी के लगभग चार साल बाद, वैवाहिक घर में फांसी पर लटकी हुई पाई गई थीं। निचली अदालत ने पाया कि महिला ने आत्महत्या की थी और आत्महत्या करने से पहले अपनी बेटी की भी हत्या कर दी थी। अदालत ने पति और उसके माता-पिता को क्रूरता और दहेज हत्या का दोषी पाया। पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। वहीं,  सास-ससुर को सात साल की कैद की सजा दी गई।

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आरोपी पति ने क्या तर्क दिया? 
उच्च न्यायालय के समक्ष पति ने यह तर्क दिया कि दहेज की मांग का कोई सबूत नहीं था। महिला ने केवल अपनी पैतृक संपत्ति में अपना कानूनी हिस्सा मांगा था। हालांकि, अदालत ने गौर किया कि सबूतों से पता चलता है कि महिला के भाई ने पहले परिवार की पुश्तैनी संपत्ति का कुछ हिस्सा बेचकर उसे बिक्री से मिले राशि में से उसका हिस्सा दे दिया था।


दहेज की मांग कब होती है?
अदालत ने पाया कि इसके बाद भी पति लगातार महिला पर दबाव डालता रहा कि वह अपने भाई से बाकी पुश्तैनी संपत्ति बेचने और उसके हिस्से की राशि सौंपने के लिए कहे। न्यायालय ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि स्वतंत्र गवाहों की अनुपस्थिति से अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर होता है। न्यायालय ने कहा कि दहेज की मांग आमतौर पर वैवाहिक घर की चारदीवारी के भीतर ही की जाती है, न कि बाहरी लोगों की उपस्थिति में।

पति ने यह भी तर्क दिया था कि घटना के दो दिन बाद दर्ज की गई प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) अविश्वसनीय थी क्योंकि शिकायतकर्ता (मृत महिला के बड़े भाई) ने इसे दर्ज करने से पहले वकीलों से सलाह ली थी। इस दलील को खारिज करते हुए, उच्च न्यायालय ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने में देरी से अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर नहीं होता है।

एफआईआर दर्ज करने में देरी पर कोर्ट ने क्या कहा?
न्यायालय ने कहा 'जब किसी की बहन और उसके नवजात शिशु की अचानक मृत्यु जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटित होती है, तो इससे करीबी रिश्तेदार स्तब्ध और अवाक रह जाते हैं। वे अनिर्णय की स्थिति में आ जाते हैं। हमारी राय में, इस तरह की देरी अभियोजन पक्ष के मामले को कोई  झटका नहीं दे सकती। इसके अलावा, ऐसी स्थिति में कानूनी सलाह लेना वास्तविक शिकायतकर्ता की ओर से सबसे तर्कसंगत कदम है। 

सास-ससुर हुए बरी
हालांकि, अदालत को सास-ससुर के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं मिला, क्योंकि शिकायतकर्ता ने मुकदमे के दौरान उन्हें दोषी नहीं ठहराया और किसी अन्य गवाह ने विशेष रूप से उन्हें कोई भूमिका नहीं सौंपी। न्यायालय ने सास-ससुर को सभी आरोपों से बरी कर दिया। वहीं, पति की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए उसकी आजीवन कारावास की सजा को घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया। न्यायालय ने टिप्पणी की कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304बी (दहेज हत्या) के तहत आजीवन कारावास का प्रावधान दुर्लभ मामलों के लिए ही होना चाहिए।

 

 

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