Explainer: क्या प्रदर्शनकारियों पर चलाई जा सकती है AK-47, किन हथियारों से किया जा सकता है भीड़ पर नियंत्रण?
जंतर-मंतर और सीवान में प्रदर्शकारियों पर घातक हथियारों के इस्तेमाल की घटनाओं के बाद सवाल उठ रहे हैं कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षा बल किस हद तक बल प्रयोग कर सकते हैं। आइए जानते हैं कि भारतीय कानून, सरकारी नियम और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार भीड़ नियंत्रण में हथियारों के इस्तेमाल की क्या सीमा तय है।
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विस्तार
इन घटनाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस या सुरक्षा बल किस तरह का हथियार इस्तेमाल कर सकते हैं? भारतीय कानून उन्हें क्या अधिकार देता है? सरकार की एसओपी क्या कहती है और संयुक्त राष्ट्र के नियम क्या हैं? आइए समझते हैं।
क्या है पूरा मामला?
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट मुद्दे को लेकर आयोजित 'संसद चलो' मार्च के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई थी। इसके बाद विपक्ष ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया गया। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाते हुए सरकार से जवाब मांगा और एक घायल प्रदर्शनकारी को मीडिया के सामने पेश किया। सोशल मीडिया पर भी कई ऐसे वीडियो सामने आए, जिनमें प्रदर्शनकारियों ने पैलेट से घायल होने का दावा किया।
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार, संसद मार्ग थाने की जनरल डायरी में दर्ज एक आधिकारिक रिकॉर्ड से पता चला है कि भीड़ को नियंत्रित करने के दौरान रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) ने कई तरह के कम-घातक दंगारोधी हथियारों का इस्तेमाल किया था। रिकॉर्ड के मुताबिक, 22 जुलाई को दोपहर 1:24 बजे आरएएफ के एक डिप्टी कमांडेंट की सूचना पर दर्ज एंट्री में बताया गया है कि जंतर-मंतर के जोन-1 में दिल्ली पुलिस के एक डीसीपी के निर्देश पर 55 नॉन-इलेक्ट्रिकल शेल, 15 इलेक्ट्रिकल शेल, पांच टियर स्मोक ग्रेनेड, एंटी-रायट गन से दो राउंड और प्लास्टिक पेलेट के दो राउंड दागे गए थे।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने कहा है कि उसने पैलेट गन का इस्तेमाल नहीं किया। पुलिस का कहना है कि दंगारोधी कार्रवाई केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) की रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) ने की थी। वहीं, पीटीआई के अनुसार सामने आए पुलिस रिकॉर्ड में प्लास्टिक पेलेट के दो राउंड चलाए जाने का उल्लेख है।
इसी बीच बिहार के सीवान में 25 जुलाई को छात्रों के प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी का कथित तौर पर एके-47 का इस्तेमाल करते वीडियो वायरल हो गया। इसके बाद संबंधित पुलिसकर्मी को निलंबित कर जांच शुरू कर दी गई। पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के दौरान किसी तरह की गोली नहीं चलाई गई थी।
भीड़ नियंत्रण को लेकर भारतीय कानून क्या कहता है?
भीड़ को नियंत्रित करने के नियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के अध्याय-11 (सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखना) में दिए गए हैं। इसमें धारा 148 से 150 तक यह बताया गया है कि पुलिस और सशस्त्र बल कब और कैसे कार्रवाई कर सकते हैं।
धारा 148: सबसे पहले भीड़ को हटने का आदेश दिया जाता है
अगर किसी भीड़ से सार्वजनिक शांति भंग होने की आशंका हो या वह गैरकानूनी जमावड़ा हो, तो कार्यपालक मजिस्ट्रेट, थाना प्रभारी (एसएचओ) या सब-इंस्पेक्टर (SI) अथवा उससे ऊपर रैंक का पुलिस अधिकारी उस भीड़ को तितर-बितर होने का आदेश दे सकता है। इसके बाद भीड़ का कानूनी दायित्व होता है कि वह वहां से हट जाए।
अगर आदेश के बाद भी भीड़ नहीं हटती या उसके व्यवहार से यह साफ हो कि वह हटने वाली नहीं है, तभी पुलिस बल का इस्तेमाल कर सकती है। जरूरत पड़ने पर लोगों को गिरफ्तार भी किया जा सकता है। यानी कानून सीधे बल प्रयोग की अनुमति नहीं देता, बल्कि पहले चेतावनी और आदेश देने की प्रक्रिया तय करता है।
धारा 149: कब ली जा सकती है सशस्त्र बलों की मदद?
अगर पुलिस के लिए भीड़ को नियंत्रित करना संभव न हो और सार्वजनिक सुरक्षा को गंभीर खतरा हो, तभी जिला मजिस्ट्रेट या उनके द्वारा अधिकृत कार्यपालक मजिस्ट्रेट सशस्त्र बलों की मदद ले सकते हैं। इसके बाद सशस्त्र बल भीड़ को हटाने और जरूरत पड़ने पर लोगों को हिरासत में लेने में सहायता कर सकते हैं, लेकिन कानून यहां भी साफ कहता है कि कार्रवाई के दौरान जितना जरूरी हो उतना ही बल इस्तेमाल किया जाए और लोगों व संपत्ति को कम से कम नुकसान पहुंचे।
धारा 150: कब सशस्त्र बल खुद कार्रवाई कर सकते हैं?
अगर कोई ऐसी आपात स्थिति हो जहां सार्वजनिक सुरक्षा को तत्काल खतरा हो और किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट से संपर्क करना संभव न हो, तब सशस्त्र बल का कोई कमीशंड या गजटेड अधिकारी अपने स्तर पर भीड़ को हटाने की कार्रवाई कर सकता है। हालांकि जैसे ही मजिस्ट्रेट से संपर्क संभव हो जाता है, आगे की कार्रवाई उसी के निर्देशों के अनुसार करनी होती है। यानी यह अधिकार केवल असाधारण परिस्थितियों के लिए है।
क्या बीएनएसएस में एके-47 या घातक हथियारों के इस्तेमाल की अनुमति दी गई है?
नहीं। बीएनएसएस की धारा 148 से 150 में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एके-47 या किसी अन्य घातक हथियार का इस्तेमाल किया जा सकता है। कानून केवल यह बताता है कि कब बल प्रयोग किया जा सकता है और उसका सिद्धांत क्या होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कार्रवाई के दौरान न्यूनतम आवश्यक बल का ही इस्तेमाल होना चाहिए।
क्या भीड़ पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया जा सकता है?
2016 में पैलेट गन से लोगों के घायल होने की घटनाओं के बाद केंद्र सरकार ने एक विशेषज्ञ समिति बनाई थी ताकि इसके विकल्प तलाशे जा सकें। सरकार ने संसद में बताया था कि हिंसक और गैरकानूनी भीड़ को हटाने के लिए सबसे पहले कम घातक साधनों का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें शामिल हैं,
- PAVA (चिली) शेल और ग्रेनेड
- STUN-LAC शेल और ग्रेनेड
- टियर स्मोक शेल
- रबर बुलेट
- प्लास्टिक बुलेट
सरकार के अनुसार पैलेट गन का इस्तेमाल केवल अत्यंत गंभीर कानून-व्यवस्था की स्थिति में और तय मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत किया जाता है। सरकार ने यह भी बताया है कि सुरक्षाकर्मियों को कम घातक हथियारों के इस्तेमाल के लिए विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है। इसमें दंगा नियंत्रण, हथियारों के सुरक्षित इस्तेमाल और अलग-अलग परिस्थितियों में बल प्रयोग का अभ्यास शामिल होता है।
क्या विरोध प्रदर्शन करना मौलिक अधिकार है?
भारत में विरोध प्रदर्शन करना संविधान से मिला अधिकार है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है। वहीं अनुच्छेद 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार देता है। इसी आधार पर लोग सरकार के फैसलों के खिलाफ प्रदर्शन या धरना दे सकते हैं।
हालांकि, यह अधिकार पूर्ण नहीं है। अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के अनुसार अगर सार्वजनिक व्यवस्था, देश की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता या शांति व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका हो तो सरकार इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगा सकती है। यानी संविधान शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देता है, लेकिन हिंसा, तोड़फोड़ या कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की नहीं।
अंतरराष्ट्रीय नियम क्या कहते हैं?
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार सरकारों को ऐसे नियम बनाने चाहिए जिनमें बल और हथियारों के इस्तेमाल की स्पष्ट व्यवस्था हो। साथ ही पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के पास पर्याप्त संख्या में कम घातक हथियार और सुरक्षा उपकरण होने चाहिए ताकि आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल अंतिम विकल्प रहे।
- यूएन के अनुसार, पुलिस और सुरक्षा बलों को सबसे पहले बातचीत, चेतावनी और दूसरे अहिंसक तरीकों से स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश करनी चाहिए।
- अगर ये तरीके सफल नहीं होते और बल प्रयोग अपरिहार्य हो जाता है, तभी बल का इस्तेमाल किया जा सकता है।
- उस स्थिति में भी बल का प्रयोग संयमित, स्थिति के अनुरूप और न्यूनतम होना चाहिए।
- कार्रवाई के दौरान मानव जीवन की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
- घायलों को तुरंत चिकित्सा सहायता दी जानी चाहिए और घटना की रिपोर्ट वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी जानी चाहिए।
जान लेने वाले हथियारों का इस्तेमाल किस स्थिति में करने का नियम?
यूएन के नियम यह भी कहते हैं कि आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल केवल तब किया जा सकता है जब किसी व्यक्ति के जीवन पर तत्काल खतरा हो, आत्मरक्षा करनी हो, किसी अन्य व्यक्ति की जान बचानी हो या ऐसे गंभीर अपराध को रोकना हो जिसमें किसी की जान जाने का खतरा हो। जान लेने वाली गोली केवल अंतिम विकल्प हो सकती है।
अगर कोई भीड़ गैरकानूनी है, लेकिन हिंसक नहीं है, तो बल प्रयोग से बचना चाहिए। अगर बल प्रयोग करना जरूरी हो जाए, तो वह न्यूनतम होना चाहिए। वहीं हिंसक भीड़ की स्थिति में भी आग्नेयास्त्रों का इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब उससे कम खतरनाक सभी उपाय विफल हो जाएं और तब भी उतना ही बल प्रयोग किया जाए, जितना बिल्कुल आवश्यक हो।