Bihar: राष्ट्रीय स्तर के छह दिग्गज नेताओं का भविष्य दांव पर, इनमें प्रत्याशी केवल एक; ऐसा है बांकीपुर का रण
Bankipur Election 2026 : राजनीतिक रूप से देश के सबसे उर्वर राज्य बिहार में केवल एक सीट पर उप चुनाव हो रहा है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले छह दिग्गज नेताओं की प्रतिष्ठा-भविष्य दांव पर है। खास बात यह कि इनमें केवल एक प्रत्याशी है।
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बिहार में उप-चुनाव हो रहा है, लेकिन माहौल आम चुनाव वाला है। राज्य या देश के किसी कोने से कोई भी सोमवार को पटना आया हो, तो उसे यह शिद्दत से महसूस हुआ होगा। पिछले 10-15 दिनों में केंद्र सहित राज्य के दिग्गज नेताओं को लोगों ने पटना की सड़कों पर खाक छानते देखा। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, राष्ट्रीय जनता दल के मौजूदा निर्णायक तेजस्वी यादव को रोड शो में, जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर को सभा और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को लंबे समय बाद वीडियो संदेश के रूप में देखा गया। 30 जुलाई को होने वाले चुनाव के लिए इनमें से केवल प्रशांत किशोर चुनावी मैदान में हैं, लेकिन देश स्तर पर नामी बाकी पांच नेताओं की प्रतिष्ठा भी दांव पर है। सभी अपने प्रत्याशी का नाम ले रहे हैं, लेकिन चर्चा इन्हीं की चल रही है। कैसे-क्यों? समझते हैं एक-एक नाम के साथ।
सबसे पहले जानें, प्रत्याशी कौन-कौन मैदान में
बांकीपुर विधानसभा उप चुनाव में कुल 25 प्रत्याशी मैदान में हैं। कुल 57 नामांकन दाखिल हुए थे, जिनमें भाजपा के अभिषेक बंटी ने नाम वापस लेकर सुर्खियां हासिल की थी। इसके अलावा तेज प्रताप यादव की पार्टी जनशक्ति जनता दल प्रत्याशी वीणा मांडवी नामांकन के बाद गिरफ्तार होकर चर्चित हुई थीं और बाद में तकनीकी कारणों से उनका पर्चा रद्द हो गया था। कुल 25 प्रत्याशियों में सबसे ज्यादा चर्चित नाम जन सुराज के प्रमुख प्रशांत किशोर का है। उसके बाद दूसरा चर्चित नाम पिछली बार इस सीट से नितिन नवीन से मुकाबिल होकर हारीं रेखा कुमारी गुप्ता का है। वह कांग्रेस से ऐन मौके पर राजद में आकर पिछले चुनाव में प्रत्याशी बनी थीं। इस बार भी राजद ने उन्हें मौका दिया। तीसरा नाम नीरज कुमार सिन्हा का है। यह नाम चर्चा में इसलिए आया, क्योंकि अभिषेक बंटी ने नामांकन के बाद नाम वापसी की घोषणा की और तब भाजपा ने तत्काल नीरज कुमार सिन्हा को अपना प्रत्याशी घोषित किया था। इनके अलावा, एक नाम और है तनवीर आलम। यह पशुपति कुमार पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के प्रत्याशी हैं। इन चार नामों के अलावा, कुल 21 नाम और हैं जो ईवीएम पर नजर आएंगे। इनमें आठ निर्दलीय और बाकी छोटे दलों के हैं।
विश्व के सबसे बड़े राजनीतिक दल के अध्यक्ष की प्रतिष्ठा दांव पर
नितिन नवीन। अगर बांकीपुर उप चुनाव में सबसे बड़ी प्रतिष्ठा का सवाल है तो वह नितिन नवीन का ही नाम है। इस क्षेत्र से 31 साल पहले नवीन किशोर सिन्हा ने भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की थी। तब इसका नाम पटना पश्चिम विधानसभा क्षेत्र था। यह सीट उसके बाद 2005 में उनके जीवन के अंतिम चुनाव तक उनके पास रही। इस सीट पर उनके जनाधार का आलम यह था कि उनकी जीत के अंतर जितने वोट भी दूसरे को हासिल नहीं हुए थे। 2005 के अंत में दिल्ली में उनकी रहस्यमयी मौत हुई तो अगले साल उप चुनाव में बेटे नितिन नवीन ने भाजपा से चुनाव जीता। दो साल बाद परिसीमन में सीट का नाम बांकीपुर हुआ तो भी विधायक कभी नहीं बदला। 2025 के विधानसभा चुनाव तक वह लगातार जीते और फिर भाजपा अध्यक्ष बनने के बाद राज्यसभा चले गए। इसी से यह सीट खाली हुई। अब यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की छोड़ी सीट है। 31 साल से भाजपा के अभेद्य किले वाली सीट है। दिवंगत नवीन किशोर सिन्हा की विरासत वाली सीट है। इसलिए, नितिन नवीन की प्रतिष्ठा यहां दांव पर है। यही कारण है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के बावजूद वह लगातार इस सीट पर प्रचार के लिए आ रहे हैं। प्रत्याशी उनके क्षेत्र का सामान्य कार्यकर्ता रहा है तो इस बार वह उसके लिए जी-जान लगा रहे हैं। प्रचार खत्म होने के अंतिम समय तक वह मैदान में हैं। कल जनसंपर्क और फिर वोट डालने के लिए भी वह रहेंगे।
नरेंद्र मोदी का पीएम बनाने का दावा करने वाले खुद मैदान में
प्रशांत किशोर। खुद को 'किंग मेकर' से नवाजने वाले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बिहार विधानसभा चुनाव में जन सुराज की अंतिम सूची तक अपना नाम घोषित नहीं किया, लेकिन यह एलान जरूर किया था कि अगर जनता दल यूनाईटेड को 25 सीटें भी आ गईं तो वह राजनीति से संन्यास ले लेंगे। लेकिन, बांकीपुर उप चुनाव में वह उतरे हैं। न केवल उतरे हैं, बल्कि जीत के लिए दावा भी कर रहे हैं और माहौल तो निश्चित रूप से बना दिया है। नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का श्रेय लेने वाले प्रशांत किशोर जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष तक रह चुके हैं। अपनी पार्टी के एलान के बाद यह पहला मौका है, जब वह चुनाव मैदान में हैं। वह जीतने में कामयाब रहे तो राजनीतिक भविष्य बन जाएगा और हार गए तो यह कहते सुने जाएंगे कि उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सभी नेताओं को बांकीपुर में उतरने के लिए मजबूर कर दिया।
लोगों का गुस्सा न दिख जाए, इसलिए सम्राट की प्रतिष्ठा का सवाल भी
नवंबर में जनादेश पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बने थे। अप्रैल में भाजपा ने यहां पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाया। राजद मूल से आठ-नौ साल पहले भाजपा में आए सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के अंदर बिहार में कुर्सी हस्तांतरण यह पहली बार हुआ। सबसे बड़ी कुर्सी से नीतीश कुमार के उतरने और सम्राट चौधरी के बैठने को लेकर बिहार में अलग-अलग तरह का संदेश था। प्रशांत किशोर मैदान में आए तो उसी बात को हवा देने में पूरी ताकत झोंकी। लोगों को नीतीश के प्रति सद्भाव और सम्राट के प्रति दुर्भाव जगाने में पीके ने कोई कसर नहीं छोड़ी। जन सुराज समर्थकों ने ऐसे वीडियोज़ भी शेयर किए। राजद ने भी इसी तरह का प्रयास किया। ऐसे में, अब वह संदेश बेकार जाए और सम्राट चौधरी की सहज स्वीकार्यता साबित हो- इसके लिए बांकीपुर में भाजपा की जीत जरूरी है। यही कारण है कि सम्राट चौधरी की प्रतिष्ठा भी फंसी हुई है। वह भी इस सीट पर मेहनत करते दिख रहे हैं। रोड शो में भी भाजपा अध्यक्ष के साथ थे। बाकी सभाएं भी करते दिखे।
लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव। खुद भी किंग रहे और बिहार से लेकर केंद्र तक 'किंग मेकर' की भूमिका निभाने वाले लालू प्रसाद यादव ने अपनी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल की कमान एक तरह से छोटे बेटे तेजस्वी यादव को सौंप दी है। वह 2022 से लगातार इस प्रयास में हैं कि तेजस्वी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दें। लेकिन, 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव ने उनकी हसरतों पर न केवल पानी फेरा, बल्कि मिट्टी में मिला दिया। बांकीपुर उप चुनाव एक तरह से राजद के लिए रिकवरी का मौका लेकर आया। यही कारण है कि उसने कायस्थ बहुल सीट पर इस जाति के कई दावेदार रहते हुए भी कांग्रेस को मौका नहीं दिया। नितिन नवीन से बुरी तरह हारीं रेखा कुमारी गुप्ता को इस बार फिर मैदान में उतारा। लेकिन, फिर रिकवरी के मौके को सामने देखते हुए भी तेजस्वी यादव विदेश चले गए। प्रचार खत्म होने तक नहीं आते तो यह मैसेज हर तरफ था कि 'युवराज गायब' है, लेकिन मंगलवार शाम प्रचार थमने से पहले सोमवार को उन्होंने राजद प्रत्याशी रेखा गुप्ता को मैदान में वापस लाने के लिए पूरी ताकत झोंकी। रोड शो के जरिए संदेश दिया। मंगलवार को भी वह सड़क पर रहे।
जनता दल यूनाईटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार को क्यों उतरना पड़ा?
यह सीट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की एकता दिखाने के लिए भी जरूरी है। राजग में भाजपा के बाद सबसे बड़ी भूमिका जनता दल यूनाईटेड की है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर राज्यसभा सांसद बने थे। इसलिए उन्हें कुर्सी से उतारा गया था- यह मैसेज तोड़ने के लिए ही जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा, दोनों उप मुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी और बिजेंद्र प्रसाद यादव सहित पूरी पार्टी बांकीपुर में मेहनत करती दिखी। अंत में, चुनाव प्रचार खत्म होने से पहले नीतीश कुमार खुद उतरे। उन्होंने वीडियो जारी कर बांकीपुर में भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार सिन्हा को जिताने की अपील की। मतलब, एनडीए में एकजुटता है और भाजपा के सबसे बड़े सहयोगी जदयू को परेशानी नहीं- यह दिखाने के लिए नीतीश कुमार को खुद उतरना पड़ा।