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केंद्र ने नहीं माना अनुसूचित जाति आयोग का कोई सुझाव, यूपी में सबसे ज्यादा होते हैं दलितों पर अत्याचार

अमित शर्मा, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Fri, 02 Oct 2020 05:34 PM IST
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सार

  • एनसीआरबी की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में देश में दलितों पर अत्याचार की 45,935 घटनाएं घटीं, यूपी में सबसे ज्यादा 11,829 मामले
  • कमीशन ने दलितों पर हिंसा की घटनाओं की जांच के लिए एक महीने, ट्रायल के लिए दो महीने का समय निश्चित करने का दिया था सुझाव

Center did not accept any suggestion of scheduled caste commission, given advised for fast track hearing in special court
Protest against UP govt - फोटो : PTI
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विस्तार

एनसीआरबी की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2019 में देश में दलितों पर अत्याचार की 45,935 घटनाएं घटीं। इनमें उन्हें जातिसूचक शब्दों से अपमानित करने के साथ-साथ हत्या, दुष्कर्म और अपहरण करने तक के मामले शामिल हैं। दलितों पर अत्याचार की ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने 2016-17 में केंद्र सरकार को कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। लेकिन केंद्र ने इन सुझावों में किसी एक पर भी अभी तक अमल नहीं किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कमीशन की सलाह पर कुछ ठोस कदम उठाए गए होते तो दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में काफी हद तक कमी लाई जा सकती थी।

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राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (National Commission For Scheduled Castes, NCSC) की वर्ष 2016-17 की रिपोर्ट में कहा गया है कि दलितों पर अत्याचार की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए ऐसे मामलों की त्वरित जांच की जानी चाहिए। ऐसे मामलों की जांच के लिए अधिकतम 30 दिन और ट्रायल पूरा करने के लिए अधिकतम दो महीने का समय दिया जाना चाहिए। दलितों के मामलों की सुनवाई के लिए हर जिले में विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों का गठन किया जाना चाहिए और जितना संभव हो, ऐसे मामलों की रोजाना आधार पर सुनवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
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कमीशन का सुझाव था कि इन मामलों की सुनवाई में लगे वकीलों को केस पूरा होने तक कोई दूसरा केस नहीं दिया जाना चाहिए। सरकारी अभियोजन पक्ष को तब तक दूसरा केस नहीं सौंपा जाना चाहिए, जब तक कि वे अपने पहले केस की सुनवाई पूरी कर उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा देते। इसके लिए पब्लिक प्रोसेक्यूटर्स को विशेष ट्रेनिंग देने की बात भी कही गई थी। कमीशन का मानना था कि ऐसा करने पर सरकारी वकील मामलों पर पूरी गहराई से काम कर सकेगे और पीड़ितों को न्याय दिला सकेंगे।

केंद्र सरकार को उक्त सुझाव देने वाले कमीशन के चेयरमैन पीएल पूनिया ने अमर उजाला को बताया कि दलितों पर अत्याचार की घटनाओं को तब तक नहीं रोका जा सकता, जब तक कि ऐसे मामलों की फास्ट ट्रैक आधार पर सुनवाई कर अपराधियों को जल्द से जल्द जेल नहीं पहुंचाया जाता। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में पीड़ित परिवारों को तत्काल मदद भी उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार दलितों को न्याय देने के लिए उचित कदम नहीं उठा रही है। सरकार की लापरवाही का आलम यह है कि पिछले चार महीनों से राष्ट्रीय अनुसूचित आयोग के चेयरमैन का पद रिक्त पड़ा हुआ है, लेकिन इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं की गई है।

यहां हुए सबसे ज्यादा अपराध

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में उत्तरप्रदेश में दलितों पर अत्याचार की सबसे ज्यादा 11,829 घटनाएं घटीं। इसके बाद राजस्थान मेंं 6794, बिहार में 6544, मध्यप्रदेश में 5300, महाराष्ट्र में 2150, आंध्र प्रदेश में 2071, ओडिशा में 1886 और गुजरात में 1416 घटनाएं घटीं। दलितों पर अत्याचार की कुल घटनाएं उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा घटी हैं, लेकिन प्रति लाख की आबादी के आधार पर राजस्थान में सबसे ज्यादा (55.6) घटनाएं घटी हैं।

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