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24 अकबर रोड की कहानी: म्यांमार की पूर्व राष्ट्रपति का बचपन यहीं बीता, सबसे बुरे दौर में बना कांग्रेस का ठिकाना

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Wed, 25 Mar 2026 04:09 PM IST
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सार

सरकार ने कांग्रेस को 24 अकबर रोड स्थित अपना दफ्तर 28 मार्च तक खाली करने का निर्देश दिया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार, विभाग ने इस संबंध में औपचारिक आदेश जारी कर दिया है। कांग्रेस ने 48 वर्षों तक यहां से पार्टी के कामकाज देखे हैं। हालांकि, इस साल की शुरुआत में अपना मुख्यालय 9ए कोटला मार्ग शिफ्ट कर दिया। इसके बावजूद पार्टी अभी भी अकबर रोड स्थित कार्यालय में कई अहम बैठकें आयोजित करती है। 

24 Akbar Road Congress Headquarters Indira Gandhi Tenure to Mallikarjun Kharge Delhi Estate Dept explained
24 अकबर रोड में कांग्रेस मुख्यालय का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

सरकार के अंतर्गत आने वाले संपदा विभाग ने कांग्रेस को उसके मुख्यालय 24 अकबर रोड को खाली करने का नोटिस दिया है। कांग्रेस को 28 मार्च तक यह दफ्तर खाली करना होगा। पिछले साल ही पार्टी ने कोटला मार्ग पर स्थित इंदिरा भवन में अपने नए मुख्यालय का अनावरण किया था। हालांकि, इसके बावजूद 24 अकबर रोड स्थित दफ्तर खाली नहीं किया गया। माना जा रहा है कि दिल्ली सरकार के इस कदम के बाद राजनीतिक स्तर पर वाद-विवाद की स्थिति बन सकती है।  
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर 24 अकबर रोड का इतिहास क्या है? इसके निर्माण से लेकर इसके राजनयिकों के लिए आवंटित किए जाने की क्या कहानी है? कैसे यह भवन कांग्रेस के पास आया और इसके बाद पार्टी के लिए इतिहास लिखने वाला मुख्यालय बन गया? इसे लेकर कांग्रेस को अब क्यों नोटिस जारी किया गया है? आइये विस्तार से जानते हैं...
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क्या है 24 अकबर रोड के निर्माण का इतिहास?

आज नई दिल्ली में जिस भवन को 24 अकबर रोड के नाम से जाना जाता है, उसका निर्माण अंग्रेजों के शासनकाल में हुआ था। इसके वास्तुकार सर एडविन लुटियंस थे, जिन्हें आधुनिक दिल्ली के आर्किटेक्ट के तौर पर जाना जाता है। एडविन लुटियंस राष्ट्रपति भवन (तब वायसरॉय हाउस), कर्तव्य पथ (तब किंग्स-वे) और अन्य कई ऐतिहासिक इमारतों के निर्माण में शामिल थे। सबसे खास बात यह है कि दिल्ली के केंद्रीय इलाके में जो 26 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है और जहां बड़ी हस्तियों के सरकारी आवास मौजूद हैं, उनमें से अधिकतर क्षेत्र को एडविन लुटियंस ने ही आकार दिया था। इस वजह से दिल्ली के इस बड़े इलाके को लुटियंस दिल्ली कहा जाने लगा। 

लुटियंस ने 1911 और 1925 के बीच 24 अकबर रोड पर स्थित बंगले का निर्माण कराया। यह लुटियंस दिल्ली के मध्य में स्थित एक टाइप-VII बंगला है। इस बंगले को ब्रिटिश औपनिवेशिक वास्तुकला और नई आधुनिक शैली के मिश्रण का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। अपने शुरुआती दिनों में, इस बंगले में पांच बेडरूम (जिसमें बहुत कम फर्नीचर), एक लिविंग और डाइनिंग हॉल, एक गेस्ट रूम और कुछ आउटहाउस शामिल थे। 

कभी नाम था बर्मा हाउस, आंग सान सू की का बचपन यहीं बीता 

  • शुरुआती दिनों में यह बंगला वायसरॉय लॉर्ड लिनलिथगाओ की कार्यकारी परिषद के सदस्य सर रेजिनाल्ड मैक्सवेल का निवास स्थान हुआ करता था। 
  • भारत की स्वतंत्रता और अंग्रेजी शासन की विदाई के साथ इसे म्यांमार (तब बर्मा) की राजदूत डाओ खिन की के आधिकारिक आवास के तौर पर आवंटित किया गया।
  • खिन की के विशेष दर्जे के सम्मान में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस बंगले को बर्मा हाउस का नाम दिया था। 

डॉ. खिन की बेटी का नाम आंग सान सू की है, जो कि आगे चलकर नोबेल विजेता और म्यांमार की राष्ट्रप्रमुख बनीं। सू की की आत्मकथा लिखने वाले जस्टिन विंटल ने अपनी किताब- द परफेक्ट हॉस्टेज में बताया था कि 1961 में डॉ. खिन की जब अपने परिवार के साथ 24 अकबर रोड स्थित आवास में रह रही थीं, तब आंग सान सू की ने भी एक किशोरी के रूप में यहां अपना समय बिताया। पत्रकार और लेखक राशिद किदवई की किताब- 24 अकबर रोड के मुताबिक, इसी बंगले में आंग सान सू की ने जापानी पुष्प सज्जा कला- इकेबाना सीखी और इसके बड़े बगीचों में वे संजय और राजीव गांधी के साथ खेला करती थीं।

कैसे कांग्रेस की हुई इस बंगले में एंट्री?

24 अकबर रोड कांग्रेस के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि यही वह बंगला था जो कांग्रेस के मुश्किल दौर में उसका केंद्र बना और फिर यहीं से कांग्रेस ने अपनी बंपर वापसी की पटकथा लिखी। 

1. इंदिरा के कार्यकाल में दो बार बदले कांग्रेस के मुख्यालय
इंदिरा गांधी के 1958 में कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद 1959 में कांग्रेस को अपने दफ्तर के तौर पर 7, जंतर मंतर स्थित बंगला आवंटित हुआ। हालांकि, 1969 में जब कांग्रेस में बिखराव हुआ तो मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली कांग्रेस (ओ) ने 7, जंतर मंतर पर नियंत्रण हासिल कर लिया। 1971 में कांग्रेस ने 5, राजेंद्र प्रसाद रोड को अपने नए मुख्यालय के तौर पर स्थापित कर लिया। 

 

आपातकाल के बाद दूसरी बार कांग्रेस का मुख्यालय बदला। दरअसल, 1977 में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस की जबरदस्त हार हुई। इसके बाद बाबू जगजीवन राम ने पार्टी का विभाजन करा लिया और 5, राजेंद्र प्रसाद रोड का मुख्यालय भी इंदिरा गांधी की कांग्रेस के पास नहीं बचा। यह वह दौर था, जब कांग्रेस मुख्यालय के बिना चलने वाली पार्टी बन गई थी। इमरजेंसी के बाद स्थिति इतनी खराब थी कि गांधी परिवार को चुनाव में हार मिल चुकी थी और खुद इंदिरा गांधी के पास आधिकारिक आवास नहीं था। 

पार्टी के वफादार नेता मोहम्मद यूनुस ने इस वक्त अपने 12, विलिंगडन क्रीसेंट स्थित बंगला गांधी परिवार को निजी इस्तेमाल के लिए दे दिया। उस दौर में यह बंगला इंदिरा, राजीव और उनकी पत्नी सोनिया गांधी, बच्चे- राहुल गांधी और प्रियंका गांधी का आवास बना। इसी घर में संजय गांधी और मेनका गांधी भी रहने लगे। हालांकि, इसका असर यह हुआ कि पारिवारिक आवास बनने की वजह से 12, विलिंगडन क्रीसेंट में कांग्रेस की कोई बैठक नहीं हो पाती थी। 

2. जब 'मंदिर जैसे माहौल' की वजह से नेताओं ने नकारा कमलापति त्रिपाठी का घर
इसी दौर में इंदिरा गांधी के वफादार नेता बूटा सिंह और अन्य सहयोगियों ने नए कार्यालय के लिए बंगले की तलाश शुरू की। शुरुआत में उन्होंने सांसद मारगथम चंद्रशेखर और उत्तर प्रदेश के दिग्गज नेता कमलापति त्रिपाठी के आवासों पर विचार किया। हालांकि, त्रिपाठी के घर को दफ्तर बनाने का विचार इसलिए छोड़ दिया गया, क्योंकि वहां रोजाना घंटों तक हवन होता था, और एपी शर्मा जैसे नेताओं ने कहा कि वे इस तरह के मंदिर जैसे माहौल में काम नहीं कर सकते।

3. ...और फिर कांग्रेस ने एक ओपन हाउस को बनाया अपना मुख्यालय
इसके बाद बूटा सिंह ने 24 अकबर रोड को चुना, जो उस समय आंध्र प्रदेश के राज्यसभा सांसद जी. वेंकटस्वामी को आवंटित था। वेंकटस्वामी का यह बैचलर निवास पहले से ही युवा कांग्रेस के नेताओं के लिए आराम करने और मनोरंजक गतिविधियों के लिए एक ओपन हाउस की तरह इस्तेमाल होता था। ऐसे समय में जब कई कांग्रेस नेताओं ने तत्कालीन सत्ताधारी जनता पार्टी के डर से इंदिरा गांधी से दूरी बना ली थी, तब जी. वेंकटस्वामी ने इंदिरा गांधी का साथ चुना और अपना यह आधिकारिक निवास पार्टी को दे दिया। 

आखिरकार जनवरी 1978 की एक सर्द सुबह, इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के लगभग 20 कार्यकर्ताओं की एक टीम ने इस बंगले में पहली बार प्रवेश किया। बूटा सिंह जैसे नेता इस बंगले में शिफ्ट हो गए और इसी के साथ 24 अकबर रोड आधिकारिक रूप से कांग्रेस का नया मुख्यालय बन गया।

इंदिरा-राजीव-नरसिम्हा राव और मनमोहन की जीत का गवाह 

1. आपातकाल के बाद बना बिखरी कांग्रेस का केंद्र
24 अकबर रोड के इसी मुख्यालय से काम करते हुए इंदिरा गांधी ने अपनी राजनीतिक रणनीति तैयार की और पार्टी को फिर से मजबूत किया। 24 अकबर रोड को अपना ठिकाना बनाने के मात्र दो साल बाद ही 1980 के आम चुनावों में इंदिरा गांधी ने शानदार वापसी की और सत्ता में लौटकर प्रधानमंत्री की कुर्सी दोबारा हासिल की। 

1980 में उनकी इस ऐतिहासिक वापसी के बाद से ही 24 अकबर रोड का यह दफ्तर आधिकारिक रूप से कांग्रेस पार्टी की पहचान बन गया। यह दिलचस्प है कि इंदिरा गांधी ने जिस 24 अकबर रोड को अपना नया ठिकाना बनाया, वह इंटेलिजेंस ब्यूरो (आईबी) की राजनीतिक निगरानी इकाई के ठीक सामने स्थित था। इंदिरा गांधी का आवास 1 सफदरजंग रोड इस दफ्तर से सिर्फ 2 किलोमीटर दूर था।  

 

2. राजीव गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक के नेतृत्व का गवाह बना यह बंगला
24 अकबर रोड का यह बंगला कांग्रेस के सात अध्यक्षों के कार्यकाल और पार्टी के लिए सत्ता के स्वर्णिम युग का गवाह भी बना। 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने। इसके बाद हुए चुनाव में कांग्रेस ने रिकॉर्डतोड़ जीत दर्ज की। 1991 की पीवी. नरसिम्हा राव सरकार हो या  2004 और 2009 की मनमोहन सिंह की सरकार सभी के दौर में यह बंगला कांग्रेस की रणनीतिक व्यूह रचना का केंद्र रहा। 

24 अकबर रोड की एक सबसे बड़ी रणनीतिक खासियत यह थी कि यह एक छोटे दरवाजे के जरिए यह 10 जनपथ से जुड़ा हुआ था, जो पहले यूथ कांग्रेस का दफ्तर था और बाद में सोनिया गांधी का आवास बन गया। एक-दूसरे से सटे होने की वजह से इन दोनों परिसरों ने मिलकर दशकों तक कांग्रेस के पावरहाउस यानी सत्ता के केंद्र के रूप में काम किया।  

विवादों से भी जुड़ा कांग्रेस का यह पावरहाउस

इस मुख्यालय ने कांग्रेस के कई नाटकीय और विवादित पल भी देखे हैं। 

1. पीवी. नरसिम्हा राव के पार्थिव शरीर को नहीं मिला प्रवेश: इस मुख्यालय से जुड़ा एक बड़ा और ऐतिहासिक विवाद 2004 में पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के निधन के समय हुआ था। निधन के बाद उनके पार्थिव शरीर को 24 अकबर रोड के परिसर के अंदर ले जाने की अनुमति नहीं दी गई थी। उनका शव वाहन बाहर ही खड़ा रखा गया था, जहां से लोगों ने उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि दी। कांग्रेस के दिग्गज नेताओं- नटवर सिंह और केवी थॉमस ने अपनी किताबों में इसका कारण सोनिया गांधी और राव के बीच की कड़वाहट को बताया, क्योंकि सोनिया गांधी राजीव गांधी हत्याकांड (1991) की जांच की धीमी गति से राव से नाराज थीं।

2. सीताराम केसरी से अध्यक्ष पद छिनने का घटनाक्रम: 1990 के दशक में कांग्रेस की चुनावों में हार के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब कई शीर्ष नेताओं ने सोनिया गांधी को पार्टी का अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को हटाने का दबाव बनाया जाने लगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 24 अकबर रोड स्थित कार्यालय में ही कई नेताओं ने पहले सीताराम केसरी को अध्यक्ष पद छोड़ने के लिए मनाने की कोशिश की। हालांकि, जब वे नहीं माने तो 14 मार्च 1998 को सीडब्ल्यूसी की बैठक में उन्हें हटाकर सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाया गया। बताया जाता है कि इस दौरान पार्टी मुख्यालय में उनकी नेमप्लेट फेंकने की घटना हुई और यहां तक कि खुद उनके साथ कथित तौर पर बदसलूकी की गई।

3. अवैध निर्माण और नियमों का उल्लंघन:  बीते वर्षों में 24 अकबर रोड परिसर में अतिरिक्त कमरों और आउटहाउस के निर्माण के कई चरण देखे गए। वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई की किताब में बताया गया है कि शुरुआत में इस बंगले में केवल आठ कमरे थे, जिन्हें बढ़ाकर 34 कमरों तक कर दिया गया। लुटियंस बंगला जोन में किए गए ये अधिकांश निर्माण आधिकारिक नियमों का खुला उल्लंघन थे और इन्हें अवैध रूप से बनाया गया था। हालांकि, लगातार आने वाली सरकारों ने इन अवैध निर्माणों की ओर से आंखें मूंदे रखीं।

और बंगला खाली करने का नोटिस

जनवरी 2025 में कांग्रेस ने कोटला मार्ग पर इंदिरा गांधी भवन के नाम से अपना नया दफ्तर शुरू कर दिया। पार्टी के नेताओं की योजना थी कि वे 24 अकबर रोड को नहीं छोड़ेंगे और इसका इस्तेमाल हाई-प्रोफाइल बैठकों के लिए करेंगे। पार्टी के कुछ नेताओं ने इसके पीछे तर्क दिया कि भाजपा ने भी अपना पुराना कार्यालय नहीं छोड़ा है। 

हालांकि, नया कार्यालय बन जाने के बावजूद बंगले को खाली न करने पर संपदा विभाग ने अब कांग्रेस को एक नोटिस जारी किया है, जिसमें 28 मार्च तक 24 अकबर रोड का दफ्तर खाली करने का निर्देश दिया गया है। इस बेदखली नोटिस को लेकर कांग्रेस के नेताओं में काफी आक्रोश है।

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