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चंद्रशेखर आजाद पुण्यतिथि: 'दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे..आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे'

Tue, 27 Feb 2018 03:03 PM IST
ऋतुराज त्रिपाठी, अमर उजाला, नई दिल्ली
ऋतुराज त्रिपाठी, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Tue, 27 Feb 2018 03:03 PM IST
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chandra shekhar azad famous dialogue in hindi remember freedom fighter on death anniversary
chandra shekhar azad
भारत के इतिहास में आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है, भारत को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की आज पुण्यतिथि है। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में अंग्रेजों से लड़ते हुए वह शहीद हो गए थे। आज भी अंग्रेज 'आजाद' का नाम बहुत सम्मान से लिया करते हैं। 
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चंद्रशेखर आजाद ने कसम खाई थी कि चाहें कुछ भी हो जाए लेकिन वह जिंदा अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे। इसलिए जब 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों ने इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में उन्हें चारों तरफ से घेर लिया था तो उन्होंने अकेले ही ब्रिटिश सैनिकों से मुकाबला किया। जब उनकी रिवाल्वर में आखिरी गोली बची तो उन्होंने खुद पर ही गोली चला दी, जिससे वह जिंदा न पकड़े जाएं। आजाद को डर था कि अगर वह जिंदा पकड़े गए तो अंग्रेजी हुकूमत को जड़ से मिटाने का उनका सपना अधूरा रह जाएगा।
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दरअसल 'आजाद' अल्फ्रेड पार्क में भगत सिंह को जेल से निकालने समेत कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपने साथियों के साथ बैठक कर रहे थे लेकिन तभी उन्हें खबर लगी कि अंग्रेजों ने पार्क को चारों तरफ से घेर लिया है। आजाद ने अंग्रेजों से अकेले ही मुकाबला करते हुए अपने साथियों को पार्क से बाहर निकाल दिया, जिससे भारत की आजादी के लिए बनाई उनकी योजनाओं पर कोई प्रभाव न पड़े। जब उनकी रिवाल्वर में आखिरी गोली बची तो उन्होंने अंग्रेजों के हाथ आने की वजाय खुद के जीवन को खत्म करना चुना और उस आखिरी गोली से अपना जीवन खत्म कर दिया। 
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चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा गांव में हुआ था। उनका पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था। देश के लिए उनके बलिदान को देखते हुए उनके गांव का नाम आजादपुरा रख दिया गया है। 1922 में आजाद की मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई जिसके बाद उनका जीवन ही बदल गया और उन्होंने देश को अंग्रजों से आजाद करवाने की कसम खाई। उनके नाम से अंग्रेजी हुकूमत थर-थर कांपा करती थी।


ब्रिटिश सरकार ने एक बार उन्हें बचपन में 15 कोड़ों की सजा दी थी, तब आजाद ने कसम खाई थी कि वह दोबारा पुलिस के हाथ कभी नहीं आएंगे। वह अक्सर गुनगुनाया करते थे...'दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे..आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे'। काकोरी कांड में भी जब सभी क्रांतिकारी पकड़े गए थे, तब भी चंद्रशेखर आजाद को कोई नहीं पकड़ सका था। 


चंद्रशेखर आजाद द्वारा लिखी कविता आज भी उनके बलिदान की गाथा कहती है। 

'मां हम विदा हो जाते हैं, हम विजय केतु फहराने आज,
तेरी बलिवेदी पर चढ़कर मां, निज शीश कटाने आज।
 
मलिन वेष ये आंसू कैसे, कंपित होता है क्यों गात? 
वीर प्रसूति क्यों रोती है, जब लग खंग हमारे हाथ।
 
धरा शीघ्र ही धसक जाएगी, टूट जाएंगे न झुके तार,
विश्व कांपता रह जाएगा, होगी मां जब रण हुंकार।
 
नृत्य करेगी रण प्रांगण में, फिर-फिर खंग हमारी आज,
अरि शिर गिराकर यही कहेंगे, भारत भूमि तुम्हारी आज।
 
अभी शमशीर कातिल ने, न ली थी अपने हाथों में।
हजारों सिर पुकार उठे, कहो दरकार कितने हैं।।'    
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