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Ladakh: जिंदगी और मौत के बीच के फासले के साक्षी रहे हैं चीता और चीतल, क्या ध्रुव बन पाएगा जवानों की लाइफलाइन?
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Indian Army
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Amar Ujala
विस्तार
आम लोगों को इस बात की जानकारी शायद ही हो कि भारतीय सेना के पास मौजूद चीता और चीतल हेलीकॉप्टर का रिकॉर्ड है कि वे लगभग 25 हजार फीट तक उड़ान भरने की क्षमता रखते हैं। ये दोनों की हेलीकॉप्टर दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धक्षेत्र सियाचिन में तैनात जवानों की लाइफलाइन रहे हैं। कई बार, चीता और चीतल ही जिंदगी और मौत के बीच के फासले के साक्षी भी रहे हैं। लेकिन अब ये दोनों ही हेलीकॉप्टर अब पुराने पड़ चुके हैं और सेना इन्हें रिप्लेस करने की तैयारी कर रही है।
इनकी जगह धीरे-धीरे लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर (LUH) ध्रुव ले रहे हैं, जो न केवल चीता और चीतल के मुकाबले दमदार हैं, बल्कि लॉजिस्टिक के लिहाज से देखा जाए, तो उनमें ज्यादा जगह भी है। लेकिन भारतीय सेना के पास ध्रुव जितनी संख्या में होने चाहिए, वह काफी नहीं हैं, वह और लाइट यूटिलिटी हेलीकॉप्टर्स की बाट जोह रही है।
लामा बना चीता
1968 में, भारतीय वायु सेना ने फ्रांस की सुद-एविएशन (बाद में एरोस्पेशियल) को हाई एल्टीट्यूड इलाकों में उड़ान भरने के लिए हेलीकॉप्टरों का अनुरोध भेजा था। जिसके 1969 में लामा नाम वाले SA 315B हेलीकॉप्टर ने अपनी पहली उड़ान भरी थी और 1971 में ऑपरेशनल सर्विस में शामिल हुआ। 1971 में भारत ने लामा के लिए एक बड़ा ऑर्डर दिया गया। भारत में बना पहला लामा, जिसका नाम बदलकर चीता रखा गया, उसने 1972 में उड़ान भरनी शुरू की। लामा ने 1972 में 12,442 मीटर (40,814 फीट) की ऊंचाई का रिकॉर्ड बनाया, जिसे अभी तक तोड़ा नहीं जा सका है। वहीं पूरी तरह से भारत में बने पहले भारतीय हेलीकॉप्टर चीता ने 1976 में उड़ान भरी। सिंगल इंजन और पांच सीटों वाला चीता मल्टीपर्पज हेलीकॉप्टर है, जो स्लिंग पर लोड के साथ-साथ स्ट्रेचर पर घायलों को भी ले जा सकता है।
चीतल की रेंज 640 किलोमीटर
वहीं, बाद में चीता बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) ने चीता का नया वर्जन चीतल डेवलप किया, जिसमें टर्बोमेका का एम2 इंजन लगा था। चीतल की रेंज 640 किलोमीटर है और यह 3.5 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकता है। वहीं इसका एक ऑर्मर्ड वर्जन लांसर भी आता है, जिसमें वीपन पॉड लगे हैं। हर पॉड में 12.7 एमएम की गन और 700 एमएम के 3 रॉकेट लगे हैं। लेकिन रेंज 290 किलोमीटर और इनकी उड़ान क्षमता 2.5 घंटे की है। चीतल को मल्टीरोल हेलीकॉप्टर कहा जाता है, जो ट्रांसपोर्ट, राहत एवं बचाव कार्यों, टोही और हवाई सर्वेक्षण, सैन्य हवाई सहायता और अंडर स्लंग ऑपरेशनों में अहम भूमिका निभाता है।
लोकसभा चुनावों में भरी 80 घंटे उड़ान
लेह में आर्मी एविएशन ब्रिगेड की कमान संभाल रहे ब्रिगेडियर गुरदीप सिंह ने बताया कि हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों में सुदूर इलाकों तक पहुंचने में ध्रुव का इस्तेमाल किया गया। ध्रुव के जरिए ईवीएम पहुंचाई गईं और मतदान अधिकारियों को उनके गंतव्य जगहों तक पहुंचाया गया। वह बताते हैं कि चुनाव के दौरान जांस्कर इलाके में उन्होंने वहां मौजूद पोलिंग सेंटरों तक मतदान कर्मियों, सुरक्षा कर्मियों और ईवीएम पहुंचाने के लिए 80 घंटे की उड़ान भरी थी। बता दें कि आर्मी एविएशन के पास लेह, मिसामारी और जोधपुर में तीन ब्रिगेड हैं। इनके पास लगभग 190 चीता, चेतक और चीतल हेलीकॉप्टर, 145 एएलएच ध्रुव और इसका आर्मर्ड वर्जन 75 रुद्र हेलीकॉप्टर के अलावा 25 एएलएच एमके-III हैं। वहीं सेना के पास इस समय 190 चीता, चेतक और चीतल हैं, जिनमें से 70 फीसदी 30 साल से ज्यादा पुराने हो चुके हैं।
जहां ध्रुव नहीं कारगर, वहां चीतल पर भरोसा
भले ही आज के समय में चीता और चीतल दोनों पुराने पड़ चुके हैं और भारतीय सेना इनके विकल्प के तौर पर ध्रुव का इस्तेमाल कर रही है। लेकिन सियाचिन में कई ऐसे इलाके हैं, जहां ध्रुव नहीं पहुंच पाता है या लैंडिंग में दिक्कत आती है, वहां चीतल बेहद आसानी से लैंड कर जाता है। यानी कि संकरी जगहों पर भी चीतल को लैंडिंग में दिक्कत नहीं होती है। सूत्र का कहना है कि अगर चीतल पुराने नहीं पड़ते तो आज भी इन पर आंख मूंद कर भरोसा किया जा सकता है। इनकी मैंटेनेंस भी आसान है और एक-एक पुर्जा खोल कर फिर से असेंबल किया जा सकता है। सूत्रों के मुताबिक भारतीय सेना को चीता और चीतल को रिप्लेस करने के लिए 225 एलयूएच की जरूरत है और 110 एलयूएच के लिए बातचीत चल रही है। जिसके बाद ही सेना में शामिल होंगे, जिसमें अभी वक्त लग सकता है।
23,000 फीट पर चीतल ने की लैंडिंग
लेह में एएलएच, चीतल का संचालन करने वाली आर्मी एविएशन ब्रिगेड के अधिकारी और तकनीशियनों ने बताया कि ये हेलीकॉप्टर लद्दाख में चीन औऱ पाकिस्तान से लगी फॉरवर्ड लोकेशंस में राशन सप्लाई, घायलों और बीमार लोगों को अस्पताल पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। हेलीकॉप्टर्स की मेंटेनेंस विभाग के प्रमुख कोर ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड मैकेनिकल इंजीनियर्स (ईएमई) के मेजर आयुष देवलियाल ने अमर उजाला को बताया कि जहां चीता में एमके1 इंजन लगा है, तो इसके एडवांस वर्जन चीतल में एम2 इंजन है। वहीं, चीतल के नाम 23,000 फीट की ऊंचाई पर उतरने का रिकॉर्ड है।
लद्दाख में रात में उड़ान भरने में कई मुश्किलें
एएलएच स्क्वाड्रन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल रणदीप पठानिया ने बताया कि लद्दाख का इलाका बाकी जगहों से काफी अलग है। यहां ग्लेशियर औऱ बर्फीली चोटियां हैं और यह इलाका हाई एल्टीट्यूड से घिरा हुआ है। यहां हालात बेहद चुनौतीपूर्ण और कठिन हैं। इसलिए यहां मशीन के साथ उसकी मेंटेनेंस को भी समझने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि स्वदेश में बने एएलएच ध्रुव का इस्तेमाल नाइट ऑपरेशंस के साथ हाई एल्टीट्यूड में भी जमकर किया जा रहा है। वहीं चीतल हेलीकॉप्टर के पायलट मेजर अमरेंद्र ने बताया कि लद्दाख में रात में उड़ान भरने में कई मुश्किलें का सामना करना पड़ता है। रात में गहराई का अंदाजा कम हो जाता है। वहीं रात में हवाओं की रफ्तार बढ़ जाती है, जिससे हेलीकॉप्टर के ऑपरेशंस पर असर पड़ता है।