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Hindi News ›   India News ›   Chief Ministers of BJP originating from Other Parties Samrat Choudhary Pema Khandu Himanta Biswa Sarma & more

BJP के बाहरी CM: सम्राट चौधरी ही नहीं, इन राज्यों में भी दूसरे दलों से आए चेहरों को भाजपा ने बनाया मुख्यमंत्री

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Wed, 15 Apr 2026 04:18 PM IST
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सार

बिहार में सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। इसके साथ ही अब बिहार में पहली बार भाजपा का सीएम बना है। हालांकि, सम्राट चौधरी हमेशा से ही भाजपा से नहीं जुड़े थे। उनके चुनावी करियर की शुरुआत राजद से हुई थी। इसी तरह कुछ और राज्यों में भाजपा के मुख्यमंत्रियों का इतिहास उठाकर देखा जाए तो सामने आता है कि शीर्ष पद पर पहुंचे नेता शुरुआत से ही पार्टी का हिस्सा नहीं रहे। इसके उदाहरण पूर्वोत्तर से लेकर दूर दक्षिण तक मौजूद हैं। आइये जानते हैं भाजपा के ऐसे ही 'बाहरी' मुख्यमंत्रियों के बारे में...

Chief Ministers of BJP originating from Other Parties Samrat Choudhary Pema Khandu Himanta Biswa Sarma & more
वो नेता जो मुख्यमंत्री बने, पर दूसरी पार्टियों से भाजपा में आकर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

बिहार में सम्राट चौधरी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली है। वे भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं। सम्राट चौधरी का राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और जदयू से भी जुड़ाव रहा है। सम्राट चौधरी उर्फ राकेश कुमार ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत राजद से ही की थी। वह इस पार्टी से कई मर्तबा चुनाव भी लड़े। हालांकि, जीत-हार के बीच उन्होंने नीतीश कुमार की जनता दल-यूनाइटेड (जदयू) से होते हुए भाजपा का दामन थाम लिया। 
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भाजपा की राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ी पहचान उसे एक बड़ा समर्थक और नेतृत्व आधार देती है। इसी के चलते पार्टी ने कई राज्यों में ऐसे नेताओं को मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया है, जिनकी संगठन में शुरुआत से ही अच्छी पकड़ रही। हालांकि, अब कई राज्यों में भाजपा ने दूसरे दलों से शुरुआत करने वाले नेताओं को भी शीर्ष पद पर मौका दिया है। बिहार इस कड़ी में नया नाम बन गया है। आइये जानते हैं ऐसे ही नेताओं के बारे में...
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1. अर्जुन मुंडा
अर्जुन मुंडा ने 1980 के दशक की शुरुआत में राजनीतिक जीवन में कदम रखा। उन्होंने झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) की ओर चलाए गए झारखंड आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। उन्हें राज्य में आदिवासियों की आवाज उठाने वाले नेता के तौर पर पहचान मिली। 1995 में वे झामुमो के टिकट पर खरसावां क्षेत्र से बिहार विधानसभा के लिए चुने गए। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने झारखंड को एक अलग राज्य बनाने के वादे का पुरजोर समर्थन किया था। झारखंड के मुद्दे पर एनडीए की नीतियों पर विश्वास करते हुए उन्होंने झामुमो छोड़कर भाजपा का दामन थाम लिया। 

साल 2000 के विधानसभा चुनाव में वे भाजपा के टिकट पर खरसावां से फिर से बिहार विधानसभा के लिए चुने गए। 15 नवंबर 2000 को झारखंड एक नया राज्य बना, तब अर्जुन मुंडा बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व वाली पहली एनडीए गठबंधन सरकार में आदिवासी कल्याण मंत्री बने। 2003 में सिर्फ 35 वर्ष की उम्र में अर्जुन मुंडा  पहली बार झारखंड के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद भी उन्होंने कई बार राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभाला, जिसमें 12 मार्च 2005 से 14 सितंबर 2006 तक और 11 सितंबर 2010 से 8 जनवरी 2013 तक का कार्यकाल शामिल है।

2. गेगॉन्ग अपांग
गेगॉन्ग अपांग ने जेएन कॉलेज, पासीघाट से पढ़ाई पूरी करने के बाद 1972 से 1975 के बीच कांग्रेस प्रदेश परिषद के सदस्य के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 1978 में वे राज्य की पहली विधानसभा के लिए चुने गए और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) व कृषि मंत्री नियुक्त किए गए। 

18 जनवरी 1980 को गेगॉन्ग अपांग पहली बार अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उस समय वे मात्र 34 वर्ष के थे और यह पद संभालने वाले सबसे युवा नेताओं में से एक थे। वे 1999 तक लगातार इस पद पर रहे। इसी दौरान 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी. नरसिम्हा राव के साथ चकमा-हजोंग आदिवासियों के निर्वासन के मुद्दे पर मतभेदों के बाद, उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और अरुणाचल कांग्रेस नाम की अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना ली। बाद में 1999 में कांग्रेस पार्टी में विभाजन के बाद लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के कारण उन्हें मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।

2003 में अपांग को उनकी अरुणाचल कांग्रेस और अन्य दलों के नए गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का नेता चुना गया। इसके कुछ ही महीनों बाद, अगस्त 2003 में गेगॉन्ग अपांग अपने समर्थक विधायकों के साथ औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। अपांग के पार्टी में शामिल होने से 60 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा विधायकों की कुल संख्या 42 हो गई और इस तरह अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर भारत का पहला राज्य बन गया, जहां भाजपा की सरकार बनी। अपांग इस सरकार में भाजपा के मुख्यमंत्री रहे।



हालांकि, यह साथ लंबा नहीं चला और 2004 के आम चुनावों में एनडीए गठबंधन की हार के कुछ महीने बाद ही, अपांग वापस कांग्रेस में लौट गए। अक्तूबर 2004 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बहुमत मिला और अपांग एक बार फिर से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे। वे 9 अप्रैल 2007 तक इस पद पर रहे, जब तक कि दोरजी खांडू के नेतृत्व में कांग्रेस विधायकों ने उनके खिलाफ बगावत नहीं कर दी। 

गेगॉन्ग अपांग को सिक्किम के पवन कुमार चामलिंग, पश्चिम बंगाल के ज्योति बसु और ओडिशा के नवीन पटनायक के बाद भारत के चौथे सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले मुख्यमंत्री के रूप में जाना जाता है। 2014 के चुनावों से ठीक पहले वे कांग्रेस छोड़कर फिर से भाजपा में शामिल हुए और बाद में 2019 में उन्होंने भाजपा भी छोड़ दी और जनता दल (सेक्युलर) का दामन थाम लिया। 

3. सर्वनांद सोनोवाल
सर्वानंद सोनोवाल ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी। वे 1992 से 1999 तक असम के सबसे पुराने छात्र संगठन ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (एएएसयू) के अध्यक्ष और 1996 से 2000 तक नॉर्थ ईस्ट स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन (एनईएसओ) के अध्यक्ष रहे। इसके बाद वे असम गण परिषद (एजीपी) में शामिल हो गए। 2001 में वे मोरान क्षेत्र से पहली बार विधायक चुने गए और 2004 में डिब्रूगढ़ निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा सांसद बने। 

8 फरवरी 2011 को भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी और अन्य वरिष्ठ नेताओं की उपस्थिति में सोनोवाल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए। 2012 में उन्हें असम भाजपा का प्रदेशाध्यक्ष नियुक्त किया गया। 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी का नेतृत्व किया और लखीमपुर से चुनाव जीतकर केंद्र की मोदी सरकार में मंत्री बने।

28 जनवरी 2016 को भाजपा संसदीय बोर्ड ने सर्वानंद सोनोवाल को 2016 के असम विधानसभा चुनावों के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। 19 मई 2016 को उन्होंने माजुली निर्वाचन क्षेत्र से विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की और 24 मई 2016 को असम के 14वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। इसके साथ ही वे असम में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बने।

 

4. हिमंत बिस्व सरमा
हिमंत बिस्व सरमा ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र राजनीति से की थी और वे तीन बार कॉटन कॉलेज स्टूडेंट्स यूनियन के महासचिव चुने गए थे। साल 2001 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर जालुकबारी निर्वाचन क्षेत्र से असम विधानसभा का चुनाव जीतकर मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखा। इसके बाद वे 2006 और 2011 में भी लगातार कांग्रेस विधायक चुने गए। 2002 से 2014 तक तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में उन्होंने कृषि, योजना और विकास, वित्त, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे कई अहम मंत्रालयों का कार्यभार संभाला।

23 अगस्त 2015 को सरमा भाजपा में शामिल हो गए। 2016 के चुनाव में जीत के बाद वे सर्वानंद सोनोवाल के नेतृत्व वाली (पूर्वोत्तर भारत की पहली) भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री बने और उन्हें वित्त, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे प्रमुख विभाग सौंपे गए। मई 2021 में असम में नई सरकार के गठन को लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ दिल्ली में उनकी और तत्कालीन मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल की कई दौर की बैठकें हुईं। 9 मई 2021 को सोनोवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और विधायक दल के नेता के रूप में हिमंत बिस्व सरमा के नाम का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद उन्हें सर्वसम्मति से भाजपा विधायक दल का नेता चुन लिया गया। इसके बाद 10 मई 2021 को हिमंत बिस्व सरमा ने असम के 15वें मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली और राज्य की कमान संभाली।

5. एन. बीरेन सिंह
एन. बीरेन सिंह ने अपने करियर की शुरुआत सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) में एक फुटबॉलर और उसके बाद एक पत्रकार के रूप में की। 2002 में उन्होंने राजनीति में कदम रखा और डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी (डीआरपीपी) के उम्मीदवार के तौर पर हिंगांग निर्वाचन क्षेत्र से पहली बार मणिपुर विधानसभा के लिए चुने गए। 2003 में वे कांग्रेस में शामिल हो गए और मई 2003 में राज्य सरकार में मंत्री बने। 2007 में उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर फिर से जीत हासिल की और उन्हें सिंचाई-बाढ़ नियंत्रण और युवा मामले एवं खेल मंत्री बनाया गया। 2012 में भी उन्होंने लगातार तीसरी बार अपनी विधानसभा सीट बरकरार रखी। 

अक्तूबर 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ बगावत करने के बाद, बीरेन सिंह ने मणिपुर विधानसभा और मणिपुर प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एमपीसीसी) से इस्तीफा दे दिया। 17 अक्तूबर 2016 को वे औपचारिक रूप से भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा में शामिल होने के बाद उन्हें पार्टी का प्रवक्ता और मणिपुर भाजपा की चुनाव प्रबंधन समिति का सह-संयोजक बनाया गया। 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में बीरेन सिंह ने भाजपा के टिकट पर हिंगांग विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीता। मार्च 2017 में उन्हें भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया। इसके बाद, नागा पीपुल्स फ्रंट, नेशनल पीपुल्स पार्टी और लोक जनशक्ति पार्टी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार का नेतृत्व करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।  

6. पेमा खांडू
पेमा खांडू अरुणाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दोरजी खांडू के सबसे बड़े बेटे हैं। उन्होंने 2005 में अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव और 2010 में तवांग जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। अपने पिता के निधन के बाद, उन्हें नबाम तुकी की राज्य सरकार में जल संसाधन विकास और पर्यटन के लिए कैबिनेट मंत्री बनाया गया। 2011 में वे इंडियन नेशनल कांग्रेस के टिकट पर मुक्तो निर्वाचन क्षेत्र से निर्विरोध उपचुनाव जीते और 2014 के चुनावों में भी इसी सीट से निर्विरोध चुने गए।

16 जुलाई 2016 को नबाम तुकी की जगह उन्हें कांग्रेस विधायक दल का नेता चुना गया और 17 जुलाई 2016 को मात्र 36 वर्ष की उम्र में उन्होंने कांग्रेस की तरफ से अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। मुख्यमंत्री बनने के कुछ ही महीनों बाद, 16 सितंबर 2016 को मुख्यमंत्री पेमा खांडू के नेतृत्व में 43 विधायकों ने कांग्रेस पार्टी छोड़ दी और वे भाजपा की सहयोगी पार्टी पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में शामिल हो गए।

दिसंबर 2016 में पीपीए ने खांडू और छह अन्य विधायकों को पार्टी से निलंबित कर दिया और उनकी जगह किसी और को मुख्यमंत्री बनाने की कोशिश की। इसी बीच एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम हुआ और दिसंबर 2016 में ही पेमा खांडू ने पीपीए के 43 में से 33 विधायकों के साथ भाजपा का दामन थाम लिया और सदन में अपना बहुमत साबित कर दिया। विधायकों के साथ भाजपा में शामिल होने के बाद, पेमा खांडू अरुणाचल प्रदेश में भाजपा के मुख्यमंत्री बन गए। इसके बाद उनके नेतृत्व में भाजपा ने 2019 के विधानसभा चुनाव में 60 में से 41 सीटें जीतकर भारी बहुमत हासिल किया और वे 29 मई 2019 को फिर से मुख्यमंत्री बने। 2024 के अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों में भी खांडू के नेतृत्व में भाजपा ने 46 सीटों के साथ प्रचंड जीत दर्ज की और वे राज्य के मुख्यमंत्री पद पर बने हुए हैं।

7. माणिक साहा
माणिक साहा मुख्यधारा की राजनीति में आने से पहले पेशे से एक डेंटिस्ट थे और हापनिया स्थित त्रिपुरा मेडिकल कॉलेज में पढ़ाते थे। इसके अलावा वे त्रिपुरा क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रहे हैं। राजनीतिक रूप से, उन्होंने अपने सफर की शुरुआत कांग्रेस से की थी और वर्ष 2016 से पहले तक वे कांग्रेस पार्टी के ही सदस्य थे।

साल 2016 में माणिक साहा ने कांग्रेस छोड़कर भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। 2020 में उन्हें त्रिपुरा प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिस पद पर उन्होंने 2022 तक कार्य किया। अप्रैल 2022 में पार्टी ने उन्हें त्रिपुरा से राज्यसभा सांसद भी बनाया था। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव से महज एक साल पहले, 14 मई 2022 को तत्कालीन मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब ने अचानक अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद 15 मई 2022 को माणिक साहा ने त्रिपुरा के 11वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। 

8. बसवराज बोम्मई
बसवराज बोम्मई कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एसआर. बोम्मई के बेटे हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत 1992 में जनता दल के सदस्य के रूप में की थी। जनता दल में रहते हुए उन्होंने एचडी. देवेगौड़ा और रामकृष्ण हेगड़े जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ काम किया और वे तत्कालीन मुख्यमंत्री जेएच. पटेल के राजनीतिक सचिव भी रहे। 1998 में वे पहली बार जनता दल के सदस्य के रूप में धारवाड़ स्थानीय निकाय क्षेत्र से कर्नाटक विधान परिषद के लिए चुने गए। जनता दल के टूटने के बाद, वे इससे अलग होकर बनी पार्टी- जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल हो गए और 2004 में इसी पार्टी से विधान परिषद के लिए फिर से चुने गए।

फरवरी 2008 में बोम्मई ने जनता दल (यूनाइटेड) का साथ छोड़ दिया और भाजपा का दामन थाम लिया। उसी वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में वे शिगगांव निर्वाचन क्षेत्र से विधायक चुने गए। उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री बीएस. येदियुरप्पा का बेहद करीबी माना जाता था। भाजपा में आने के बाद 2008 से 2013 तक उन्होंने राज्य के जल संसाधन मंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद 2019 से 2021 के बीच येदियुरप्पा की सरकार में उन्होंने गृह, कानून, संसदीय कार्य और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार भी संभाला। 

26 जुलाई 2021 को जब तत्कालीन मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, तो भाजपा के राष्ट्रीय नेतृत्व ने नए मुख्यमंत्री के चुनाव के लिए पर्यवेक्षक भेजे। 27 जुलाई 2021 को बसवराज बोम्मई को विधायक दल का नया नेता चुना गया। इसके अगले ही दिन, 28 जुलाई 2021 को बसवराज बोम्मई ने कर्नाटक के 23वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली और वे राज्य में भाजपा के चौथे मुख्यमंत्री बने। उनका यह कार्यकाल 19 मई 2023 तक रहा।

9. युमनाम खेमचंद सिंह
युमनाम खेमचंद सिंह राजनीति में आने से पहले एक ताइक्वांडो खिलाड़ी और शिक्षक रहे हैं, जिन्हें इस खेल में 5वीं डैन ब्लैक बेल्ट प्राप्त है। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 2002 में पूर्व मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह के साथ डेमोक्रेटिक रेवोल्यूशनरी पीपुल्स पार्टी से की थी। यह पार्टी भारत सरकार द्वारा नगा विद्रोही गुट के साथ संघर्ष विराम के विस्तार के विरोध में हुए मैतेई समूहों के आंदोलन के बाद बनाई गई थी।

2012 में मणिपुर में हुए चुनाव में खेमचंद सिंह ने तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के टिकट पर चुनाव लड़ा था। हालांकि, उन्हें जीत नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने 2013 में भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। 2017 में उन्होंने भाजपा के टिकट पर सिंगजामेई निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीता और पहली बार मणिपुर विधानसभा पहुंचे। 2017 में जब राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार (बीरेन सिंह के नेतृत्व में) बनी, तो खेमचंद को विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 2022 में फिर से चुनाव जीतने पर वे दूसरी बीरेन सिंह सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।

मणिपुर में चले लंबे जातीय संघर्ष के दौरान खेमचंद सिंह अपनी ही सरकार और तत्कालीन मुख्यमंत्री बीरेन सिंह के प्रमुख आलोचक बन गए थे। उन्होंने कुछ अन्य नेताओं के साथ मिलकर भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव बनाया और चेतावनी दी। नतीजतन बीरेन सिंह को इस्तीफा देना पड़ा और 13 फरवरी 2025 को राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया। 

खेमचंद को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का भरोसेमंद और एक उदार नेता माना जाता है, जो कुकी-जो और नगा समुदायों को भी स्वीकार्य हैं। दिसंबर 2025 में उन्होंने उखरुल जिले में एक कुकी राहत शिविर का दौरा भी किया था, जो इस संघर्ष के बीच किसी मैतेई नेता का एक बड़ा कदम था। इन राजनीतिक समीकरणों के बीच 3 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में उन्हें मणिपुर भाजपा विधायक दल का नेता चुना गया। इसके अगले ही दिन, राज्य से राष्ट्रपति शासन हटने पर 4 फरवरी 2026 को युमनाम खेमचंद सिंह ने मणिपुर के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली।

10. ...और अब सम्राट चौधरी
सम्राट चौधरी एक राजनीतिक परिवार से ही आते हैं। उनके पिता शकुनी चौधरी अलग-अलग पार्टियों से कई बार विधायक, सांसद और मंत्री रहे हैं। समता पार्टी के संस्थापक सदस्यों में शकुनी चौधरी भी एक हैं। बिहार में कुशवाहा समाज के बड़े नेताओं में शकुनी चौधरी शुमार किए जाते हैं। सम्राट चौधरी ने 1990 में सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया और शुरुआती दिनों में समता पार्टी से भी जुड़े रहे। मई 1999 में वे राबड़ी देवी की राजद सरकार में कृषि मंत्री बने। बाद में वे राजद से कई बार चुनाव लड़े। 2014 के करीब उन्होंने राजद को छोड़ दिया औ जदयू का हिस्सा बन गए। जब जीतनराम मांझी ने नीतीश से बगावत की और नई पार्टी बनाई तो सम्राट चौधरी ने जदयू में रहने के बावजूद मांझी की नई पार्टी- हम का समर्थन किया। यहां तक कि जदयू ने उनकी विधान परिषद सदस्यता तक रद्द कर दी।

जदयू और हम के बीच राजनीति में उलझने के कुछ समय बाद ही, 2017 में वे भाजपा में शामिल हो गए। 2018 में पार्टी की बिहार इकाई के प्रदेश उपाध्यक्ष बने। 2020 में वे बिहार विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) चुने गए और 2021 में एनडीए सरकार में पंचायती राज मंत्री बने। 2022 में उन्हें बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष चुना गया। इसके बाद, मार्च 2023 में उन्हें बिहार भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जिस पद पर वे 26 जुलाई 2024 तक रहे। जनवरी 2024 में जब नीतीश कुमार ने एनडीए में वापसी की, तो सम्राट चौधरी को बिहार का उपमुख्यमंत्री बनाया गया और उन्हें वित्त व स्वास्थ्य जैसे कई महत्वपूर्ण विभाग सौंपे गए। 



2025 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जदयू के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। जीत के बाद मुख्यमंत्री पद नीतीश कुमार के पास ही आया और सम्राट फिर उपमुख्यमंत्री बने। हालांकि, एक साल के अंदर ही नीतीश कुमार ने राज्यसभा जाने का मन बना लिया। इसके बाद 14 अप्रैल को जब नीतीश ने सीएम पद से इस्तीफा दिया तो भाजपा विधायक दल की बैठक में सम्राट चौधरी को नेता चुना गया। इस तरह 15 अप्रैल को सम्राट ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली। वे अब बिहार में भाजपा के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं।


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