पीएम मोदी के इस्राइल दौरे पर कांग्रेस हमलावर: नेसट में दिए संबोधन पर घेरा, नेहरू-आइंस्टीन पत्र का दिया हवाला
प्रधानमंत्री मोदी के नेसट संबोधन पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू का खुला बचाव बताया। पार्टी ने नेहरू-आइंस्टीन पत्राचार का हवाला देते हुए कहा कि भारत की पारंपरिक विदेश नीति संतुलित रही है, जिसमें यहूदियों और अरबों दोनों के प्रति सहानुभूति और शांतिपूर्ण समाधान पर जोर दिया गया था।
विस्तार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्राइली संसद नेसट में दिए गए संबोधन को लेकर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसे इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का खुला बचाव बताया। कांग्रेस ने कहा कि भारत की विदेश नीति का ऐतिहासिक दृष्टिकोण संतुलित और बहुपक्षीय रहा है, जिसकी झलक देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विचारों में भी मिलती है।
मोदी ने अपने संबोधन में क्या कहा?
दरअसल, नेसट को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने गाजा शांति पहल को क्षेत्र में न्यायपूर्ण और टिकाऊ शांति की दिशा में एक रास्ता बताया और आतंकवाद की कड़ी निंदा की। उन्होंने 7 अक्तूबर 2023 को हमास के हमले में मारे गए लोगों के प्रति संवेदना जताते हुए कहा कि भारत इस्राइल के साथ दृढ़ता और पूर्ण विश्वास के साथ खड़ा है और किसी भी कारण से नागरिकों की हत्या या आतंकवाद को उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जवाहरलाल नेहरू और अल्बर्ट आइंस्टीन के बीच की बातचीत
पीएम के इस बयान पर कांग्रेस महासचिव (संचार प्रभारी) जयराम रमेश ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने इस बात का उल्लेख किया कि भारत ने उनके जन्मदिन के दिन ही इस्राइल को मान्यता दी थी, लेकिन उन्होंने भारत की ऐतिहासिक और संतुलित विदेश नीति की परंपरा का पर्याप्त उल्लेख नहीं किया।
रमेश ने इस संदर्भ में जवाहरलाल नेहरू और अल्बर्ट आइंस्टीन के बीच पत्राचार का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि जुलाई 1947 में आइंस्टीन को लिखे जवाब में नेहरू ने यह स्वीकार किया था कि उन्हें यहूदियों के साथ-साथ अरबों की स्थिति के प्रति भी समान सहानुभूति है और यह मुद्दा दोनों पक्षों में गहरी भावनाओं से जुड़ा हुआ है। नेहरू ने लिखा था कि जब तक दोनों पक्ष व्यापक और स्वीकार्य समाधान के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक प्रभावी समाधान मुश्किल है।
रमेश ने आगे बताया कि नेहरू ने अपने पत्र में यह भी कहा था कि उन्होंने फिलिस्तीन के प्रश्न का गहन अध्ययन किया है, लेकिन अंतिम राय देने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने यहूदियों की उपलब्धियों की सराहना करते हुए यह सवाल भी उठाया था कि इतनी प्रगति के बावजूद वे अरबों का विश्वास क्यों नहीं जीत सके। साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि संघर्ष के लिए किसी एक पक्ष को पूरी तरह दोषी नहीं ठहराया जा सकता और सभी पक्षों से त्रुटियां हुई हैं। नेहरू ने कहा कि मुख्य कठिनाई फिलिस्तीन में ब्रिटिश शासन का निरंतर बने रहना रहा है।
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