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Supreme Court: 'डेटा आज की नई करेंसी है', सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी, डेटा प्रोटेक्शन एक्ट पर सुनवाई का भरोसा
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन
Published by: Pavan
Updated Thu, 12 Mar 2026 07:19 PM IST
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सार
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए कहा कि यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक और तकनीकी मुद्दा है, जिस पर प्राथमिकता के आधार पर सुनवाई की जाएगी।
जस्टिस सूर्यकांत
- फोटो : पीटीआई
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विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को डेटा प्रोटेक्शन एक्ट 2025 को चुनौती देने वाली विभिन्न याचिकाओं पर जल्द सुनवाई का भरोसा दिया है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मुद्दे को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि डेटा सुरक्षा आज के दौर का एक वैश्विक विषय बन चुका है और दुनिया भर में इसको लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं।
'डेटा आज की नई करेंसी है'
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा समय में डेटा तेजी से नई करेंसी का रूप लेता जा रहा है। उन्होंने कहा कि डेटा सुरक्षा का मुद्दा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक चिंता का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि देश का काफी डेटा विदेशों में जा रहा है और इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।
यह भी पढ़ें - Supreme Court: 1882 के कानून की धारा को चुनौती देने वाली याचिका खारिज, याचिकाकर्ताओं को विधि आयोग की सलाह
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत के सामने नए डेटा सुरक्षा कानून को चुनौती देने वाली याचिका का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अधिनियम में 'निजी और व्यक्तिगत डेटा' की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। उन्होंने दलील दी कि पहले इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 के तहत यदि किसी व्यक्ति की डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन होता था, तो उसे मुआवजा मांगने का अधिकार था, लेकिन नए कानून में यह प्रावधान बदल दिया गया है। उन्होंने कहा कि नए कानून के तहत मुआवजा सीधे पीड़ित व्यक्ति को मिलने के बजाय राज्य या डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस बोर्ड पर किसी प्रकार की न्यायिक (ट्रिब्यूनल) निगरानी का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे जवाबदेही को लेकर सवाल उठते हैं।
इस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जिस भी ट्रिब्यूनल या बोर्ड की निगरानी का प्रावधान होगा, उसे अर्ध-न्यायिक निकाय होना चाहिए और वह न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा। सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने यह भी कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया जाना जरूरी है। इनमें सरकार को दी गई छूट, सरकार की किसी भी डेटा तक संभावित पहुंच (जिससे निगरानी की आशंका), पत्रकारों को छूट न दिए जाने से सूचना के अधिकार पर पड़ने वाला असर और डेटा की संप्रभुता जैसे मुद्दे शामिल हैं।
यह भी पढ़ें - संसद में खुलासा: दिल्ली के आसमान में GPS स्पूफिंग बढ़ी, जनवरी-फरवरी में 623 घटनाएं आई सामने
उन्होंने अदालत से कहा कि यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या देश का डेटा विदेशों में जा रहा है और उसे किस प्रकार सुरक्षित रखा जा रहा है। इसके अलावा डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की भूमिका और डेटा प्राइवेसी के उल्लंघन की स्थिति में मुआवजे की व्यवस्था जैसे मुद्दों पर भी न्यायिक विचार जरूरी है।
-इनपुट आईएएनएस
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'डेटा आज की नई करेंसी है'
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा कि मौजूदा समय में डेटा तेजी से नई करेंसी का रूप लेता जा रहा है। उन्होंने कहा कि डेटा सुरक्षा का मुद्दा केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक चिंता का विषय है। उन्होंने यह भी कहा कि देश का काफी डेटा विदेशों में जा रहा है और इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।
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याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील इंदिरा जयसिंह ने अदालत के सामने नए डेटा सुरक्षा कानून को चुनौती देने वाली याचिका का उल्लेख करते हुए कहा कि इस अधिनियम में 'निजी और व्यक्तिगत डेटा' की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है। उन्होंने दलील दी कि पहले इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000 के तहत यदि किसी व्यक्ति की डेटा प्राइवेसी का उल्लंघन होता था, तो उसे मुआवजा मांगने का अधिकार था, लेकिन नए कानून में यह प्रावधान बदल दिया गया है। उन्होंने कहा कि नए कानून के तहत मुआवजा सीधे पीड़ित व्यक्ति को मिलने के बजाय राज्य या डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड को दिया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस बोर्ड पर किसी प्रकार की न्यायिक (ट्रिब्यूनल) निगरानी का स्पष्ट प्रावधान नहीं है, जिससे जवाबदेही को लेकर सवाल उठते हैं।
इस पर मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि जिस भी ट्रिब्यूनल या बोर्ड की निगरानी का प्रावधान होगा, उसे अर्ध-न्यायिक निकाय होना चाहिए और वह न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेगा। सुनवाई के दौरान इंदिरा जयसिंह ने यह भी कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया जाना जरूरी है। इनमें सरकार को दी गई छूट, सरकार की किसी भी डेटा तक संभावित पहुंच (जिससे निगरानी की आशंका), पत्रकारों को छूट न दिए जाने से सूचना के अधिकार पर पड़ने वाला असर और डेटा की संप्रभुता जैसे मुद्दे शामिल हैं।
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उन्होंने अदालत से कहा कि यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या देश का डेटा विदेशों में जा रहा है और उसे किस प्रकार सुरक्षित रखा जा रहा है। इसके अलावा डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड की भूमिका और डेटा प्राइवेसी के उल्लंघन की स्थिति में मुआवजे की व्यवस्था जैसे मुद्दों पर भी न्यायिक विचार जरूरी है।
-इनपुट आईएएनएस
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