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निर्वासितों को बांग्लादेश से लाएगी सरकार?: भारतीय होने के दावों की होगी जांच; केंद्र ने कोर्ट में क्या कहा?

एएनआई, नई दिल्ली। Published by: निर्मल कांत Updated Fri, 22 May 2026 04:29 PM IST
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सार

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि बांग्लादेश भेजे गए कुछ लोगों को वापस भारत लाया जाएगा और फिर उनके भारतीय नागरिक होने के दावे की जांच की जाएगी। सरकार ने कहा कि मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए यह फैसला लिया गया है। पूरा मामला क्या है, पढ़िए रिपोर्ट-

Decided to bring back to India some persons deported to Bangladesh: Centre to SC
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
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विस्तार

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने कुछ लोगों को वापस भारत लाने का फैसला किया है, जिन्हें पहले बांग्लादेश भेज दिया गया था। इसके बाद उनके भारतीय नागरिक होने के दावे की जांच की जाएगी।


केंद्र सरकार ने कोर्ट में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए और इसे दूसरे मामलों के लिए उदाहरण न मानते हुए सरकार ने उन्हें वापस लाने का निर्णय लिया है।
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मेहता ने कहा, सरकार उन्हें वापस लाएगी। फिर उनकी स्थिति की जांच करेगी। जांच के नतीजों के आधार पर आगे कदम उठाए जाएंगे। इस पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल थे। केंद्र सरकार के शीर्ष कानून अधिकारी ने कहा कि इन लोगों को भारत वापस लाने में 8 से 10 दिन लग सकते हैं।
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सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई जुलाई में तय की है। शीर्ष कोर्ट केंद्र सरकार की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें कलकत्ता हाईकोर्ट के 26 सितंबर 2025 के आदेश को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार की ओर से सुनाली खातून और अन्य लोगों को बांग्लादेश भेजने के फैसले को रद्द करते हुए इसे 'गैरकानूनी' बताया था।

कोर्ट ने क्या निर्देश दिए थे?
  • पिछले साल तीन दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 'मानवीय आधार' पर सुनाली खातून और उनके बच्चे को भारत आने की अनुमति दी थी।उन्हें कुछ महीने पहले बांग्लादेश भेज दिया गया था।
  • कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को आठ साल के बच्चे की देखभाल करने को कहा था। इसके अलावा, बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती खातून को मुफ्त इलाज और प्रसव की सुविधा देने का निर्देश दिया गया था।
  • 24 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को आखिरी मौका देते हुए उसके वकील से इस मामले में निर्देश लेकर कोर्ट को जानकारी देने को कहा था।

सुनाली खातून के पिता भोदू शेख की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने कहा था कि केंद्र सरकार ने अब तक कोर्ट को अपनी राय नहीं बताई, जो 'काफी हद तक अनुचित' है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने तुषार मेहता के उस बयान को दर्ज कर लिया था, जिसमें कहा गया था कि संबंधित अधिकारी ने केवल मानवीय आधार पर महिला और उसके बच्चे को भारत में आने की अनुमति दी है। हालांकि, उनके अधिकार और दावों पर इसका असर नहीं पड़ेगा और उन्हें निगरानी में रखा जाएगा।

भोदू शेख ने क्या आरोप लगाया?
भोदू शेख ने आरोप लगाया कि उनका परिवार पिछले 20 साल से दिल्ली के रोहिणी सेक्टर-26 में दिहाड़ी मजदूरी कर रहा था। पिछले साल 18 जून को पुलिस ने उन्हें बांग्लादेशी होने के शक में पकड़ा और 27 जून को सीमा पार भेज दिया। 26 सितंबर 2025 को कलकत्ता हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें बीरभूम जिले की रहने वाली सुनाली खातून और स्वीटी बीबी समेत उनके परिवारों को अवैध प्रवासी बताकर बांग्लादेश भेजा गया था।

कलकत्ता हाईकोर्ट ने क्या निर्देश दिए थे?
हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि छह निर्वासित नागरिकों को एक महीने के भीतर वापस भारत लाया जाए। कोर्ट ने सरकार की उस मांग को भी खारिज कर दिया था, जिसमें आदेश पर अस्थायी रोक लगाने की अपील की गई थी। हाईकोर्ट ने यह आदेश भोदू शेख की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर दिया था।

शेख का दावा था कि उनकी बेटी, दामाद दानिश शेख और पांच साल के पोते को दिल्ली में हिरासत में लेकर बांग्लादेश भेज दिया गया। बीरभूम इलाके से ही आमिर खान की ओर से दायर दूसरी याचिका में भी ऐसा ही दावा किया गया था। इसमें कहा गया था कि उनकी बहन स्वीटी बीबी और उसके दो बच्चों को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लेकर पड़ोसी देश भेज दिया। बताया गया कि बाद में इन लोगों को बांग्लादेश पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था। 

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हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि केंद्र सरकार ने हलफनामे में बताया है कि दिल्ली का विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) गृह मंत्रालय के दो मई 2025 के निर्देश के अनुसार अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वापस भेज रहा था। निर्देश में कहा गया था कि किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में अवैध रूप से रह रहे बांग्लादेश या म्यांमार के नागरिकों की पहले संबंधित राज्य सरकार या केंद्र शासित प्रदेश द्वारा जांच की जाएगी। इसके बाद ही निर्वासन की प्रक्रिया शुरू होगी।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि अधिकारियों ने बहुत जल्दबाजी में निर्वासन की कार्रवाई की और यह प्रक्रिया नियमों के खिलाफ थी। कोर्ट ने कहा था, हिरासत में लिए गए लोगों के रिश्तेदार पश्चिम बंगाल में रहते हैं। जिस तरह की जरूरत से ज्यादा जल्दबाजी निर्वासन में दिखाई गई, उससे भ्रम पैदा हो सकता है और देश के न्यायिक माहौल पर असर पड़ सकता है। 
 
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