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क्या 'मेक इन इंडिया' की धज्जियां उड़ाकर हुआ राफेल एयरक्राफ्ट समझौता?

Fri, 09 Feb 2018 05:36 PM IST
अनिल पांडेय बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: अनिल पांडेय Updated Fri, 09 Feb 2018 05:36 PM IST
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Does Make in India blow up the rafael aircraft agreement?
Rahul Gandhi vs Anil Ambani - फोटो : File Photo
ये उस लड़ाकू विमान राफेल की स्पीड है, जिसकी खरीदारी में घपला करने का आरोप प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने लगाया है। राहुल गांधी ने मंगलवार को फ्रांस के साथ हुए राफेल सौदे को घोटाला बताते हुए कहा, ''एक कारोबारी' को लाभ पहुंचाने की मंशा से सौदे को बदलने के लिए प्रधानमंत्री मोदी खुद पेरिस गए थे।''
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राहुल गांधी ने ट्वीट किया, ''रक्षा मंत्री कहती हैं कि प्रत्येक राफेल जेट की कीमत के लिए पीएम मोदी और उनके 'भरोसेमंद' साथी ने जो बातचीत की, वो गोपनीय है।'' राहुल ने तंज कसा, ''रफाल की कीमत के बारे में संसद को बताना राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा है और जो इस बारे में पूछे, उसे एंटी-नेशनल बता दो।''
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कांग्रेस के राज्यसभा सांसद एमवी राजीव गौड़ा ने संसद में रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण से राफेल समझौते की कीमत और सौदे को लेकर कई सवाल किए थे। इसके जवाब में सीतारमण ने कहा, ''आर्टिकल 10 के मुताबिक, सौदे की जानकारी गोपनीय रखी जाएगी। साल 2008 में दोनों देशों के बीच हुए इंटर गवर्मेंट एग्रीमेंट के तहत ऐसा किया जाएगा। इस विमान को बनाने वाली कंपनी डास्सो (Dassault) से मीडियम मल्टी रोल कॉम्बेट एयरक्राफ्ट के लिए कोई समझौता नहीं हुआ है।''
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कांग्रेस के मोदी सरकार से सवाल?

निर्मला सीतारमन के इस जवाब और राहुल गांधी के आरोपों के बाद कांग्रेस ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कुछ सवाल पूछे। ''यूपीए सरकार के वक्त एक राफेल की कीमत 526 करोड़ थी। लेकिन जो सुनने में आया वो ये कि मोदी सरकार ने एक रफाल 1570 करोड़ रुपये में खरीदा। यानी करीब तीन गुणा। ये सच है या नहीं, ये कौन बताएगा। इस नुकसान का जिम्मेदार कौन है?
साल 2016 में फ्रांस में जो समझौता हुआ, उससे पहले सुरक्षा पर बनी कैबिनेट कमिटी से मंजूरी क्यों नहीं ली गई। प्रक्रिया क्यों नहीं मानी गई। क्या भ्रष्टाचार का केस नहीं बनता?

देश की जरूरत 126 विमानों की थी। मोदी गए और जैसे संतरे खरीदे जाते हैं, वैसे राफेल विमान खरीद लिए गए। नवंबर 2017 में रक्षा मंत्री ने कहा कि 36 राफेल इमरजेंसी में खरीदे गए। अगर ऐसा है तो समझौता होने के इतने महीनों बाद भी एक रफाल भारत को अब तक क्यों नहीं मिला?'' कांग्रेस के इन सवालों पर सरकार की तरफ से कोई जवाब अब तक नहीं आया है।

राफेल लड़ाकू विमान की खास बातें

Does Make in India blow up the rafael aircraft agreement?
Congress counter BJP on Rafale Deal
राफेल विमान परमाणु मिसाइल डिलीवर करने में सक्षम। दुनिया के सबसे सुविधाजनक हथियारों को इस्तेमाल करने की क्षमता। दो तरह की मिसाइलें। एक की रेंज डेढ़ सौ किलीमीटर, दूसरी की रेंज करीब तीन सौ किलोमीटर। राफेल जैसा विमान चीन और पाकिस्तान के पास भी नहीं है। ये भारतीय वायुसेना के इस्तेमाल किए जाने वाले मिराज 2000 का एडवांस वर्जन है। भारतीय एयरफोर्स के पास 51 मिराज 2000 हैं।

डस्सो एविएशन के मुताबिक, राफेल की स्पीड मैक 1.8 है। यानी करीब 2020 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार। ऊंचाई 5.30 मीटर, लंबाई 15.30 मीटर। राफेल में हवा में तेल भरा जा सकता है। राफेल लडाकू विमानों का अब तक अफगानिस्तान, लीबिया, माली, इराक और सीरिया जैसे देशों में हुई लड़ाइयों में इस्तेमाल हुआ है।

कब हुआ था समझौता?

साल 2010 में यूपीए सरकार ने खरीद की प्रक्रिया फ्रांस से शुरू की। 2012 से 2015 तक दोनों के बीच बातचीत चलती रही। 2014 में यूपीए की जगह मोदी सरकार सत्ता में आई। सितंबर 2016 में भारत ने फ्रांस के साथ 36 राफेल विमानों के लिए करीब 59 हजार करोड़ रुपये के सौदे पर हस्ताक्षर किए।

मोदी ने सितंबर 2016 में कहा था, ''रक्षा सहयोग के संदर्भ में 36 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद को लेकर ये खुशी की बात है कि दोनों पक्षों के बीच कुछ वित्तीय पहलुओं को छोड़कर समझौता हुआ है।''

रक्षा मामलों के जानकार राहुल बेदी के मुताबिक, ''पहले भारत को 126 विमान खरीदने थे। तय ये हुआ था कि भारत 18 विमान खरीदेगा और 108 विमान बेंगलुरु के हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड में एसेम्बल होंगे। लेकिन ये सौदा नहीं हो पाया।''

अगर इस समझौते की राशि 59 हजार करोड़ से तुलना की जाए तो एक राफेल की कीमत करीब लगभग 1600 करोड़ रुपये होती है। ये रकम कांग्रेस के आरोपों में बताई गई रकम के काफी करीब है।

राफेल समझौते का अंबानी कनेक्शन?

Does Make in India blow up the rafael aircraft agreement?
दुश्मनों की नजर से बचने में सक्षम - फोटो : Getty
मोदी सरकार ने अब तक इस समझौते में पारदर्शिता को लेकर ये दावा किया है कि हमने राफेल बनाने वाली कंपनी डास्सो से नहीं, सीधा फ्रांस सरकार से डील की है। सितंबर 2016 में अचानक जैसे ये समझौता हुआ, इसको लेकर सरकार की आलोचना हुई।

मोदी सरकार मेक ऑफ इंडिया का जमकर प्रचार करती है। लेकिन इस समझौते में भारत की एकमात्र जहाज बनाने वाली कंपनी हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को नजरअंदाज किया गया।

रक्षा मामलों के जानकार अजय शुक्ला ने अप्रैल 2015 में कहा था, ''प्रधानमंत्री मोदी के साथ रिलायंस (एडीएजी) प्रमुख अनिल अंबानी और उनके समूह के अधिकारी भी गए थे। उन्होंने राफेल बनाने वाली कंपनी के साथ बातचीत भी की थी।'' राहुल गांधी के आरोप के बाद साल 2015 में अजय शुक्ला की कही बात को वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण आगे बढ़ाते हैं।

प्रशांत भूषण ने मंगलवार को अपने ट्वीट में लिखा, ''मार्च 2015 में अंबानी ने रिलायंस डिफेंस का रजिस्ट्रेशन करवाया। दो हफ्ते बाद ही मोदी यूपीए सरकार की 600 करोड़ रुपये में खरीदी जाने वाली राफेल डील को 1500 करोड़ की नई डील में बदल देते हैं। पब्लिक सेक्टर की एचएएल की जगह अंबानी की कंपनी ने ली ताकि 58 हजार करोड़ के केक को आधा चखा जा सके।'' प्रशांत भूषण ने इस दावे के समर्थन में कॉर्पोरेट मंत्रालय की वेबसाइट का एक स्क्रीनशॉट भी शेयर किया।

भारत को सबसे महंगा मिला राफेल?

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स का मानें तो राफेल के लिए भारत को बाकी मुल्कों के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। डिफेंस वेबसाइट जेन्स के मुताबिक, साल 2015 में भारत के अलावा कतर ने भी फ्रांस से राफेल खरीदने को लेकर समझौता हुआ था। जिसे बीते साल दिसंबर में कतर ने 24 से बढ़ाकर 36 कर दिया। 24 राफेल के लिए तब दोनों मुल्कों के बीच करीब 7.02 बिलियन डॉलर का समझौता हुआ था। इसमें हथियारों की खरीद भी शामिल थी।

स्ट्रेटजी पेज की रिपोर्ट के मुताबिक, कतर को एक राफेल करीब 108 मिलियन डॉलर यानी 693 करोड़ रुपये में मिला। यानी अगर ये रिपोर्ट सही साबित होती है तो ये कीमत भारत की एक राफेल के लिए कथित तौर पर चुकाई कीमत से कहीं ज्यादा है।
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