Draupadi Murmu: भाजपा के मिशन 2024 के लिए बिछा रेड कार्पेट, भरोसे की कड़ियां जोड़ने से चूका 'विपक्ष'
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की जीत ने भाजपा के 'मिशन 2024' के लिए रेड कार्पेट बिछा दिया है। विपक्ष के लिए ये चुनाव खुद की एकता प्रदर्शित करने का एक अहम अवसर था, लेकिन वह उसकी कड़ियां जोड़ने में नाकाम रहा। विपक्षी दरार बढ़ती ही जा रही है...
विस्तार
राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की भारी जीत से भाजपा खेमा गदगद है। एक तरह से यह चुनाव, सत्ता पक्ष और विपक्ष के लिए अपनी ताकत व एकता दिखाने का मंच था। एक ऐसा प्लेटफार्म, जहां से 2024 का रास्ता प्रशस्त होता है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू की जीत ने भाजपा के 'मिशन 2024' के लिए रेड कार्पेट बिछा दिया है। विपक्ष के लिए ये चुनाव खुद की एकता प्रदर्शित करने का एक अहम अवसर था, लेकिन वह उसकी कड़ियां जोड़ने में नाकाम रहा। विपक्षी दरार बढ़ती ही जा रही है।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे बताते हैं कि विपक्षी एकता का प्रयास अभी तक कोरा भ्रम साबित हुआ है। अधिकांश विपक्षी दल, कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व में चलने को तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर कांग्रेस, किसी दूसरे विपक्षी दल की कमांड में आगे बढ़ने के लिए राजी नहीं है। गुरुवार को टीएमसी ने कहा है कि वह उपराष्ट्रपति चुनाव में हिस्सा नहीं लेगी। वजह, विपक्ष ने मार्गरेट अल्वा को उम्मीदवार घोषित करते वक्त उससे सलाह नहीं ली। भाजपा ने जो रणनीति बनाई है, उसमें राष्ट्रपति के बाद अब उपराष्ट्रपति चुनाव में भी एनडीए उम्मीदवार द्वारा भारी जीत दर्ज कराए जाने की संभावना है।
मुर्मू के समर्थन में क्रॉस वोटिंग
राजनीति के विशेषज्ञ एवं जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर आनंद कुमार के अनुसार, विपक्ष को आपसी भरोसा दिखाना चाहिए था। इसके लिए राष्ट्रपति का चुनाव एक अच्छा मौका था। विपक्ष ने उसे हाथ से जाने दिया। विपक्षी दल अपने स्टैंड पर नहीं ठहर सके। जिन विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति चुनाव में पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा को अपना समर्थन देने की घोषणा की थी, उनमें से कई दल मुर्मू के पक्ष में मतदान कर गए। जनता दल (सेक्युलर), झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) व शिवसेना से उद्धव के ग्रुप ने खुलेआम मुर्मू का समर्थन कर दिया। कई दूसरे दलों की तरफ से भी मुर्मू के समर्थन में क्रॉस वोटिंग होने की खबरें आई थीं। इसमें कोई शक नहीं कि सत्ता पक्ष ने आदिवासी समुदाय की महिला द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का प्रत्याशी घोषित कर विपक्ष की बची खुची एकता पर पानी फेर दिया। आखिर विपक्ष, मुर्मू का विरोध करता भी तो कैसे करता। देश को पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति मिलनी जा रही थी। एनडीए और खासतौर से भाजपा का ये चक्रव्यूह, विपक्ष पर भारी पड़ गया।
भाजपा के सामने विपक्षी एकता पूरी तरह खंडित
प्रतिभा पाटिल पहली महिला राष्ट्रपति, कांग्रेस के शासनकाल में बनीं थीं। केआर नारायणन, जो कि दलित समुदाय से आते थे, वे भी कांग्रेस के समय में सर्वोच्च पद पर पहुंचे थे। ये ऐसा वक्त था, जब यह पार्टी दूसरे दलों को भरोसे में लेकर चलती थी। दूसरे दलों को भी कांग्रेस पर विश्वास था। अब कांग्रेस पार्टी चाहती है कि विपक्ष उस पर वैसा ही भरोसा करे, जैसा पहले करता था। आज तो राजनीतिक परिदृश्य ही बदल चुका है। वैसे नेता भी नहीं रहे। कांग्रेस पार्टी में ही एकता नहीं है। पार्टी में कौन सुप्रीम है, कार्यकर्ता यही पता लगाने में जुटे रहते हैं। पार्टी के भीतर अलग विचारधारा वाले नेताओं का समूह बन गया है। ऐसे में कोई दूसरा दल, भला कांग्रेस का नेतृत्व क्यों स्वीकार करने लगा। 2014 के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव भी चला गया। भाजपा के सामने विपक्षी एकता पूरी तरह खंडित नजर आई। कांग्रेस के केंद्रीयकरण में कई विपक्षी दल खुद को असहज पाते हैं। ऐसा नहीं है कि विपक्ष ने राहुल गांधी को आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया। उन्हें कई अवसर मिले हैं, लेकिन वे कामयाब नहीं हो सके।
विपक्ष 2024 के लिए ले सीख
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, जो अपनी पार्टी को कांग्रेस का विकल्प मानने लगे हैं, ऐसे में वे राहुल के पीछे क्यों चलेंगे। ममता बनर्जी ने अपने दम पर भाजपा को हराया है। पश्चिम बंगाल में जीत के लिए इस बार भाजपा ने एड़ी चोटी का जोर लगाया था, लेकिन ममता बनर्जी के आगे यह राष्ट्रीय पार्टी नहीं ठहर सकी। एनसीपी प्रमुख शरद पवार और ममता बनर्जी, ये नेता कांग्रेस छोड़कर ही तो गए थे। क्षेत्रीय दल, लोकसभा में तो एक होने की सोच सकते हैं, लेकिन विधानसभा में वे एक नहीं हो सकते। यही बात उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर 'एक' नहीं होने देती। राजनीति के एक अन्य जानकार रशीद किदवई कहते हैं, विपक्षी दलों में दूरी का सबसे बड़ा कारण उनके बीच आपसी विश्वास का न होना है। अब राष्ट्रपति चुनाव में हुई द्रौपदी मुर्मू की भारी जीत से अगर विपक्ष 2024 के लिए कोई सीख लेता है तो सही है, अन्यथा भाजपा अपने मिशन 2024 के रेड कार्पेट पर पांव रख चुकी है।