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पूर्व रेलवे की पहलः जहां होती है 'विरासत से मुलाकात', फिर जीवित हो रही बंगाल की पारंपरिक कला

अमर उजाला ब्यूरो, कोलकाता Published by: Sandhya Kumari Updated Fri, 22 May 2026 06:20 PM IST
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सार

भारतीय रेलवे की ‘एक स्टेशन एक उत्पाद’ योजना ने पश्चिम बंगाल के पारंपरिक कारीगरों और बुनकरों को नया जीवन दिया है। मिट्टी की गुड़ियां, तांत साड़ियां, कांथा सिलाई और शांतिनिकेतन के हस्तशिल्प अब रेलवे स्टेशनों पर सीधे यात्रियों तक पहुंच रहे हैं। 

Eastern Railway Initiative Where Heritage Meets Bengal Traditional Art Comes Alive Once Again
बंगाल की पारंपरिक कला - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

बंगाल के एक दूरदराज के गांव की शांत, धूल भरी गलियों में मिट्टी को थपथपाने की लयबद्ध ध्वनि पीढ़ियों से मयना बरुई के परिवार की पहचान रही है। बचपन से ही उनकी उंगलियां मिट्टी से रंग-बिरंगी “माटिर पुतुल” यानी मिट्टी की गुड़ियां गढ़ती आई हैं, ठीक वैसे ही जैसे उनके पूर्वज किया करते थे। इन गुड़ियों को बनाना केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा था।...और फिर दिखी आशा की किरण

लेकिन समय के साथ दुनिया बदलती गई। बाजार आधुनिक उत्पादों की ओर झुकता गया, मेलों में भीड़ घटने लगी और पारंपरिक कला धीरे-धीरे हाशिये पर चली गई। एक समय ऐसा आया जब मयना और उनके जैसे कई कारीगरों को लगने लगा कि उनकी पीढ़ियों पुरानी कला शायद अब जीवित नहीं रह पाएगी। इसी निराशा के दौर में रेलवे स्टेशनों पर शुरू हुए “एक स्टेशन एक उत्पाद”

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बुनकर परिवारों के लिए भी वरदान

(ओएसओपी) स्टॉल उनके जीवन में उम्मीद की नई रोशनी बनकर आए। यह पहल केवल मयना ही नहीं, बल्कि कुछ जिलों दूर रहने वाले श्याम दास जैसे बुनकर परिवारों के लिए भी वरदान साबित हुई। श्याम का परिवार वर्षों से पारंपरिक “तांत साड़ी” की नाजुक बुनाई कला को बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा था। आज रेलवे की इस पहल ने इन परिवारों को ऐसा मंच दिया है, जहां उनका हुनर हजारों यात्रियों तक पहुंच रहा है और उनकी संघर्षभरी कहानी सम्मान और पुनर्जागरण की गाथा में बदलती दिखाई दे रही है।

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एक स्टेशन एक उत्पाद योजना

सीधा मिला बाजार, बिचौलिये हुए बाहर “एक स्टेशन एक उत्पाद” योजना भारत सरकार द्वारा रेल मंत्रालय के अंतर्गत शुरू की गई एक महत्वाकांक्षी पहल है। इसका उद्देश्य स्थानीय कारीगरों, बुनकरों, स्वयं सहायता समूहों और छोटे शिल्पकारों को ऐसा विपणन मंच उपलब्ध कराना है, जहां वे बिना किसी बिचौलिये के सीधे अपने उत्पाद बेच सकें। रेलवे स्टेशनों जैसे व्यस्त सार्वजनिक स्थानों को बाजार और सांस्कृतिक प्रदर्शनी केंद्र में बदलकर यह योजना प्रतिदिन हजारों यात्रियों को स्थानीय कला और हस्तशिल्प से जोड़ रही है।




कला परंपराओं को नई पहचान

इस पहल का उद्देश्य केवल बिक्री बढ़ाना नहीं, बल्कि “वोकल फॉर लोकल” की भावना को मजबूत करना और विलुप्त होती कला परंपराओं को नई पहचान देना भी है। स्टॉल आवंटन की प्रक्रिया को भी सरल बनाया गया है, ताकि गांवों के कारीगर आसानी से इसका लाभ उठा सकें। स्थानीय कारीगर, बुनकर, स्वयं सहायता समूह और पंजीकृत संस्थाएं सीधे रेलवे अधिकारियों के पास आवेदन कर सकते हैं। इसके बाद पारदर्शी लॉटरी प्रणाली के जरिए नाममात्र शुल्क पर स्टॉल आवंटित किए जाते हैं, जिससे हर कलाकार को समान अवसर मिल सके। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस व्यवस्था में किसी तीसरे पक्ष या बिचौलिये की भूमिका नहीं होती।

सीधे कारीगरों तक पहुंचते हैं पैसे

इससे बिक्री से होने वाली पूरी आय सीधे कारीगरों तक पहुंचती है, जो उनके आर्थिक सशक्तीकरण की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। कला दीर्ध में बदल रहे, उपनगरीय स्टेशन पूर्व रेलवे के महाप्रबंधक मिलिंद देऊस्कर के नेतृत्व में रेलवे ने अपने प्रमुख और उपनगरीय स्टेशनों को पारंपरिक कला की जीवंत दीर्घाओं में बदलने का प्रयास किया है। रेलवे केवल स्टॉल उपलब्ध नहीं करा रहा, बल्कि इन ग्रामीण उद्यमियों को विशाल यात्री समूहों तक सीधी पहुंच भी दे रहा है। सुंदर ढंग से सजाए गए ये स्टॉल अब गांवों और मुख्यधारा के बाजार के बीच मजबूत सेतु का काम कर रहे हैं। पूर्व रेलवे के विभिन्न मंडलों से गुजरने वाले यात्रियों को इन स्टॉलों पर बंगाल की सांस्कृतिक विविधता की झलक देखने को मिलती है। यहां पारंपरिक टेराकोटा मिट्टी की गुड़ियां, हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तन, तांत एवं हैंडलूम साड़ियां, बाटिक डिजाइनों से सजे शांतिनिकेतन के प्रसिद्ध चमड़े के उत्पाद और महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा तैयार की गई बारीक “कांथा सिलाई” कला उपलब्ध है। इसके अलावा बर्धमान के प्रसिद्ध सीताभोग और मिहिदाना जैसी पारंपरिक मिठाइयां भी यात्रियों को आकर्षित कर रही हैं।

स्टेशनों की बन रही सांस्कृतिक पहचान

माझी पूर्व रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी शिबराम माझी का कहना है कि ओएसओपी स्टॉल केवल व्यावसायिक केंद्र नहीं, बल्कि स्टेशनों की नई सांस्कृतिक पहचान बन चुके हैं। उनके अनुसार भारतीय रेल हमेशा से देश की जीवनरेखा रही है, और अब यह उन कारीगरों की भी जीवनरेखा बन रही है, जिनकी कला वर्षों से संघर्ष कर रही थी।

जहां विरासत से होती है मुलाकात विशेषज्ञ मानते हैं कि तेजी से बदलते बाजार और मशीन आधारित उत्पादन के दौर में बंगाल की कई पारंपरिक कलाएं अस्तित्व के संकट से गुजर रही थीं। ऐसे समय में रेलवे जैसे विशाल सार्वजनिक मंच पर उन्हें स्थान मिलना केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि सामाजिक सम्मान भी प्रदान कर रहा है। आज जब हजारों यात्री इन स्टॉलों के सामने रुककर मिट्टी की गुड़ियां, तांत की साड़ियां या कांथा की कढ़ाई को देखते हैं, तो यह केवल खरीदारी का क्षण नहीं होता। यह उस विरासत से मुलाकात होती है, जिसे गांवों के अनगिनत परिवारों ने पीढ़ियों तक अपने हाथों और सपनों से जीवित रखा है।

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