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SC Updates: चीफ जस्टिस ने कहा- संविधान कुछ खास लोगों की जागीर नहीं है, पर्यावरण कार्यकर्ताओं का CJI को पत्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Pavan
Updated Fri, 22 May 2026 06:22 PM IST
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भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि संविधान कुछ खास और संपन्न लोगों का विशेषाधिकार नहीं है, बल्कि यह देश के हर नागरिक का समान अधिकार है। उन्होंने कहा कि संविधान केवल उन लोगों के लिए नहीं है जो महंगी कानूनी प्रक्रिया का खर्च उठा सकते हैं और बड़े वकीलों की सेवाएं ले सकते हैं। चीफ जस्टिस ने यह बात वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की आत्मकथा 'द कॉन्स्टिट्यूशन इज माई होम: कन्वर्सेशंस ऑन अ लाइफ इन लॉ' के विमोचन कार्यक्रम के लिए भेजे गए वीडियो संदेश में कही। उन्होंने कहा कि संविधान सच मायनों में सबका साझा घर है। यह केवल जजों, वकीलों या सरकारी संस्थाओं का नहीं, बल्कि हर नागरिक का है, चाहे वह शहर में रहने वाला हो, गांव का निवासी हो, गरीब हो या समाज के हाशिये पर खड़ा व्यक्ति। चीफ जस्टिस ने कहा कि लोग न्याय पाने और संविधान के वादों पर भरोसा करने के लिए इसकी ओर देखते हैं। संविधान सिर्फ दूर बैठकर समाज को नियंत्रित करने वाला कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन और लोकतंत्र के चरित्र में मौजूद रहता है।
आईपैक छापेमारी मामला: ममता बनर्जी के खिलाफ ईडी की याचिका पर 18 अगस्त को होगी सुनवाई
आई-पैक रेड मामले में ममता बनर्जी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अब 18 अगस्त को सुनवाई करेगा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा सुप्रीम कोर्ट में छुट्टियों के बाद इस मामले पर वकीलों की फिजिकल मौजूदगी में सुनवाई की जाएगी। दरअसल, आईपैक रेड के दौरान उस समय की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा ईडी अधिकारियों की काम में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में ईडी ने ममता बनर्जी, राज्य के तत्कालीन डीजीपी राजीव कुमार और तत्कालीन कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार को पक्षकार बनाते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की मांग की है।
ईडी की याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस साल की शुरुआत में राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (आईपैक) के कोलकाता स्थित दफ्तर में तलाशी अभियान के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने दखलअंदाजी की थी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए शुक्रवार का दिन तय किया था।
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आईपैक छापेमारी मामला: ममता बनर्जी के खिलाफ ईडी की याचिका पर 18 अगस्त को होगी सुनवाई
आई-पैक रेड मामले में ममता बनर्जी के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट अब 18 अगस्त को सुनवाई करेगा। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा सुप्रीम कोर्ट में छुट्टियों के बाद इस मामले पर वकीलों की फिजिकल मौजूदगी में सुनवाई की जाएगी। दरअसल, आईपैक रेड के दौरान उस समय की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के द्वारा ईडी अधिकारियों की काम में बाधा डालने का आरोप लगाते हुए ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। याचिका में ईडी ने ममता बनर्जी, राज्य के तत्कालीन डीजीपी राजीव कुमार और तत्कालीन कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज कुमार को पक्षकार बनाते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज किए जाने की मांग की है।
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ईडी की याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस साल की शुरुआत में राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म 'इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी' (आईपैक) के कोलकाता स्थित दफ्तर में तलाशी अभियान के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और राज्य पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने दखलअंदाजी की थी। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए शुक्रवार का दिन तय किया था।
शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजीव गांधी राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय के ‘विजिटर’ होने के नाते राष्ट्रपति को विश्वविद्यालय के कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने और उसकी सेवा समाप्त करने का अधिकार है। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा व जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह फैसला विश्वविद्यालय के पहले रजिस्ट्रार जितेंद्र सिंह से जुड़े मामले में दिया। जितेंद्र सिंह की नियुक्ति 2019 में राजीव गांधी राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय कानून के तहत हुई थी। 2020 में प्रोबेशन अवधि के दौरान उनकी सेवा समाप्त कर दी गई थी, जिसके बाद मामला अदालत पहुंचा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी पहली बर्खास्तगी को कलंकपूर्ण बताते हुए दिसंबर 2021 में बहाल करने का आदेश दिया था। हालांकि, बहाली के उसी दिन उन्हें नए सिरे से जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया गया। जांच समिति ने उन पर अनुशासनहीनता और गंभीर अवज्ञा के आरोप सही पाए। इसके बाद राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के विजिटर के रूप में अप्रैल 2022 में उनकी सेवा समाप्त करने को मंजूरी दी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस कार्रवाई को रद्द कर कहा था कि विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद को ही कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस व्याख्या से असहमति जताई। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में राष्ट्रपति की ओर से अधिकार का इस्तेमाल उचित और न्यायसंगत था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राजीव गांधी राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय के ‘विजिटर’ होने के नाते राष्ट्रपति को विश्वविद्यालय के कर्मचारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने और उसकी सेवा समाप्त करने का अधिकार है। अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति और नागरिक उड्डयन मंत्रालय को ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है।
जस्टिस पी एस नरसिम्हा व जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह फैसला विश्वविद्यालय के पहले रजिस्ट्रार जितेंद्र सिंह से जुड़े मामले में दिया। जितेंद्र सिंह की नियुक्ति 2019 में राजीव गांधी राष्ट्रीय विमानन विश्वविद्यालय कानून के तहत हुई थी। 2020 में प्रोबेशन अवधि के दौरान उनकी सेवा समाप्त कर दी गई थी, जिसके बाद मामला अदालत पहुंचा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उनकी पहली बर्खास्तगी को कलंकपूर्ण बताते हुए दिसंबर 2021 में बहाल करने का आदेश दिया था। हालांकि, बहाली के उसी दिन उन्हें नए सिरे से जांच पूरी होने तक निलंबित कर दिया गया। जांच समिति ने उन पर अनुशासनहीनता और गंभीर अवज्ञा के आरोप सही पाए। इसके बाद राष्ट्रपति ने विश्वविद्यालय के विजिटर के रूप में अप्रैल 2022 में उनकी सेवा समाप्त करने को मंजूरी दी। बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस कार्रवाई को रद्द कर कहा था कि विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद को ही कर्मचारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस व्याख्या से असहमति जताई। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में राष्ट्रपति की ओर से अधिकार का इस्तेमाल उचित और न्यायसंगत था।
पर्यावरण कार्यकर्ताओं का सीजेआई को पत्र...टिप्पणियां वापस लेने की मांग
चीफ जस्टिस सूर्यकांत को 72 वकीलों, कानून के छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और कानूनी कार्यकर्ताओं के समूह ने खुला पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी को वापस लेने की मांग की है। शीर्ष कोर्ट की ओर से टिप्पणियां विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दायर याचिकाओं को लेकर की गई थीं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 11 मई को सुनवाई के दौरान कहा था, हमें इस देश की एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जहां कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा हो कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं। पत्र में कहा कि इस तरह की टिप्पणियां पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी दायरे में काम कर रहे नागरिकों, समुदायों और समूहों पर अनुचित सवाल खड़े करती हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लोग नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटबिलिटी एंड राइट्स (एनएजेएआर) से जुड़े हैं। पत्र में कहा, नागरिकों को वैधानिक जिम्मेदारियों के पालन के लिए आवाज उठाने वाले पक्षकारों के बजाय कथित पर्यावरण कार्यकर्ता कहना उचित नहीं है। पत्र में पर्यावरणीय जनहित याचिकाओं और एनजीटी की अपीलों को सांविधानिक और वैधानिक अधिकारों के संरक्षण का माध्यम मानने की फिर से पुष्टि करने का आग्रह किया।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत को 72 वकीलों, कानून के छात्रों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और कानूनी कार्यकर्ताओं के समूह ने खुला पत्र लिखकर सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी को वापस लेने की मांग की है। शीर्ष कोर्ट की ओर से टिप्पणियां विकास परियोजनाओं को रोकने के लिए दायर याचिकाओं को लेकर की गई थीं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 11 मई को सुनवाई के दौरान कहा था, हमें इस देश की एक भी ऐसी परियोजना दिखाइए, जहां कथित पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने कहा हो कि हम इस परियोजना का स्वागत करते हैं। पत्र में कहा कि इस तरह की टिप्पणियां पर्यावरण संरक्षण के लिए कानूनी दायरे में काम कर रहे नागरिकों, समुदायों और समूहों पर अनुचित सवाल खड़े करती हैं। चीफ जस्टिस सूर्यकांत को लिखे पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले लोग नेशनल अलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटबिलिटी एंड राइट्स (एनएजेएआर) से जुड़े हैं। पत्र में कहा, नागरिकों को वैधानिक जिम्मेदारियों के पालन के लिए आवाज उठाने वाले पक्षकारों के बजाय कथित पर्यावरण कार्यकर्ता कहना उचित नहीं है। पत्र में पर्यावरणीय जनहित याचिकाओं और एनजीटी की अपीलों को सांविधानिक और वैधानिक अधिकारों के संरक्षण का माध्यम मानने की फिर से पुष्टि करने का आग्रह किया।
यदि आरोपी को आपत्ति नहीं तो कोर्ट चला सकती हैं राजद्रोह का मुकदमा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें राजद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए से जुड़े मुकदमों की सुनवाई कर सकती हैं, यदि आरोपी को इस पर कोई आपत्ति नहीं हो। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने राजद्रोह से संबंधित एक मामले में 17 वर्षों से जेल में बंद एक आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्टीकरण दिया। अभियुक्त की अपील मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित है। पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता की शिकायत यह है कि यदि उसकी आपराधिक अपील पर धारा 124ए के तहत लगाए गए आरोप सहित पूर्ण सुनवाई की जाए तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। ऐसी स्थिति में, हम स्पष्ट करते हैं कि जहां भी अभियुक्त को मुकदमे, अपील या किसी अन्य कार्यवाही पर कोई आपत्ति नहीं है, जिसमें उस पर धारा 124ए आईपीसी के तहत भी आरोप पत्र दायर किया गया है, तो अदालतों को ऐसे मामलों का गुण-दोष और कानून के अनुसार निर्णय लेने में कोई बाधा नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई करने और गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
11 मई, 2022 को पारित आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह से संबंधित दंडात्मक प्रावधान को तब तक के लिए स्थगित कर दिया था जब तक कि केंद्र सरकार औपनिवेशिक काल के इस कानून की समीक्षा पूरी नहीं कर लेती। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को राजद्रोह से संबंधित कोई भी नया मामला दर्ज न करने का निर्देश भी दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि राजद्रोह कानून के तहत चल रही सभी जांचें, लंबित मुकदमे और सभी कार्यवाही पूरे देश में स्थगित रखी जाएंगी और राजद्रोह के आरोप में जेल में बंद लोग जमानत के लिए न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें राजद्रोह से संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए से जुड़े मुकदमों की सुनवाई कर सकती हैं, यदि आरोपी को इस पर कोई आपत्ति नहीं हो। सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची व जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने राजद्रोह से संबंधित एक मामले में 17 वर्षों से जेल में बंद एक आरोपी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह स्पष्टीकरण दिया। अभियुक्त की अपील मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में लंबित है। पीठ ने कहा, याचिकाकर्ता की शिकायत यह है कि यदि उसकी आपराधिक अपील पर धारा 124ए के तहत लगाए गए आरोप सहित पूर्ण सुनवाई की जाए तो उसे कोई आपत्ति नहीं है। ऐसी स्थिति में, हम स्पष्ट करते हैं कि जहां भी अभियुक्त को मुकदमे, अपील या किसी अन्य कार्यवाही पर कोई आपत्ति नहीं है, जिसमें उस पर धारा 124ए आईपीसी के तहत भी आरोप पत्र दायर किया गया है, तो अदालतों को ऐसे मामलों का गुण-दोष और कानून के अनुसार निर्णय लेने में कोई बाधा नहीं होगी। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को याचिकाकर्ता की अपील पर सुनवाई करने और गुण-दोष के आधार पर निर्णय लेने का निर्देश दिया।
11 मई, 2022 को पारित आदेश में, सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह से संबंधित दंडात्मक प्रावधान को तब तक के लिए स्थगित कर दिया था जब तक कि केंद्र सरकार औपनिवेशिक काल के इस कानून की समीक्षा पूरी नहीं कर लेती। न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को राजद्रोह से संबंधित कोई भी नया मामला दर्ज न करने का निर्देश भी दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि राजद्रोह कानून के तहत चल रही सभी जांचें, लंबित मुकदमे और सभी कार्यवाही पूरे देश में स्थगित रखी जाएंगी और राजद्रोह के आरोप में जेल में बंद लोग जमानत के लिए न्यायालय से संपर्क कर सकते हैं।
पहली अपील अनमोल अधिकार 1059 दिन की देरी की माफ
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तथ्यों और कानून के आधार पर पहली अपील करना किसी भी पक्षकार का अनमोल अधिकार है। इस टिप्पणी के साथ प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (एसएटी) में अपील दायर करने में हुई 1059 दिनों की देरी को माफ कर दी। अदालत ने कहा कि एसएटी को मामले को मेरिट पर चुनौती देने का अवसर मिलना चाहिए। जस्टिस पीएस नरसिम्हा व जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह आदेश खेलो एमसीएक्स रिसर्च सर्विसेज की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। कंपनी ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के खिलाफ एसएटी में अपील दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने एसएटी के 16 सितंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रिब्यूनल ने देरी माफ करने से इन्कार करते हुए अपील खारिज कर दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तथ्यों और कानून के आधार पर पहली अपील करना किसी भी पक्षकार का अनमोल अधिकार है। इस टिप्पणी के साथ प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (एसएटी) में अपील दायर करने में हुई 1059 दिनों की देरी को माफ कर दी। अदालत ने कहा कि एसएटी को मामले को मेरिट पर चुनौती देने का अवसर मिलना चाहिए। जस्टिस पीएस नरसिम्हा व जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने यह आदेश खेलो एमसीएक्स रिसर्च सर्विसेज की ओर से दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिया। कंपनी ने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के खिलाफ एसएटी में अपील दाखिल की थी। सुप्रीम कोर्ट ने एसएटी के 16 सितंबर 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रिब्यूनल ने देरी माफ करने से इन्कार करते हुए अपील खारिज कर दी थी।
'वसीयत का मूल उद्देश्य उत्तराधिकार के सामान्य क्रम को बदलना है'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत का मूल उद्देश्य उत्तराधिकार के सामान्य क्रम को बदलना है। प्राकृतिक वारिसों को मात्र उत्तराधिकार से बाहर करना अपने आप में वसीयत को अमान्य घोषित करने का संदिग्ध कारण नहीं हो सकता। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दिवंगत बी शीना नैरी की पत्नी और बच्चों की अपील को खारिज कर दिया। इसमें उस वसीयत की वैधता को चुनौती दी गई थी जिसके माध्यम से मृतक ने कर्नाटक में अपनी संपत्ति अपनी बहन लक्ष्मी नैरी को दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट, अपीलीय अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन सभी निर्णयों को बरकरार रखा, जिन्होंने वसीयत को प्रामाणिक माना था। अदालत ने कहा, स्वाभाविक उत्तराधिकारियों को बाहर करना विचाराधीन वसीयत को अमान्य करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता, विशेष रूप से तब जब वसीयत में स्पष्ट रूप से यह निर्दिष्ट किया गया है कि वसीयतकर्ता ने अपनी पत्नी, बच्चों या अन्य रिश्तेदारों के साथ कोई अन्याय नहीं किया है, और उसने बॉम्बे में रहने वाली अपनी पत्नी और बच्चों को पर्याप्त संपत्ति दी है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब चार्टर्ड अकाउंटेंट बी शीना नैरी ने मई 1983 में अपनी छोटी बहन के पक्ष में वसीयत बनाई और उसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी और बच्चों ने वसीयत को चुनौती दी और आरोप लगाया कि यह मनगढ़ंत है और उन्हें विरासत से अन्यायपूर्वक वंचित किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत का मूल उद्देश्य उत्तराधिकार के सामान्य क्रम को बदलना है। प्राकृतिक वारिसों को मात्र उत्तराधिकार से बाहर करना अपने आप में वसीयत को अमान्य घोषित करने का संदिग्ध कारण नहीं हो सकता। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने दिवंगत बी शीना नैरी की पत्नी और बच्चों की अपील को खारिज कर दिया। इसमें उस वसीयत की वैधता को चुनौती दी गई थी जिसके माध्यम से मृतक ने कर्नाटक में अपनी संपत्ति अपनी बहन लक्ष्मी नैरी को दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट, अपीलीय अदालत और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन सभी निर्णयों को बरकरार रखा, जिन्होंने वसीयत को प्रामाणिक माना था। अदालत ने कहा, स्वाभाविक उत्तराधिकारियों को बाहर करना विचाराधीन वसीयत को अमान्य करने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता, विशेष रूप से तब जब वसीयत में स्पष्ट रूप से यह निर्दिष्ट किया गया है कि वसीयतकर्ता ने अपनी पत्नी, बच्चों या अन्य रिश्तेदारों के साथ कोई अन्याय नहीं किया है, और उसने बॉम्बे में रहने वाली अपनी पत्नी और बच्चों को पर्याप्त संपत्ति दी है। यह विवाद तब शुरू हुआ जब चार्टर्ड अकाउंटेंट बी शीना नैरी ने मई 1983 में अपनी छोटी बहन के पक्ष में वसीयत बनाई और उसी वर्ष उनकी मृत्यु हो गई। उनकी पत्नी और बच्चों ने वसीयत को चुनौती दी और आरोप लगाया कि यह मनगढ़ंत है और उन्हें विरासत से अन्यायपूर्वक वंचित किया गया है।