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ED की 13 स्थानों पर छापेमारी: कागजों में हो गया 1478 करोड़ का निर्यात, फर्जी कंपनियों के जरिए धन की तस्करी
डिजिटल ब्यूरो अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Rahul Kumar
Updated Wed, 22 Apr 2026 08:06 PM IST
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सार
ईडी ने महाराष्ट्र में नौ, दिल्ली में दो और आंध्र प्रदेश में दो स्थानों पर छापेमारी की है। इस दौरान ईडी ने 1478 करोड़ के फर्जी घोटाले का खुलासा किया है।
ईडी की कार्रवाई
- फोटो : ANI
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विस्तार
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), मुंबई क्षेत्रीय कार्यालय ने देश में 13 स्थानों पर धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए), 2002 के प्रावधानों के तहत छापेमारी की है। यह रेड, मेसर्स राजेश्वर एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड और अन्य के मामले में चल रही जांच के सिलसिले में हुई है। इसमें अवैध विदेशी धन प्रेषण शामिल है। तीन मुल्कों के साथ कारोबार हुआ। ईडी के मुताबिक, कागजों में 1478 करोड़ रुपये का निर्यात हो गया। फर्जी कंपनियों के जरिए धन की तस्करी छिपाई गई।
ईडी की रेड, महाराष्ट्र में नौ, दिल्ली में दो और आंध्र प्रदेश में दो स्थानों पर हुई है। इसमें कथित लाभार्थियों, प्रमुख संचालकों, बुलियन व्यापारियों और सहकारी ऋण समितियों के परिसर शामिल थे, जो धन के हस्तांतरण में शामिल थे। इस मामले में धन विदेश भेजा गया था। तलाशी के दौरान कई आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं। ईडी ने मुंबई के एनएम जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन में रितेश अमृतलाल जैन और अन्य के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर इस केस की जांच शुरू की है। इसमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और धन की हेराफेरी के लिए फर्जी संस्थाओं व फर्मों का नेटवर्क बनाने का आरोप लगाया गया है।
जांच से पता चला कि अपराध से प्राप्त धन को रितेश अमृतलाल जैन के कर्मचारियों/सहयोगियों के नाम पर बनाई गई कई संस्थाओं के माध्यम से, जिनमें मेसर्स राजेश्वर एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड भी शामिल है, आयात-निर्यात लेनदेन की आड़ में विदेशों में भेजा गया था। ईडी की जांच में एक सुनियोजित, बहुस्तरीय मनी लॉन्ड्रिंग तंत्र का खुलासा हुआ है, जिसमें सहकारी ऋण समितियों, बुलियन व्यापारियों और मध्यस्थ संस्थाओं के माध्यम से धन की तस्करी की गई।
फर्जी कंपनियों के जाल के जरिए इसे छिपाया गया। अंततः यह धन मेसर्स राजेश्वर एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के बैंक खातों में जमा किया गया, जिसने अधिक बिल वाले आयात और फर्जी निर्यात के माध्यम से विदेशों में धन भेजने के मुख्य माध्यम के रूप में काम किया। वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान, इसके खातों के माध्यम से 1400 करोड़ रुपये से अधिक की राशि हांगकांग, दुबई और थाईलैंड स्थित विदेशी संस्थाओं को भेजी गई। इसके अलावा, 1,478 करोड़ रुपये से अधिक की निर्यात आय अभी तक प्राप्त नहीं हुई है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ये लेनदेन केवल कागजी प्रविष्टियां थीं, जिनमें कोई वास्तविक व्यावसायिक गतिविधि नहीं थी।
अब तक की तलाशी में आपत्तिजनक दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय उपकरण बरामद हुए हैं, जिनमें रबर स्टैम्प, मूल पैन कार्ड, तस्वीरें और खाली हस्ताक्षरित चेकबुक शामिल हैं। इनसे फर्जी कंपनियों के निर्माण और संचालन के लिए पहचान के व्यवस्थित दुरुपयोग का पता चलता है।
व्यक्तियों को नाममात्र के पारिश्रमिक पर फर्जी निदेशक/नाममात्र के ऋणदाता के रूप में इस्तेमाल किया गया, जबकि फर्जी कंपनियों के पूरे नेटवर्क का वास्तविक नियंत्रण मुख्य आरोपी रितेश अमृतलाल जैन के पास ही रहा। आगे की जांच में पता चला है कि कई व्यक्तियों को सहकारी ऋण समितियों के सदस्य के रूप में नामांकित किया गया था और उनके नाम पर बैंक खाते खोले गए थे। इन खातों का उपयोग सुनियोजित नकद जमा के लिए किया गया था, जिसे बाद में रितेश जैन के निर्देशों पर फर्जी कंपनियों में स्थानांतरित कर दिया गया था। इसके बाद धन को कई संस्थाओं के माध्यम से कई स्तरों पर स्थानांतरित किया गया और विदेश भेजा गया। इसका मकसद, धन के वास्तविक स्रोत और स्वामित्व को छिपाना था।
प्रारंभिक निष्कर्षों से पता चलता है कि लगभग 200 करोड़ रुपये इस तरह सहकारी समितियों के माध्यम से स्थानांतरित किए गए थे। जांच में बुलियन व्यापारियों की भूमिका भी उजागर हुई है, जिनके लेन-देन का उपयोग धन के स्थानांतरण के लिए एक आवरण के रूप में किया गया था। तलाशी के दौरान जब्त किए गए रिकॉर्ड और सामग्री से पता चलता है कि बिल नकली प्रतीत होते हैं। उनका माल की वास्तविक आवाजाही से लेना देना नहीं हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि लेन-देन को वैधता प्रदान करने के लिए फर्जी प्रविष्टियों का इस्तेमाल किया गया था। ऐसे बुलियन व्यापारियों द्वारा रितेश अमृतलाल जैन द्वारा स्थापित संस्थाओं को 250 करोड़ रुपये से अधिक की राशि हस्तांतरित की गई थी। इससे पहले ईडी ने 58.16 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की थी और माननीय विशेष न्यायालय (पीएमएलए) के समक्ष एक अभियोग शिकायत (पीसी) भी दायर की गई थी।
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ईडी की रेड, महाराष्ट्र में नौ, दिल्ली में दो और आंध्र प्रदेश में दो स्थानों पर हुई है। इसमें कथित लाभार्थियों, प्रमुख संचालकों, बुलियन व्यापारियों और सहकारी ऋण समितियों के परिसर शामिल थे, जो धन के हस्तांतरण में शामिल थे। इस मामले में धन विदेश भेजा गया था। तलाशी के दौरान कई आपत्तिजनक दस्तावेज और डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं। ईडी ने मुंबई के एनएम जोशी मार्ग पुलिस स्टेशन में रितेश अमृतलाल जैन और अन्य के खिलाफ दर्ज एफआईआर के आधार पर इस केस की जांच शुरू की है। इसमें आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी और धन की हेराफेरी के लिए फर्जी संस्थाओं व फर्मों का नेटवर्क बनाने का आरोप लगाया गया है।
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जांच से पता चला कि अपराध से प्राप्त धन को रितेश अमृतलाल जैन के कर्मचारियों/सहयोगियों के नाम पर बनाई गई कई संस्थाओं के माध्यम से, जिनमें मेसर्स राजेश्वर एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड भी शामिल है, आयात-निर्यात लेनदेन की आड़ में विदेशों में भेजा गया था। ईडी की जांच में एक सुनियोजित, बहुस्तरीय मनी लॉन्ड्रिंग तंत्र का खुलासा हुआ है, जिसमें सहकारी ऋण समितियों, बुलियन व्यापारियों और मध्यस्थ संस्थाओं के माध्यम से धन की तस्करी की गई।
फर्जी कंपनियों के जाल के जरिए इसे छिपाया गया। अंततः यह धन मेसर्स राजेश्वर एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के बैंक खातों में जमा किया गया, जिसने अधिक बिल वाले आयात और फर्जी निर्यात के माध्यम से विदेशों में धन भेजने के मुख्य माध्यम के रूप में काम किया। वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान, इसके खातों के माध्यम से 1400 करोड़ रुपये से अधिक की राशि हांगकांग, दुबई और थाईलैंड स्थित विदेशी संस्थाओं को भेजी गई। इसके अलावा, 1,478 करोड़ रुपये से अधिक की निर्यात आय अभी तक प्राप्त नहीं हुई है, जो स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि ये लेनदेन केवल कागजी प्रविष्टियां थीं, जिनमें कोई वास्तविक व्यावसायिक गतिविधि नहीं थी।
अब तक की तलाशी में आपत्तिजनक दस्तावेज, डिजिटल रिकॉर्ड और वित्तीय उपकरण बरामद हुए हैं, जिनमें रबर स्टैम्प, मूल पैन कार्ड, तस्वीरें और खाली हस्ताक्षरित चेकबुक शामिल हैं। इनसे फर्जी कंपनियों के निर्माण और संचालन के लिए पहचान के व्यवस्थित दुरुपयोग का पता चलता है।
व्यक्तियों को नाममात्र के पारिश्रमिक पर फर्जी निदेशक/नाममात्र के ऋणदाता के रूप में इस्तेमाल किया गया, जबकि फर्जी कंपनियों के पूरे नेटवर्क का वास्तविक नियंत्रण मुख्य आरोपी रितेश अमृतलाल जैन के पास ही रहा। आगे की जांच में पता चला है कि कई व्यक्तियों को सहकारी ऋण समितियों के सदस्य के रूप में नामांकित किया गया था और उनके नाम पर बैंक खाते खोले गए थे। इन खातों का उपयोग सुनियोजित नकद जमा के लिए किया गया था, जिसे बाद में रितेश जैन के निर्देशों पर फर्जी कंपनियों में स्थानांतरित कर दिया गया था। इसके बाद धन को कई संस्थाओं के माध्यम से कई स्तरों पर स्थानांतरित किया गया और विदेश भेजा गया। इसका मकसद, धन के वास्तविक स्रोत और स्वामित्व को छिपाना था।
प्रारंभिक निष्कर्षों से पता चलता है कि लगभग 200 करोड़ रुपये इस तरह सहकारी समितियों के माध्यम से स्थानांतरित किए गए थे। जांच में बुलियन व्यापारियों की भूमिका भी उजागर हुई है, जिनके लेन-देन का उपयोग धन के स्थानांतरण के लिए एक आवरण के रूप में किया गया था। तलाशी के दौरान जब्त किए गए रिकॉर्ड और सामग्री से पता चलता है कि बिल नकली प्रतीत होते हैं। उनका माल की वास्तविक आवाजाही से लेना देना नहीं हैं। इससे यह संकेत मिलता है कि लेन-देन को वैधता प्रदान करने के लिए फर्जी प्रविष्टियों का इस्तेमाल किया गया था। ऐसे बुलियन व्यापारियों द्वारा रितेश अमृतलाल जैन द्वारा स्थापित संस्थाओं को 250 करोड़ रुपये से अधिक की राशि हस्तांतरित की गई थी। इससे पहले ईडी ने 58.16 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की थी और माननीय विशेष न्यायालय (पीएमएलए) के समक्ष एक अभियोग शिकायत (पीसी) भी दायर की गई थी।

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