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चुनाव आयोग विवाद: दुबे ने खोले पुराने पन्ने, कहा-जांच भी नहीं हुई; दावा-कांग्रेस पर 1972 में बूथ लूट के आरोप
Mon, 19 Oct 2026 10:29 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 19 Oct 2026 10:29 AM IST
सार
चुनाव आयोग से जुड़े विवाद और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर हो रहे आंदोलन के बीच झारखंड से भाजपा के लोकसभा सांसद निशिकांत दुबे ने पुराने पन्ने खोले हैं। उन्होंने कहा कि जो वामदल आज कांग्रेस के साथ दिख रही है, इसने बंगाल में चुनाव के दौरान 1972 में उस पर बूथ लूट के आरोप लगाए थे। दुबे का दावा है कि घटना की जांच भी नहीं हुई थी।
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बंगाल का जिक्र कर निशिकांत दुबे ने कांग्रेस को घेरा
- फोटो : एक्स-अमर उजाला
विस्तार
जिन चुनावी धांधलियों के आरोप में विपक्ष आज मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांग रहा है, उसी तरह के आरोप उसके अपने साथी वाम दल 54 साल पहले कांग्रेस पर लगा चुके हैं। तब भी शिकायतें मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंची थीं, पर कार्रवाई न होने का दावा खुद वाम दलों का है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने 1972 के पश्चिम बंगाल चुनाव से जुड़े वाम दलों के पुराने दस्तावेज सोशल मीडिया पर साझा कर विपक्ष को इसी आईने के सामने खड़ा कर दिया है।
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मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विपक्ष आयोग पर भाजपा को फायदा पहुंचाने का आरोप लगा रहा है। छह अक्तूबर को विपक्षी सांसदों ने संसद से आयोग मुख्यालय तक मार्च निकाला। रोके जाने के बाद राहुल गांधी समेत कई सांसदों को हिरासत में लिया गया। अगले दिन जंतर-मंतर पर फिर प्रदर्शन हुआ और विपक्ष की बैठकों में वाम दलों के सांसद भी शामिल रहे।
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निशिकांत दुबे की तरफ से साझा दस्तावेजों में नाम लेकर कुछ मामले गिनाए गए हैं। दावा है कि डोमकल के बूथ संख्या 55 पर 550 वोट पड़े, पर मतपेटी खुली तो 685 मतपत्र निकले। कालना में मतगणना के दौरान एक गिनती अधिकारी अंगूठे में रबर की मुहर लगाकर माकपा के पक्ष में पड़े मतपत्रों को अवैध करता पकड़ा गया। उलबेड़िया दक्षिण में रिटर्निंग अफसर पर आरोप है कि उसने माकपा प्रत्याशी के आंकड़े घटाकर कांग्रेस के बढ़ा दिए।
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माकपा का कहना था कि उसके गढ़ों में 28,000 से 76,000 वोट तक की हार का कोई और कारण नहीं हो सकता। उस दौर की भाकपा को भी पर्चे में कांग्रेस का साथी बताकर निशाना बनाया गया है। इसमें यह भी बताया गया है कि शिकायतें राज्यपाल, राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और मुख्य चुनाव आयुक्त तक पहुंचाई गईं, पर जांच का दिखावा तक नहीं हुआ।
भाजपा सांसद का सवाल...कांग्रेस और लेफ्ट साथ क्यों?
दुबे का कहना है, जो खुद धांधली के बल पर सरकार बनाते रहे हैं, वो दूसरों पर सवाल उठाने लायक नहीं हैं। उन्होंने खासकर यह सवाल उठाया कि जो वामदल कभी विधानसभा का बहिष्कार कर चुके हैं, वो आज उसी कांग्रेस के साथ एक मंच पर क्यों हैं।
माकपा के पर्चे में मतपेटियां बदलने के आरोप
दुबे के साझा किए दस्तावेजों में पहला माकपा की पश्चिम बंगाल राज्य समिति का 16 मार्च 1972 की तारीख वाला पर्चा है। इसमें पार्टी ने तत्कालीन सत्ताधारी कांग्रेस पर चुनाव में संगठित गुंडागर्दी और धांधली के आरोप लगाए थे। इस पर्चे के मुताबिक, कई मतदान केंद्रों पर कब्जा किया गया, मतपत्रों पर जबरन ठप्पे लगे और मतपेटियां बदली गईं या खोलकर उनमें मतपत्र बदले गए। पर्चे का सबसे बड़ा दावा यह है कि सरकार को पुलिस और खुफिया रिपोर्टों से पहले ही पता था कि किन सीटों पर हार का खतरा है, और उसी आधार पर 200 से ज्यादा सीटों के लिए योजना बनी।
विधानसभा का बहिष्कार : दूसरा दस्तावेज सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया के पाक्षिक मुखपत्र प्रोलेटेरियन एरा का एक अप्रैल 1972 का अंक है। इसके पहले पन्ने की सुर्खी है, पश्चिम बंगाल में धांधली वाले चुनाव। वाम मोर्चे का साझा बयान छपा है, जिस पर ज्योति बसु (माकपा) समेत घटक दलों के नेताओं के नाम हैं। बयान में चुनाव को पूरी तरह धांधली वाला बताकर विधानसभा के बहिष्कार का एलान किया गया। दावा किया गया कि मतदाताओं को डराया गया, बूथ कब्जाए गए, मतपेटियां देर से सील कराई गईं और ऐन वक्त पर 800 पीठासीन और मतदान अधिकारियों की नियुक्ति रद्द की गई।
दोनों मामलों में फर्क
हालांकि, दोनों मामलों की प्रकृति अलग है। 1972 के आरोप मतदान और मतगणना के दिन की धांधली के थे, जबकि आज का विवाद मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर है। 1972 के दस्तावेजों में दर्ज बातें उस समय के राजनीतिक दलों के आरोप हैं, किसी जांच या अदालत का निष्कर्ष नहीं।