Madhav Gadgil: पर्यावरणविद् माधव गाडगिल का 83 वर्ष की उम्र में निधन, आज पुणे में होगा अंतिम संस्कार
वरिष्ठ पर्यावरणविद् माधव गाडगिल का 83 वर्ष की उम्र में बुधवार रात पुणे में संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया। पश्चिमी घाट के संरक्षण और पर्यावरण में स्थानीय समुदायों की भागीदारी पर जोर देने वाले बॉटम-अप दृष्टिकोण के लिए वह व्यापक रूप से जाने जाते थे। उनके निधन से देश ने एक महत्वपूर्ण पर्यावरण चिंतक और वैज्ञानिक को खो दिया है।
विस्तार
देश के वरिष्ठ पर्यावरणविद् और पश्चिमी घाट के संरक्षण को लेकर अपनी दूरदर्शी सोच के लिए पहचाने जाने वाले माधव गाडगिल का बुधवार रात पुणे में निधन हो गया। वह 83 वर्ष के थे और कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। निधन की पुष्टि करते हुए उनके पुत्र सिद्धार्थ गाडगिल ने कहा कि मुझे अत्यंत दुख के साथ यह सूचना साझा करनी पड़ रही है कि मेरे पिता माधव गाडगिल का कल देर रात पुणे में निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार आज किया जाएगा।
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माधव गाडिगल ने जमीनी स्तर के पर्यवारण आंदोलन में निभाई अहम भूमिका
माधव गाडगिल ने भारत में जमीनी स्तर के पर्यावरण आंदोलन को आकार देने में अहम भूमिका निभाई। पश्चिमी घाट में बुनियादी ढांचे और बड़े विकास प्रोजेक्ट्स को लेकर उन्होंने वर्षों पहले चेतावनी दी थी कि इससे गंभीर प्राकृतिक आपदाएं पैदा होंगी। उनकी अध्यक्षता में 2011 में तैयार हुई चर्चित गाडगिल रिपोर्ट ने उद्योग और जलवायु संकट के बढ़ते दबावों के बीच पश्चिमी घाट जैसे पारिस्थितिक रूप से नाजुक क्षेत्र के संरक्षण की सिफारिश की थी। रिपोर्ट की अधिकांश सिफारिशें आज भी लागू नहीं हो पाई हैं, लेकिन बाद की आपदाओं ने इसकी दूरदर्शिता को सही साबित किया।
यूएनईपी ने गाडिगल को दिया था सम्मान
पर्यावरण और समाज को जोड़ने वाले वैज्ञानिक गाडगिल को 2024 में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने 'चैंपियंस ऑफ द अर्थ' सम्मान से नवाजा था। यूएनईपी ने अपने बयान में कहा था कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय से लेकर भारत सरकार के नीति-निर्माण तंत्र तक फैले छह दशक लंबे करियर में गाडगिल ने खुद को हमेशा 'जनता का वैज्ञानिक' माना।
पश्चिमी घाट और हिमलाय को लेकर गाडिगल ने क्या कहा था?
2021 में एक साक्षात्कार में गाडगिल ने कहा था कि पश्चिमी घाट और हिमालय में बार-बार आने वाली आपदाएं अभूतपूर्व नहीं हैं। उन्होंने बताया था कि पेड़ों की कटाई और पहाड़ी ढलानों से छेड़छाड़ के कारण ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं। हिमालय को पश्चिमी घाट की तुलना में अधिक नाजुक बताते हुए उन्होंने भूस्खलन और कटाव के खतरों की ओर भी इशारा किया था।
गाडगिल के शोध ने वंचित समुदायों के अधिकारों की रक्षा, समुदाय आधारित पारिस्थितिकी संरक्षण और उच्च स्तर पर नीति निर्माण को प्रभावित किया। उन्होंने सात पुस्तकें और कम से कम 225 वैज्ञानिक शोध पत्र लिखे। अपने कार्यों को लेकर उन्होंने कहा था कि उन्हें इस बात का संतोष है कि एक संवेदनशील वैज्ञानिक के रूप में उन्होंने समाज की दिशा बदलने में योगदान दिया।
2011 में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल के अध्यक्ष के रूप में गाडगिल ने 1,29,037 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के 75 प्रतिशत हिस्से को पर्यावरण-संवेदनशील घोषित करने की सिफारिश की थी, जिसे कई राज्यों ने अत्यधिक सख्त मानते हुए विरोध किया। बाद में गठित कस्तूरीरंगन समिति ने इस क्षेत्र को घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया और उसकी सिफारिशें भी समय के साथ कमजोर होती चली गईं। अब तक पश्चिमी घाट के इको-सेंसिटिव क्षेत्रों को लेकर अंतिम अधिसूचना जारी नहीं हो सकी है। केरल के वायनाड जैसे इलाके, जहां 2024 में भूस्खलन से सैकड़ों लोगों की मौत हुई, गाडगिल पैनल की सिफारिशों में शामिल थे।
माधव गाडगिल के जीवन से जुड़ी कुछ खास बातें
माधव गाडगिल का जन्म 24 मई 1942 को पुणे में हुआ था। उनका बचपन पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के बीच बीता, जहां प्रकृति से उनका गहरा जुड़ाव बना। पक्षी प्रेमी पिता के प्रभाव से उन्होंने कम उम्र में ही प्राकृतिक दुनिया को समझना शुरू कर दिया। उन्होंने पुणे और मुंबई में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की और बाद में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से गणितीय पारिस्थितिकी में पीएचडी पूरी की। इस दौरान उन्हें आईबीएम कंप्यूटर सेंटर फेलोशिप भी मिली।
1970 के दशक की शुरुआत में गाडगिल और उनकी पत्नी सुलोचना,जो स्वयं हार्वर्ड से गणित में पीएचडी थीं,ने अमेरिका में वैज्ञानिकों को मिलने वाले सुविधाजनक जीवन और प्रतिष्ठा को छोड़कर भारत लौटने का फैसला किया। दोनों ने देश में रहकर विज्ञान और समाज के लिए काम करने को अपना जीवन उद्देश्य बनाया।
भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलूरू में 31 वर्षों के लंबे शैक्षणिक कार्यकाल के दौरान गाडगिल ने सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज की स्थापना की। इस दौरान उन्होंने आदिवासियों, किसानों, चरवाहों और मछुआरों के साथ मिलकर जमीनी स्तर पर शोध किया। वह भारत के जैव विविधता अधिनियम के मसौदे से भी जुड़े रहे और कई वैश्विक पर्यावरण संस्थाओं में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं।
गाडगिल के व्यक्तित्व में गहरा सामाजिक विवेक था, जो आंशिक रूप से स्वाभाविक और आंशिक रूप से पारिवारिक संस्कारों से आया। उनके पिता, प्रसिद्ध अर्थशास्त्री डी.आर. गाडगिल, मानवाधिकारों में गहरी रुचि रखते थे और डॉ. बी.आर. आंबेडकर के विचारों से प्रभावित थे। माधव गाडगिल जिन व्यक्तियों से सबसे अधिक प्रेरित रहे, उनमें कर्नाटक की वनस्पति पर उल्लेखनीय कार्य करने वाले दिवंगत ईसाई पादरी फादर सिसिल जे. सलडान्हा प्रमुख थे।
गाडगिल की पत्नी और प्रख्यात मानसून वैज्ञानिक सुलोचना गाडगिल का निधन जुलाई 2025 में हुआ था। माधव गाडगिल के निधन के साथ देश ने केवल एक महान वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरण और समाज के बीच सेतु बनाने वाली एक सशक्त और संवेदनशील आवाज भी खो दी है।
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