Supreme Court: कम उपस्थिति होने पर भी परीक्षा से नहीं कर सकते वंचित, हाईकोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट की रोक
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हाईकोर्ट के एक फैसले पर रोक लगाई है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कम उपस्थिति होने पर भी परीक्षा देने से रोका नहीं जा सकता है। इस मामले में अगली सुनवाई जुलाई में होगी।
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सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें विधि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को कम अटेंडेंस वाले छात्रों को परीक्षा देने से रोकने से मना किया गया था। कोर्ट का कहा कि सभी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय इस समस्या से पीड़ित हैं।
अगली सुनवाई जुलाई में
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) की ओर से दायर याचिका सहित अन्य याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया, जिसमें उच्च न्यायालय के नवंबर 2025 के फैसले को चुनौती दी गई थी। वहीं, कार्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 21 जुलाई को तय की है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फिलहाल दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के अनुच्छेद 249 पर रोक रहेगी। यानी अभी उस आदेश को लागू नहीं किया जाएगा। हालांकि, यह रोक आगे के लिए लागू मानी जाएगी। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इस मामले की सुनवाई उसके पास चलने के बावजूद देश के दूसरे हाई कोर्ट उन मामलों पर फैसला दे सकते हैं जिनमें उपस्थिति नियमों को लेकर याचिकाएं लंबित हैं।
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फैसले को चुनौती देने में छह महीने क्यों लगे
सुनवाई के दौरान, पीठ ने वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा से (जो बीसीआई के अध्यक्ष भी हैं) पूछा कि उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने में उन्हें लगभग छह महीने क्यों लगे। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, 'सभी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय (एनएलयू) प्रभावित हो रहे हैं।' इसके साथ ही यह भी कहा कि छात्र अनिवार्य उपस्थिति नहीं चाहते हैं।
पीठ ने कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय का फैसला छात्रों को कक्षाओं में भाग लेने से नहीं रोकता है। इसमें यह देखा गया कि अगर छात्र कक्षाओं में उपस्थित नहीं होते हैं, तो राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (एनएलयू) और अन्य विश्वविद्यालयों के शिक्षक क्या करेंगे। इस मामले में पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाई जानी चाहिए। पीठ ने कहा क्या यह फैसला छात्रों को कक्षाओं में न जाने का अधिकार देता है?
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अपने फैसले में उच्च न्यायालय ने कहा था, 'भारत में किसी भी मान्यता प्राप्त विधि महाविद्यालय, विश्वविद्यालय या संस्थान में नामांकित किसी भी छात्र को न्यूनतम उपस्थिति की कमी के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा या आगे की शैक्षणिक गतिविधियों या कैरियर की प्रगति से वंचित नहीं किया जाएगा।उच्च न्यायालय ने बीसीआई को तीन वर्षीय और पांच वर्षीय एलएलबी पाठ्यक्रमों के लिए अनिवार्य उपस्थिति मानदंडों का पुनर्मूल्यांकन करने के लिए भी कहा था।
'महज भोजन और आवास सुविधाएं' बनकर रह जाएंगे
13 मई को, शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि अगर इस तरह की स्थिति को स्वीकार कर लिया जाए, तो राष्ट्रीय विश्वविद्यालय संघों और विधि कॉलेजों के छात्रावास 'महज भोजन और आवास सुविधाएं' बनकर रह जाएंगे।
उच्च न्यायालय ने कहा था कि उसका दृढ़ मत है कि सामान्य रूप से शिक्षा और विशेष रूप से विधिक शिक्षा के लिए उपस्थिति के मानदंडों को इतना कठोर नहीं बनाया जा सकता है कि वह मानसिक आघात का कारण बनें। छात्र की मृत्यु की तो बात ही छोड़ दें। इसने यह फैसला सुप्रीम कोर्ट द्वारा शुरू की गई और हाई कोर्ट में स्थानांतरित की गई एक संज्ञान याचिका का निपटारा करते हुए सुनाया था, जो 2016 में कानून के छात्र सुशांत रोहिल्ला की आत्महत्या से संबंधित थी, जिसे कथित तौर पर आवश्यक उपस्थिति की कमी के कारण सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने से रोक दिया गया था।
क्या है मामला?
कानून के तीसरे वर्ष के छात्र रोहिल्ला ने 10 अगस्त, 2016 को अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। आरोप था कि कॉलेज ने आवश्यक उपस्थिति न होने के कारण उन्हें सेमेस्टर परीक्षा में बैठने से रोक दिया था। उन्होंने एक सुसाइड नोट छोड़ा था जिसमें उन्होंने लिखा था कि वह असफल हैं और जीना नहीं चाहते।
उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया था कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग विनियम, 2023 के तहत सभी शैक्षणिक संस्थानों और विश्वविद्यालयों के लिए शिकायत निवारण समितियों (जीआरसी) का गठन करना अनिवार्य होगा। यह देखते हुए कि जीआरसी छात्रों के हितों की रक्षा के लिए हैं, जिसमें उनका मानसिक स्वास्थ्य भी शामिल है, इसने यूजीसी को परामर्श शुरू करने और यूजीसी नियमों में संशोधन पर विचार करने का निर्देश दिया था।