हर राज्य में कैंसर का सरकारी केंद्र: टाटा मेमोरियल तकनीकी साझेदार, मेडिकल कॉलेज व जिला अस्पताल जुड़ेंगे
हर राज्य में कैंसर का सरकारी केंद्र बनाने की पहल की गई है। 28 राज्यों में हब-स्पोक नेटवर्क बनेगा। टाटा मेमोरियल तकनीकी साझेदार के तौर पर जुड़ेगा। मेडिकल कॉलेज व जिला अस्पतालों को भी जोड़ा जाएगा।
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कैंसर के इलाज के लिए मरीजों को बड़े शहरों का रुख न करना पड़े, इसके लिए देश के 28 राज्यों में सरकारी कैंसर उपचार का हब-स्पोक नेटवर्क विकसित करने की सिफारिश की गई है। संसदीय स्थायी समिति ने हर राज्य में एक सरकारी अस्पताल को मुख्य कैंसर केंद्र और उसके साथ एम्स, सरकारी मेडिकल कॉलेज व अन्य सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों को जोड़ने पर जोर दिया गया है।
समिति ने कैंसर की जांच, उपचार, प्रशिक्षण और मरीजों की देखभाल के मानकों को बेहतर बनाने के लिए टाटा मेमोरियल सेंटर को राष्ट्रीय तकनीकी साझेदार बनाने की सिफारिश की है। मरीज को बड़े कैंसर अस्पताल भेजने के बजाय पहले जिला स्तर पर जांच और विशेषज्ञ की ऑनलाइन सलाह मिलेगी।
मरीज को क्या फायदा?
- शुरुआती जांच और कैंसर की पहचान स्थानीय स्तर पर हो सकेगी।
- जटिल मामलों को स्टेट कैंसर हब भेजा जा सकेगा।
- मुंबई-दिल्ली जैसे बड़े शहरों की दौड़ कम होगी।
- जिला अस्पतालों के डॉक्टरों को विशेषज्ञों से प्रशिक्षण मिलेगा।
- पैथोलॉजी, रेडियोलॉजी और उपचार की गुणवत्ता में एकरूपता आएगी।
- गंभीर मरीजों के लिए हब-स्पोक रेफरल व्यवस्था विकसित होगी।
क्या है हब-स्पोक व्यवस्था?
इसमें एक बड़े सरकारी अस्पताल को मुख्य केंद्र बनाया जाएगा। उससे जुड़े मेडिकल कॉलेज और जिला अस्पताल सहयोगी केंद्र की तरह काम करेंगे। मुख्य केंद्र से विशेषज्ञ डॉक्टरों की सलाह, जांच की विशेषज्ञता, उपचार संबंधी मार्गदर्शन और प्रशिक्षण छोटे केंद्रों तक पहुंचाया जाएगा।
कैसे काम करेगा हब-स्पोक मॉडल?
- स्थानीय स्तर पर प्रारंभिक जांच होगी। गंभीर या जटिल मामलों को स्पोक सेंटर के जरिए स्टेट कैंसर हब भेजा जाएगा।
650 करोड़ में मुख्य केंद्र, 400 करोड़ में इकाई
समिति के अनुसार, एक मॉडल कैंसर केंद्र तैयार करने में करीब 650 करोड़ रुपये और सालाना करीब 120 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं। वहीं, इससे जुड़े जिला या मेडिकल कॉलेज स्तर के केंद्र के लिए करीब 400 करोड़ रुपये शुरुआती लागत और 40 करोड़ रुपये सालाना खर्च का अनुमान है।
विशेषज्ञों की कमी सबसे बड़ी चुनौती
समिति ने ऑन्कोलॉजिस्ट, रेडियोलॉजिस्ट और पैथोलॉजिस्ट समेत प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मियों की कमी को बड़ी चुनौती बताया है। केवल मेडिकल सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञ डॉक्टरों और अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बड़े स्तर पर प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करने की जरूरत बताई गई है।
मेडिकल सीटें बढ़ाने से नहीं चलेगा काम
समिति ने कहा कि कैंसर मरीजों की बढ़ती संख्या के मुकाबले विशेषज्ञों की उपलब्धता कम है। इसलिए केवल मेडिकल सीटें बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। विशेषज्ञ डॉक्टरों और संबद्ध स्वास्थ्यकर्मियों के लिए बड़े स्तर पर प्रशिक्षण व्यवस्था विकसित करनी होगी।
टीएमसी के लिए अकेले संभव नहीं
समिति का मानना है कि देशभर में इतने हब और स्पोक तैयार करना अकेले टाटा मेमोरियल सेंटर के लिए संभव नहीं होगा। इसलिए पहले से मौजूद सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों की क्षमता का इस्तेमाल कर राष्ट्रीय कैंसर देखभाल नेटवर्क को मजबूत किया जाना चाहिए।