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Hindi News ›   India News ›   Explainer: The Story of Lijjat Papad That Will Now Be Taught in NCERT: How Did It All Begin?

एक्सप्लेनर: जिस लिज्जत पापड़ की कहानी अब एनसीईआरटी में पढ़ाई जाएगी, कैसे शुरू हुआ था उसका सफर?

Thu, 01 Oct 2026 05:40 AM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: रिया दुबे Updated Thu, 01 Oct 2026 05:40 AM IST
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सार
सिर्फ चार पैकेट पापड़ से शुरू हुई एक छोटी-सी पहल कैसे हजारों महिलाओं की पहचान बन गई? गिरगांव की छत से शुरू हुआ लिज्जत का यह सफर अब एनसीईआरटी की किताब तक पहुंच चुका है। आखिर सात महिलाओं के इस छोटे से प्रयोग ने कैसे बनाई अपनी इतनी बड़ी जगह? आइए जानते हैं।
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Explainer: The Story of Lijjat Papad That Will Now Be Taught in NCERT: How Did It All Begin?
लिज्जत पापड़ की कहानी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

तारीख 15 मार्च 1959। मुंबई के गिरगांव की एक पुरानी रिहायशी इमारत की छत पर सात महिलाएं इकट्ठा हुईं। उन्होंने पापड़ बनाने का काम शुरू किया। पहले दिन सिर्फ चार पैकेट पापड़ तैयार हुए। शुरुआत के लिए रुपये उधार लिए गए थे। यहीं से एक कहानी शुरू हुई। बदलाव की, सफलता की, आत्मनिर्भरता की। अब ये कहानी एनसीईआरटी की किताब में भी पढ़ाई जाएगी। ये कहानी है श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़ की। 



एनसीईआरटी की कक्षा नौवीं की सामाजिक विज्ञान की नई किताब ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड’ में इसे शामिल किया गया है। इसे 'विचार से स्टार्टअप तक' अध्याय में उद्यमिता की भारतीय कहानियों के साथ जगह दी गई है। नई किताब में आधुनिक भारत के विकास, व्यक्तिगत वित्त, सरकारी नीतियों, आयकर की गणना और भारतीय कारोबारी मॉडल जैसे विषय भी शामिल किए गए हैं। 


लिज्जत की कहानी कैसे शुरू हुई? इसे शुरू करने वाली महिलाओं को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा? संस्थान की मौजूदा स्थिति क्या है? आइए जानते हैं...

सदियों से भारतीय थाली का हिस्सा रहा पापड़

पापड़ भारत के पारंपरिक खाद्य पदार्थों में शामिल है। भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास कार्यालय की परियोजना रिपोर्ट के अनुसार, पापड़ भारतीय आहार में प्राचीन समय से लोकप्रिय रहा है। इसे आमतौर पर दालों के पाउडर, मसालों और नमक से तैयार आटे से बनाया जाता है।

देश के अलग-अलग हिस्सों में पापड़ के लिए अलग-अलग नाम प्रचलित हैं। पारंपरिक पापड़ को पापड़, पप्पड़, पप्पड़म, अप्पलम और खिचिया जैसे नामों से जाना जाता है।


समय के साथ पापड़ के आधुनिक रूपों में भी कई तरह के आकार और प्रकार सामने आए। अलग-अलग क्षेत्रों में इन्हें पापड़, फ्रायम्स, भुंगला, नड्डा, गोंगो, पोंगा, गोल्ड फिंगर, व्हाइट फिंगर, फिंगर और नली जैसे अलग-अलग नामों से जाना जाता है।

लिज्जत पापड़
लिज्जत पापड़ - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

कैसे शुरू हुई लिज्जत की कहानी?

1950 के दशक में आजाद भारत अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश कर रहा था। देश के सामने एक तरफ छोटे और ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देने की चुनौती थी, तो दूसरी तरफ बड़े शहरों में कारखानों और उद्योगों को बढ़ाने की कोशिश चल रही थी। उस दौर में देश की ज्यादातर फैक्ट्रियों का स्वामित्व सरकार के पास था।

महिलाओं के लिए हालात और भी मुश्किल थे। उन्हें शिक्षा और रोजगार के रास्ते में एक रूढ़िवादी और पुरुष प्रधान समाज की चुनौतियों का सामना करना पड़ता था।

इसी दौर में मुंबई की एक भीड़भाड़ वाली बस्ती में रहने वाली सात महिलाओं ने अपने परिवारों की आर्थिक मदद के लिए घर से काम करने का रास्ता तलाशा। जसवंतीबेन जमनादास पोपट, पार्वतीबेन रामदास थोदानी, उजंबेन नरनदास कुंडलिया, बानूबेन एन. तन्ना, लागूबेन अमृतलाल गोकानी, जयाबेन वी. विठलानी और दीवालीबेन लुक्का उस समय 20 से 30 साल की उम्र की थीं।

इन महिलाओं के पास कोई बड़ी पूंजी नहीं थी। उनका विचार सीधा था कि घर से काम किया जाए और पीढ़ियों से महिलाओं के बीच चली आ रही खाना बनाने की कला का इस्तेमाल करके कमाई की जाए।

लिज्जत पापड़
लिज्जत पापड़ - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

80 रुपये से शुरू हुआ कारोबार

लिज्जत की मौजूदा अध्यक्ष स्वाति पराडकर ने एक इंटरव्यू के दौरान बताया कि महिलाओं के सामने पहली मुश्किल कच्चा माल खरीदने के लिए पैसे की थी। इसके लिए उन्होंने सामाजिक कार्यकर्ता छगनलाल करमशी पारेख से आर्थिक मदद मांगी।

लेकिन पापड़ तैयार होने के बाद एक नई परेशानी सामने आई। उन्हें पापड़ खरीदने वाले ग्राहक नहीं मिल रहे थे। इस स्थिति में महिलाओं को दोबारा पारेख के पास मदद के लिए जाना पड़ा।

पारेख ने उन्हें फिर 80 रुपये दिए, लेकिन इस बार एक शर्त रखी कि महिलाएं उन्हें 200 रुपये वापस करेंगी। महिलाएं उन्हें 'बाप्पा' कहती थीं, जिसका अर्थ पिता होता है।

पारेख और कुछ अन्य सामाजिक कार्यकर्ता इन महिलाओं के बनाए पापड़ स्थानीय दुकानदारों तक लेकर गए। दुकानदारों ने पापड़ रखने के लिए एक शर्त रखी कि भुगतान उत्पाद बिकने के बाद किया जाएगा।

सिर्फ एक दुकानदार ऐसा था, जिसने महिलाओं को तुरंत भुगतान करने की सहमति दी। स्वाति पराडकर के मुताबिक, वह दुकानदार रोजाना चार से छह पैकेट खरीदने लगा। धीरे-धीरे महिलाओं के बनाए पापड़ लोकप्रिय होने लगे।

लिज्जत पापड़
लिज्जत पापड़ - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

कर्मचारी नहीं, सह-मालिक बनीं महिलाएं

जैसे-जैसे काम बढ़ा, इसमें और महिलाएं जुड़ती गईं। लेकिन वे इस समूह में कर्मचारी बनकर नहीं आईं, बल्कि सह-मालिक के रूप में शामिल हुईं और उन्हें फैसले लेने में भी भागीदारी मिली। गुजराती में महिलाएं एक-दूसरे को 'बेन' यानी बहन कहकर बुलाती हैं।

लिज्जत को एक कंपनी के बजाय सहकारी व्यवस्था के तौर पर देखा जाता है। पराडकर के अनुसार, अध्यक्ष होने के बावजूद वे इसकी मालिक नहीं हैं। सभी महिलाएं सह-मालिक हैं, उनके अधिकार बराबर हैं और मुनाफे के साथ नुकसान भी सभी साझा करती हैं।

'लाज्जत' से बना 'लिज्जत'

कई साल तक महिलाएं अपने पापड़ तैयार करती रहीं, लेकिन उनके उत्पादों पर लिज्जत नाम का ब्रांड नहीं था। फिर 1966 में खादी विकास एवं ग्रामोद्योग आयोग ने, जो छोटे ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देने वाली सरकारी संस्था थी, महिलाओं को अपने उत्पाद के लिए एक ब्रांड नाम रखने का सुझाव दिया।

इसके बाद सहकारी समूह ने अखबारों में विज्ञापन देकर लोगों से नाम सुझाने को कहा। कई नाम मिले, लेकिन समूह की ही एक महिला ने 'लाज्जत' नाम सुझाया।

इसके बाद इस नाम में थोड़ा बदलाव किया गया और इसे 'लिज्जत' बनाया गया। स्वाति पराडकर के अनुसार, गुजराती में लिज्जत का अर्थ 'स्वाद' होता है।

लिज्जत पापड़
लिज्जत पापड़ - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

संस्थान ने अपनाया आत्मनिर्भरता का रास्ता

संस्थान के अनुसार, उसने किसी भी तरफ से चैरिटी, दान, उपहार या अनुदान स्वीकार नहीं किया। इसके उलट, सदस्य महिलाएं अपनी क्षमता के अनुसार अच्छे कार्यों के लिए समय-समय पर सामूहिक रूप से योगदान करती हैं।

समय के साथ शुरुआती समूह में और महिलाएं जुड़ती गईं। सदस्यता बढ़कर पूरे भारत में 45 हजार से ज्यादा महिलाओं तक पहुंच गई। संस्थान अपनी सफलता का श्रेय सदस्य महिलाओं के प्रयास और 'महिला की ताकत' में उनके अटूट विश्वास को देता है।

पापड़ से आगे बढ़ा कारोबार

लिज्जत का काम सिर्फ पापड़ तक सीमित नहीं रहा। संगठन ने समय के साथ कई दूसरे उत्पाद भी अपने काम में शामिल किए। इनमें पापड़, अप्पलम, मसाला, गेहूं का आटा, चपाती, सासा डिटर्जेंट पाउडर, सासा डिटर्जेंट केक यानी टिकिया और सासा लिक्विड डिटर्जेंट शामिल हैं।

इन उत्पादों और कामों के लिए अलग-अलग डिवीजन बनाए गए हैं। मुंबई के वाशी में फ्लोर डिवीजन है, जहां उड़द दाल और मूंग दाल से आटा तैयार किया जाता है। इसी जगह प्रिंटिंग डिवीजन भी है। बांद्रा में विज्ञापन डिवीजन है।

चपाती के डिवीजन बांद्रा, वडाला, मुलुंड और कांदिवली में हैं। काशी-मीरा रोड पर पॉलीप्रोपाइलीन से जुड़ा सेटअप है, जबकि पुणे के सनसवाड़ी में डिटर्जेंट पाउडर और डिटर्जेंट केक बनाने की यूनिट है। संगठन का केंद्रीय कार्यालय मुंबई में है और देश के अलग-अलग राज्यों में 83 शाखाएं और 27 डिवीजन हैं।

लिज्जत पापड़
लिज्जत पापड़ - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

21 सदस्यों की प्रबंध समिति संभालती है कामकाज

लिज्जत की संगठनात्मक व्यवस्था 21 सदस्यों की प्रबंध समिति पर आधारित है। इसके शीर्ष स्तर पर छह पदाधिकारी होते हैं। इनमें एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष, दो सचिव और दो कोषाध्यक्ष शामिल हैं।

मौजूदा पदाधिकारियों में स्वाति आर. पराडकर अध्यक्ष, लक्ष्मी सी. सुवर्णा उपाध्यक्ष, प्रियंका जी. रेडकर और वसुधा आर. सारंग सचिव व साक्षी एस. पालव और सुहासिनी एस. माने कोषाध्यक्ष हैं। लिज्जत खुद को महिलाओं का, महिलाओं द्वारा और महिलाओं के लिए संगठन बताता है। वर्ष 2023 में संस्थान का सालाना कारोबार 1,600 करोड़ रुपये था।

क्या है संस्थान के कामकाज की नींव?

लिज्जत अपने काम करने के तरीके को तीन अवधारणाओं का मेल बताता है,व्यवसाय, परिवार और समर्पण। संस्थान के अनुसार, इन तीनों को पूरी तरह और समान रूप से अपनाया जाता है और इसी मेल से लिज्जत की अपनी कार्यशैली विकसित हुई।

व्यवसाय के स्तर पर शुरुआत से ही अच्छी गुणवत्ता वाले उत्पाद उचित कीमत पर तैयार करने पर जोर रहा है। परिवार की अवधारणा के तहत संस्थान और उसकी सदस्य महिलाओं के बीच आपसी लगाव, चिंता और विश्वास को महत्व दिया जाता है। इसके अनुसार, संस्थान के कामकाज को उसी तरह संभाला जाता है जैसे परिवार अपने रोजमर्रा के घरेलू काम करता है।

समर्पण को संस्थान सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा बताता है। उसके अनुसार, यह केवल आजीविका कमाने की जगह नहीं है। सदस्य, कर्मचारी और शुभचिंतक अपनी ऊर्जा व्यक्तिगत लाभ के बजाय सभी के लाभ के लिए लगाने की भावना के साथ काम करते हैं। संस्थान इसी विचार को ‘काम ही पूजा है’ से जोड़ता है।

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