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Explainer: मेकेदातु परियोजना पर सुप्रीम कोर्ट तक हुआ है संघर्ष, अब तमिलनाडु में सर्वदलीय बैठक की मांग क्यों?

Mon, 06 Jul 2026 05:29 AM IST
Pavan न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Pavan Updated Mon, 06 Jul 2026 05:29 AM IST
सार

क्या कर्नाटक का मेकेदातु बांध तमिलनाडु के किसानों के लिए नई मुश्किल बन सकता है? क्या कावेरी जल विवाद फिर बड़ा राजनीतिक और कानूनी मुद्दा बनने जा रहा है? इन सवालों के बीच मेकेदातु परियोजना एक बार फिर चर्चा में है। तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी पीएमके ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। किसानों का कहना है कि कर्नाटक के आश्वासनों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, जबकि राज्य सरकार नए ट्रिब्यूनल की मांग कर रही है। दूसरी ओर, कर्नाटक इस परियोजना को बंगलूरू की पेयजल जरूरतों और विकास के लिए जरूरी बता रहा है। पढ़ें क्या है विवाद और अब तक इसमें क्या-क्या हुआ...

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Explainer: What is Mekedatu project? Supreme Court has dismissed Tamil Nadu govt petition; All-party Meeting
क्या है मेकेदातु बांध विवाद? - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

कावेरी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर कर्नाटक सरकार की उस योजना का विरोध किया है, जिसमें कावेरी नदी पर मेकेदातु में पेयजल और बैलेंसिंग जलाशय बनाने की बात कही गई है। तमिलनाडु को आशंका है कि कर्नाटक अब इस परियोजना की संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) केंद्र को सौंपने की तैयारी कर रहा है। यह स्थिति तब बनी, जब सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2025 के अपने फैसले पर पुनर्विचार की तमिलनाडु की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि कर्नाटक के प्रस्तावित बांध को चुनौती देना अभी समय से पहले है।
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कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच दशकों से विवाद चलता आ रहा है। अब इसी नदी पर प्रस्तावित मेकेदातु बांध परियोजना को लेकर दोनों राज्यों के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। कर्नाटक इस परियोजना को जल्द शुरू करना चाहता है, जबकि तमिलनाडु इसका लगातार विरोध कर रहा है। तमिलनाडु का कहना है कि इस बांध से राज्य को मिलने वाले कावेरी के पानी पर असर पड़ेगा और किसानों को नुकसान होगा।

क्या है मेकेदातु परियोजना?
मेकेदातु का अर्थ है 'बकरी की छलांग'। यह कावेरी और अर्कावती नदियों के संगम पर स्थित एक गहरी घाटी है। यह जगह कर्नाटक के रामनगर जिले के कनकपुरा तालुक में है और बंगलूरू से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित है। कर्नाटक सरकार ने वर्ष 2013 में यहां बहुउद्देश्यीय जलाशय बनाने की योजना पेश की थी। शुरुआत में इसकी अनुमानित लागत करीब 5,912 करोड़ रुपये थी, जो बाद में बढ़कर लगभग 9,000 करोड़ रुपये हो गई। इस परियोजना के तहत करीब 67.16 टीएमसी (हजार मिलियन घन फुट) पानी संग्रह करने की क्षमता वाला जलाशय बनाया जाना प्रस्तावित है।



परियोजना का उद्देश्य क्या है?
कर्नाटक सरकार का कहना है कि इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य बंगलूरू, रामनगर और आसपास के इलाकों में बढ़ती आबादी के लिए पेयजल उपलब्ध कराना है। इसके अलावा इस परियोजना से 400 मेगावाट बिजली भी पैदा की जाएगी। सरकार का दावा है कि इसमें सिंचाई की कोई नई योजना शामिल नहीं है और तमिलनाडु को उसके हिस्से का पानी देने के बाद ही अतिरिक्त पानी संग्रह किया जाएगा।

बांध पर क्यों है विवाद?
इस विवाद को सुलझाने के लिए कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण और बाद में सुप्रीम कोर्ट ने पानी के बंटवारे का फैसला दिया था। तमिलनाडु का कहना है कि यदि कर्नाटक मेकेदातु बांध बनाता है, तो वह पानी रोक सकता है, जिससे राज्य के कावेरी डेल्टा में खेती प्रभावित होगी। वहीं कर्नाटक का कहना है कि वह तमिलनाडु के हिस्से का पानी नहीं रोकेगा।
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तमिलनाडु क्यों कर रहा है विरोध?
तमिलनाडु का मानना है कि मेकेदातु बांध बनने से कावेरी नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होगा। इससे राज्य के किसानों के लिए उपलब्ध पानी कम हो सकता है और सिंचाई पर असर पड़ेगा। तमिलनाडु का यह भी कहना है कि यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के अंतिम फैसले की भावना के खिलाफ है। न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों के बीच पानी के बंटवारे का स्पष्ट फार्मूला तय किया था। पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता ने 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस परियोजना को मंजूरी नहीं देने की मांग की थी। उनका तर्क था कि कोई भी ऊपरी धारा वाला राज्य, निचली धारा वाले राज्य की सहमति के बिना अंतरराज्यीय नदी पर ऐसा निर्माण नहीं कर सकता।

सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
तमिलनाडु सरकार ने 2013 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर मेकेदातु और शिवनासमुद्र परियोजनाओं पर रोक लगाने की मांग की थी। राज्य का कहना था कि इन परियोजनाओं का निर्माण केंद्र सरकार की एजेंसी के माध्यम से और सभी राज्यों की सहमति से होना चाहिए।

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कर्नाटक ने क्या कदम उठाए?
फरवरी 2017 में कर्नाटक की तत्कालीन सरकार ने इस परियोजना को सिद्धांततः मंजूरी दी। इसके बाद परियोजना की प्री-फीजिबिलिटी रिपोर्ट केंद्रीय जल आयोग को भेजी गई, लेकिन कुछ कमियों के कारण उसे वापस कर दिया गया। बाद में रिपोर्ट में सुधार कर दोबारा प्रस्तुत करने की प्रक्रिया शुरू हुई। हाल के वर्षों में कर्नाटक सरकार लगातार परियोजना को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है और संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर रही है।

कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण की भूमिका
16 फरवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कावेरी जल प्रबंधन प्राधिकरण का गठन किया गया। इसका उद्देश्य कावेरी नदी के पानी के बंटवारे पर अदालत के आदेशों को लागू कराना और भविष्य के विवादों की निगरानी करना है। हालांकि, तमिलनाडु का कहना है कि प्राधिकरण बनने के बावजूद कर्नाटक किसी भी नई परियोजना पर एकतरफा फैसला नहीं ले सकता। राज्य का आरोप है कि बिना उसकी सहमति के परियोजना को आगे बढ़ाना सुप्रीम कोर्ट के आदेश और संघीय व्यवस्था की भावना के खिलाफ है।
 

क्या है मौजूदा स्थिति?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए कहा कि अभी परियोजना को चुनौती देना समय से पहले है। इसके बाद कर्नाटक संशोधित डीपीआर को आगे बढ़ाने की तैयारी में है, जबकि तमिलनाडु विधानसभा ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर साफ कर दिया है कि वह मेकेदातु परियोजना का किसी भी हालत में समर्थन नहीं करेगा।

विवाद का मूल कारण क्या?
विवाद का सबसे बड़ा कारण कावेरी नदी के पानी पर अधिकार और उसके उपयोग को लेकर दोनों राज्यों की अलग-अलग सोच है। कर्नाटक का कहना है कि यह परियोजना केवल पेयजल और बिजली उत्पादन के लिए है, जबकि तमिलनाडु को डर है कि इससे उसके हिस्से का पानी कम हो जाएगा और लाखों किसानों की सिंचाई प्रभावित होगी। यही वजह है कि मेकेदातु परियोजना आज भी दोनों राज्यों के बीच सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक बनी हुई है।

विवाद पर नई राजनीति?
अब तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी पीएमके (पट्टाली मक्कल काची) ने राज्य सरकार से इस मुद्दे पर तुरंत सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि कर्नाटक तेजी से बांध परियोजना को आगे बढ़ा रहा है, जबकि तमिलनाडु सरकार प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। इससे कावेरी डेल्टा के किसानों में चिंता बढ़ गई है। 

पीएमके नेता ने क्या कहा?



नए ट्रिब्यूनल की मांग पर किसानों की आपत्ति
हाल ही में तमिलनाडु विधानसभा ने मेकेदातु विवाद के समाधान के लिए नया ट्रिब्यूनल बनाने की मांग वाला प्रस्ताव पारित किया था। अंबुमणि रामदास का कहना है कि किसान इस प्रस्ताव से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि नया ट्रिब्यूनल बनाने से मामला और लंबा खिंच सकता है और इससे कर्नाटक को फायदा मिल सकता है।
 

सर्वदलीय बैठक की मांग क्यों?
पीएमके का आरोप है कि राज्य सरकार ने विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने के अलावा कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। पार्टी ने मांग की है कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय सभी राजनीतिक दलों की बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय करें, ताकि कर्नाटक को बांध निर्माण से रोका जा सके और तमिलनाडु के जल अधिकारों की रक्षा हो सके।

किसानों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
कावेरी डेल्टा तमिलनाडु का प्रमुख कृषि क्षेत्र है। यहां की खेती काफी हद तक कावेरी नदी के पानी पर निर्भर है। किसानों को डर है कि यदि मेकेदातु बांध बन गया और पानी का प्रवाह कम हुआ, तो धान सहित कई फसलों की खेती प्रभावित हो सकती है। इसी वजह से किसान चाहते हैं कि राज्य सरकार इस मुद्दे पर जल्द और सख्त कदम उठाए। 

किसान संगठन की सीएम विजय से अपील
तमिलनाडु कावेरी किसान संगठन ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय से भी अपील की कि वे इस प्रोजेक्ट को शुरू होने से रोकने के लिए सभी जरूरी कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाएं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को तमिलनाडु के पानी के अधिकारों की रक्षा करने और कावेरी पर निर्भर लाखों किसानों की आजीविका बचाने के लिए कड़े कदम उठाने चाहिए।
 

कर्नाटक में विपक्ष का सरकार पर हमला
वहीं, मेकेदातु बांध को लेकर भाजपा नेता आर अशोक ने मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार पर निशाना साधा। उन्होंने तमिलनाडु कांग्रेस की चेतावनी पर उनकी चुप्पी पर सवाल उठाते हुए चेन्नई में भूख हड़ताल करने की चुनौती दी। आर अशोक ने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा- वही डीके शिवकुमार, जिन्होंने कभी राजनीतिक सत्ता के लिए मेकेदातु पदयात्रा नाटक का मंचन किया था, अब तमिलनाडु कांग्रेस के सामने चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? उन्होंने पूछा, 'मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, चुनाव से पहले आपने सत्ता हासिल करने के लिए मेकेदातु मार्च का नुक्कड़ नाटक किया था। अब आप चुप क्यों हैं?'

फिलहाल मेकेदातु परियोजना को लेकर दोनों राज्यों के बीच मतभेद जारी हैं। तमिलनाडु सरकार इस परियोजना का लगातार विरोध कर रही है, जबकि कर्नाटक इसे अपनी जरूरतों के लिए जरूरी बता रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर गतिविधियां तेज होने की संभावना है।
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