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फलता सीट के नतीजे का दूर तक दिखेगा असर: अल्पसंख्यक मतों में खेला, क्या TMC के समीकरण ध्वस्त होने की शुरुआत?
पीटीआई, कोलकाता
Published by: Devesh Tripathi
Updated Mon, 25 May 2026 10:17 AM IST
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सार
फलता विधानसभा सीट पर हुई धांधली के बाद चुनाव आयोग की मुस्तैदी और भारी सुरक्षा बलों की तैनाती के बीच पुनर्मतदान हुआ था। 87 प्रतिशत मतदाताओं की भारी भागीदारी के बाद मतगणना में भाजपा के देबांग्शु पांडा को विजयी घोषित किया गया। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक दूसरे नंबर पर वाम दल के प्रत्याशी रहे। कांग्रेस तीसरे नंबर पर, जबकि टीएमसी उम्मीदवार चौथे स्थान पर रहे।
फलता विधानसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी देबांग्शु पांडा जीते
- फोटो : ANI
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विस्तार
फलता विधानसभा सीट पर फिर से हुए चुनाव में भाजपा की शानदार जीत पश्चिम बंगाल में शायद ही किसी के लिए चौंकाने वाली बात होगी। राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के लिए यह नतीजा एक चिंताजनक संकेत है। टीएमसी की संगठनात्मक पकड़ कमजोर पड़ने के बीच इस नतीजे के पीछे छिपे चुनावी समीकरणों ने ऐसे संकेत दिए हैं जो एक निर्वाचन क्षेत्र की सीमा से परे जाकर दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।
लंबे समय से फलता जैसी सीटें टीएमसी के लिए एक निश्चित सफलता का चुनावी फॉर्मूला रही हैं। जहां बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मतदाता और हिंदू मतदाता, विशेष रूप से महिलाएं और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी, पार्टी के पक्ष में मतदान करते थे। हालांकि, रविवार का नतीजा बताता है कि यह समीकरण अब केवल कमजोर नहीं पड़ रहा, बल्कि फलता में यह पूरी तरह से पलट गया है।
ये भी पढ़ें: हिमंत सरकार ने विधानसभा में पेश किया UCC बिल: विपक्ष का भारी हंगामा, आदिवासी समाज को कानून से पूरी तरह राहत
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पुनर्मतदान में भाजपा की अभूतपूर्व जीत
निर्वाचन आयोग द्वारा अनियमितताओं के आरोपों के बाद रद्द किए गए पिछले चुनाव के बाद हुए इस पुनर्मतदान में न केवल भाजपा की एकतरफा जीत हुई, बल्कि मतदान के आंकड़ों में एक नाटकीय बदलाव देखने को मिला। भाजपा उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने 1,49,666 वोट हासिल कर 71 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर प्राप्त किया।
वहीं,सीपीआईएम के शंभू नाथ कुर्मी 40,645 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जो लगभग 20 प्रतिशत वोट थे। कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुर रज्जाक मोल्ला तीसरे स्थान पर रहे। टीएमसी के जहांगीर खान मात्र 7,783 वोट प्राप्त कर चौथे स्थान पर खिसक गए और अपना जमानत जब्त करा बैठे।
यह स्थिति तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब दो साल पहले इसी फलता ने, जो टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, टीएमसी को लगभग 89 प्रतिशत वोट दिए थे। तब बनर्जी को लगभग 1.68 लाख वोटों की बढ़त दिलाई थी।
वोट शेयर में भारी बदलाव
2021 में 36.75 प्रतिशत वोट शेयर से बढ़कर 71 प्रतिशत से अधिक तक पहुंचने वाली भाजपा की वृद्धि और टीएमसी के लगभग 56 प्रतिशत से घटकर मात्र 3.7 प्रतिशत पर आ जाने वाले पतन ने एक कहानी बयान की। वहीं, इस निर्वाचन क्षेत्र में राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक माने जाने वाले सीपीआईएम का लगभग 20 प्रतिशत वोट हासिल करना एक अलग कहानी कहता है।
फलता के नतीजे पर क्या बोले सियासी जानकार?
सियासी जानकारों के अनुसार, फलत सीट पर चुनाव में दो समानांतर रुझान देखे गए: भाजपा के पीछे हिंदू एकीकरण और अल्पसंख्यक मतदाताओं के कुछ वर्गों का टीएमसी से दूर सीपीआईएम की ओर झुकाव, जो टीएमसी के अलावा अन्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। फलता की लगभग 30 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, और पारंपरिक रूप से ऐसे निर्वाचन क्षेत्र टीएमसी के लिए अनुकूल रहे हैं।
क्या अल्पसंख्यक मतदाताओं ने छोड़ा टीएमसी का साथ?
राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, "भाजपा के भारी वोट शेयर ने हिंदू एकीकरण का संकेत दिया और पार्टी ने अल्पसंख्यक वोटों का एक वर्ग भी हासिल किया। स्पष्ट संकेत थे कि अल्पसंख्यक मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने सीपीआईएम की ओर रुख किया है, जहां से वे 2011 में टीएमसी के पास आए थे।" हालांकि बूथ-वार मतदान पैटर्न अभी सामने नहीं आए हैं, राजनीतिक हलकों में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वाम दलों को अल्पसंख्यक मतदाताओं के एक महत्वपूर्ण झुकाव से लाभ हुआ होगा।
यह ध्यान देने योग्य है कि 2008 के पंचायत चुनावों के बाद से पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोट धीरे-धीरे वाम दलों से टीएमसी की ओर स्थानांतरित हुए थे। जो 2009 के लोकसभा चुनावों में और अधिक स्पष्ट हुआ। 2011 में ममता बनर्जी की सत्ता में वापसी का एक प्रमुख स्तंभ बना।
टीएमसी के लिए क्यों है चिंताजनक संकेत?
पिछले डेढ़ दशक में तृणमूल कांग्रेस ने इस समर्थन को अपनी सबसे मूल्यवान राजनीतिक संपत्ति में बदल दिया था। लेकिन 293 सीटों पर 2026 के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने इस मजबूत आधार के हिलने के संकेत दिखाए हैं। इसमें अल्पसंख्यक वोट सीपीआईएम, कांग्रेस, इंडियन सेक्लयूलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी जैसे दलों के बीच बंटते हुए दिखाई दे रहे हैं।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
सीपीआईएम नेता सुजान चक्रवर्ती का दावा है कि अल्पसंख्यक अब टीएमसी की भाजपा को चुनौती देने की क्षमता में विश्वास खोने के बाद एक सियासी ठिकाना तलाश रहे हैं। उन्होंने कहा, "भाजपा पश्चिम बंगाल में एक वास्तविकता बन गई है और लोग अब टीएमसी को एक विपक्षी शक्ति के रूप में नहीं पा रहे हैं, वे स्वाभाविक रूप से कहीं और देख रहे हैं।"
वहीं, टीएमसी नेता कुणाल घोष ने इस व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि एक सीट पर पुनर्मतदान किसी व्यापक बदलाव को स्थापित नहीं कर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी पार्टी भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है।
डायमंड हार्बर मॉडल पर हमला
यह परिणाम सीधे तौर पर भाजपा के लंबे समय से चल रहे डायमंड हार्बर मॉडल पर हमले को भी बल देता है, जिसे अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक गढ़ के रूप में देखा जाता है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि इस फैसले ने उस क्षेत्र के आसपास संगठनात्मक अजेयता के दावों को पंचर कर दिया है। भाजपा नेता अमित मालवीय ने फलता के फैसले को टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी से जुड़े डायमंड हार्बर मॉडल का पतन बताया है।
ये भी पढ़ें: विपक्ष ने सरकार को घेरा: मनीष तिवारी बोले- तेल कंपनियों ने कमाए ₹77000 करोड़ का मुनाफा; फिर क्यों बढ़ रहे दाम?
नतीजों पर क्या बोले अभिषेक बनर्जी?
दूसरी ओर पुनर्मतदान में प्रचार से दूर रहे अभिषेक बनर्जी ने फलता में दोबारा चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है। उन्होंने गिनती में अनियमितताओं का आरोप लगाया। इसके साथ ही चुनाव आयोग पर कथित उत्पीड़न और चुनावी कदाचार की शिकायतों को संबोधित करने में विफलता का आरोप लगाया।
भविष्य की क्या होगी दिशा?
अब बड़ा सवाल यह नहीं है कि फलता एक अपवाद था या नहीं। यह सवाल हो सकता है कि क्या इस निर्वाचन क्षेत्र ने केवल टीएमसी के स्थानीय पतन को दर्शाया है, या इसने पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य के व्यापक पुनर्गठन के पहले दृश्य संकेत पेश किए हैं। कई वर्षों से, भाजपा की पश्चिम बंगाल रणनीति के दो मुख्य पहलू थे - हिंदू समुदाय को एकजुट करना और टीएमसी के सामाजिक गठबंधन को कमजोर करना। फलता ने इशारा किया है कि पहला पहलू शायद अपने लक्ष्य तक पहुंच चुका है। दूसरा पहलू शायद अब शुरू हो चुका है।
लंबे समय से फलता जैसी सीटें टीएमसी के लिए एक निश्चित सफलता का चुनावी फॉर्मूला रही हैं। जहां बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक मतदाता और हिंदू मतदाता, विशेष रूप से महिलाएं और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी, पार्टी के पक्ष में मतदान करते थे। हालांकि, रविवार का नतीजा बताता है कि यह समीकरण अब केवल कमजोर नहीं पड़ रहा, बल्कि फलता में यह पूरी तरह से पलट गया है।
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पुनर्मतदान में भाजपा की अभूतपूर्व जीत
निर्वाचन आयोग द्वारा अनियमितताओं के आरोपों के बाद रद्द किए गए पिछले चुनाव के बाद हुए इस पुनर्मतदान में न केवल भाजपा की एकतरफा जीत हुई, बल्कि मतदान के आंकड़ों में एक नाटकीय बदलाव देखने को मिला। भाजपा उम्मीदवार देबांग्शु पांडा ने 1,49,666 वोट हासिल कर 71 प्रतिशत से अधिक वोट शेयर प्राप्त किया।
वहीं,सीपीआईएम के शंभू नाथ कुर्मी 40,645 वोटों के साथ दूसरे स्थान पर रहे, जो लगभग 20 प्रतिशत वोट थे। कांग्रेस उम्मीदवार अब्दुर रज्जाक मोल्ला तीसरे स्थान पर रहे। टीएमसी के जहांगीर खान मात्र 7,783 वोट प्राप्त कर चौथे स्थान पर खिसक गए और अपना जमानत जब्त करा बैठे।
यह स्थिति तब और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब दो साल पहले इसी फलता ने, जो टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है, टीएमसी को लगभग 89 प्रतिशत वोट दिए थे। तब बनर्जी को लगभग 1.68 लाख वोटों की बढ़त दिलाई थी।
वोट शेयर में भारी बदलाव
2021 में 36.75 प्रतिशत वोट शेयर से बढ़कर 71 प्रतिशत से अधिक तक पहुंचने वाली भाजपा की वृद्धि और टीएमसी के लगभग 56 प्रतिशत से घटकर मात्र 3.7 प्रतिशत पर आ जाने वाले पतन ने एक कहानी बयान की। वहीं, इस निर्वाचन क्षेत्र में राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक माने जाने वाले सीपीआईएम का लगभग 20 प्रतिशत वोट हासिल करना एक अलग कहानी कहता है।
फलता के नतीजे पर क्या बोले सियासी जानकार?
सियासी जानकारों के अनुसार, फलत सीट पर चुनाव में दो समानांतर रुझान देखे गए: भाजपा के पीछे हिंदू एकीकरण और अल्पसंख्यक मतदाताओं के कुछ वर्गों का टीएमसी से दूर सीपीआईएम की ओर झुकाव, जो टीएमसी के अलावा अन्य विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। फलता की लगभग 30 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, और पारंपरिक रूप से ऐसे निर्वाचन क्षेत्र टीएमसी के लिए अनुकूल रहे हैं।
क्या अल्पसंख्यक मतदाताओं ने छोड़ा टीएमसी का साथ?
राजनीतिक विश्लेषक बिस्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार, "भाजपा के भारी वोट शेयर ने हिंदू एकीकरण का संकेत दिया और पार्टी ने अल्पसंख्यक वोटों का एक वर्ग भी हासिल किया। स्पष्ट संकेत थे कि अल्पसंख्यक मतदाताओं के एक बड़े वर्ग ने सीपीआईएम की ओर रुख किया है, जहां से वे 2011 में टीएमसी के पास आए थे।" हालांकि बूथ-वार मतदान पैटर्न अभी सामने नहीं आए हैं, राजनीतिक हलकों में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि वाम दलों को अल्पसंख्यक मतदाताओं के एक महत्वपूर्ण झुकाव से लाभ हुआ होगा।
यह ध्यान देने योग्य है कि 2008 के पंचायत चुनावों के बाद से पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोट धीरे-धीरे वाम दलों से टीएमसी की ओर स्थानांतरित हुए थे। जो 2009 के लोकसभा चुनावों में और अधिक स्पष्ट हुआ। 2011 में ममता बनर्जी की सत्ता में वापसी का एक प्रमुख स्तंभ बना।
टीएमसी के लिए क्यों है चिंताजनक संकेत?
पिछले डेढ़ दशक में तृणमूल कांग्रेस ने इस समर्थन को अपनी सबसे मूल्यवान राजनीतिक संपत्ति में बदल दिया था। लेकिन 293 सीटों पर 2026 के विधानसभा चुनावों के परिणामों ने इस मजबूत आधार के हिलने के संकेत दिखाए हैं। इसमें अल्पसंख्यक वोट सीपीआईएम, कांग्रेस, इंडियन सेक्लयूलर फ्रंट और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी जैसे दलों के बीच बंटते हुए दिखाई दे रहे हैं।
विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया
सीपीआईएम नेता सुजान चक्रवर्ती का दावा है कि अल्पसंख्यक अब टीएमसी की भाजपा को चुनौती देने की क्षमता में विश्वास खोने के बाद एक सियासी ठिकाना तलाश रहे हैं। उन्होंने कहा, "भाजपा पश्चिम बंगाल में एक वास्तविकता बन गई है और लोग अब टीएमसी को एक विपक्षी शक्ति के रूप में नहीं पा रहे हैं, वे स्वाभाविक रूप से कहीं और देख रहे हैं।"
वहीं, टीएमसी नेता कुणाल घोष ने इस व्याख्या को खारिज करते हुए कहा कि एक सीट पर पुनर्मतदान किसी व्यापक बदलाव को स्थापित नहीं कर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उनकी पार्टी भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी बनी हुई है।
डायमंड हार्बर मॉडल पर हमला
यह परिणाम सीधे तौर पर भाजपा के लंबे समय से चल रहे डायमंड हार्बर मॉडल पर हमले को भी बल देता है, जिसे अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक गढ़ के रूप में देखा जाता है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि इस फैसले ने उस क्षेत्र के आसपास संगठनात्मक अजेयता के दावों को पंचर कर दिया है। भाजपा नेता अमित मालवीय ने फलता के फैसले को टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी से जुड़े डायमंड हार्बर मॉडल का पतन बताया है।
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नतीजों पर क्या बोले अभिषेक बनर्जी?
दूसरी ओर पुनर्मतदान में प्रचार से दूर रहे अभिषेक बनर्जी ने फलता में दोबारा चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाया है। उन्होंने गिनती में अनियमितताओं का आरोप लगाया। इसके साथ ही चुनाव आयोग पर कथित उत्पीड़न और चुनावी कदाचार की शिकायतों को संबोधित करने में विफलता का आरोप लगाया।
भविष्य की क्या होगी दिशा?
अब बड़ा सवाल यह नहीं है कि फलता एक अपवाद था या नहीं। यह सवाल हो सकता है कि क्या इस निर्वाचन क्षेत्र ने केवल टीएमसी के स्थानीय पतन को दर्शाया है, या इसने पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य के व्यापक पुनर्गठन के पहले दृश्य संकेत पेश किए हैं। कई वर्षों से, भाजपा की पश्चिम बंगाल रणनीति के दो मुख्य पहलू थे - हिंदू समुदाय को एकजुट करना और टीएमसी के सामाजिक गठबंधन को कमजोर करना। फलता ने इशारा किया है कि पहला पहलू शायद अपने लक्ष्य तक पहुंच चुका है। दूसरा पहलू शायद अब शुरू हो चुका है।