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कीचड़ से उठकर दुनिया के मैदान तक: 138 साल से इतिहास लिख रहा है डूरंड कप; कैसे हुई थी इसकी शुरुआत?
सार
डूरंड कप केवल एक फुटबॉल टूर्नामेंट नहीं, बल्कि 138 वर्षों के इतिहास, परंपरा और भारतीय फुटबॉल की विरासत का प्रतीक है। 1888 में सैनिकों के बीच खेल भावना और अनुशासन बढ़ाने के उद्देश्य से शुरू हुई यह प्रतियोगिता आज एशिया का सबसे पुराना फुटबॉल टूर्नामेंट बन चुकी है। तीन ट्रॉफियों की अनोखी परंपरा, ऐतिहासिक विरासत और नए खिलाड़ियों को मंच देने की पहचान इसे दुनिया के सबसे खास फुटबॉल आयोजनों में शामिल करती है।
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राष्ट्रपति मुर्मु ने डूरंड कप की ट्रॉफियों का अनावरण किया
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
डूरंड कप की सबसे अनूठी पहचान उसकी तीन ट्रॉफियां हैं- डूरंड कप, प्रेसिडेंट्स कप और शिमला ट्रॉफी। एक विजेता और तीन ट्रॉफियां। यह परंपरा इसे दुनिया के फुटबॉल इतिहास में अलग पहचान देती है। मानो एक जीत के साथ अतीत की विरासत, वर्तमान की उपलब्धि और भविष्य की जिम्मेदारी- तीनों विजेता के हाथों में आ जाती हों।
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आखिर डूरंड कप की 138 साल की यात्रा इतनी खास क्यों है?
138 वर्षों में डूरंड कप ने दो विश्व युद्ध देखे। स्वतंत्रता आंदोलन का दौर देखा। आजादी और विभाजन की त्रासदी देखी। भारतीय फुटबॉल का स्वर्णिम दौर देखा और आधुनिक पेशेवर फुटबॉल के साथ खुद को भी बदला। 2019 के बाद कोलकाता इसका प्रमुख केंद्र बना और पूर्वी कमान के संरक्षण में यह प्रतियोगिता पूर्वी तथा पूर्वोत्तर भारत के कई शहरों तक पहुंची।
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डूरंड कप की शुरुआत कैसे हुई थी?
1888 में ब्रिटिश भारत के विदेश सचिव सर मॉर्टिमर डूरंड की पहल पर शुरू हुई इस प्रतियोगिता का उद्देश्य सैनिकों के बीच अनुशासन, टीम भावना और सौहार्द को बढ़ावा देना था। शुरुआती वर्षों में सैन्य रेजीमेंटों की टीमें इसमें हिस्सा लेती थीं। शिमला का अन्नाडेल मैदान इस ऐतिहासिक यात्रा का पहला पड़ाव बना। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह प्रतियोगिता आगे चलकर एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट के रूप में पहचानी जाएगी।
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डूरंड कप की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
डूरंड कप की असली ताकत उसकी उम्र नहीं, बल्कि उसकी स्मृतियां हैं। जब फुटबॉल मैदान के एक छोर से दूसरे छोर की ओर बढ़ता है, तो उसके साथ 138 वर्षों का इतिहास भी दौड़ता है। एक पल के लिए स्टेडियम में सन्नाटा छा जाता है और अगले ही पल गोल का शोर आसमान तक पहुंच जाता है। यही रोमांच डूरंड कप को बाकी प्रतियोगिताओं से अलग बनाता है।
इस बार का डूरंड कप क्या नई कहानी लिखेगा?
25 जुलाई से डूरंड कप एक बार फिर शुरू हो चुका है। 24 टीमें, छह ग्रुप, पांच शहर, छह मैदान और 43 मुकाबले। लेकिन इस पूरे सफर में सिर्फ जीत-हार का रोमांच नहीं होगा, बल्कि हर क्लब के सामने अपनी पहचान दर्ज कराने का अवसर भी होगा। शायद कोई नया सितारा उभरे, कोई अनजान खिलाड़ी लोगों की जुबान पर छा जाए, कोई गोल वर्षों तक याद रखा जाए और कोई टीम पहली बार ट्रॉफी उठाए। जब विजेता के हाथों में तीनों ट्रॉफियां होंगी, तब वह केवल एक टूर्नामेंट की जीत नहीं होगी, बल्कि उसमें शिमला का अन्नाडेल मैदान होगा, नंगे पैर दौड़ते खिलाड़ियों का जुनून होगा, कीचड़ से उठकर हरी घास तक पहुंचे भारतीय फुटबॉल का संघर्ष होगा और 138 वर्षों की अनगिनत स्मृतियां भी होंगी।
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अन्नाडेल मैदान से शुरू हुआ यह सफर आज कहां पहुंच चुका है?
कभी सैनिकों के बीच अनुशासन, टीम भावना और सौहार्द को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शिमला के अन्नाडेल मैदान पर शुरू हुए डूरंड कप ने एक लंबा सफर तय किया है। तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि आगे चलकर यही प्रतियोगिता एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल टूर्नामेंट के रूप में दुनिया भर में अपनी अलग पहचान बनाएगी।