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क्या है भारत में सोने का इतिहास: देश में कहां हैं खदानें, कितना होता है उत्पादन; आयात की जरूरत क्यों? जानें

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Sat, 31 Jan 2026 12:20 PM IST
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सार

भारत में सोने का क्या इतिहास है? जब दुनिया में 'सोना' चलन में आया, तब भारत में इस अमूल्य धातु का क्या किया जा रहा था? देश में सोने के उत्पादन के क्या आंकड़े हैं? भारत में कहां-कहां सोना निकलता है? अगर भारत इस धातु का उत्पादक है तो आयात कि जरूरत क्यों पड़ती है और यह आयात कितना है? आइये जानते हैं...

Gold History in Ancient India 4000 BC Gold Mines Kolar Gold Fields Bihar Karnataka Gold Ore explained news
भारत में सोने का इतिहास। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बीते कुछ महीनों से सोने और चांदी की कीमतें आसमान पर हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों ने नया रिकॉर्ड बनाया है। भारत में गुरुवार को सोना 1.71 लाख प्रति 10 ग्राम के नए रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में भी सोने की कीमतों में यह इजाफा जारी रहेगा। सोना आमतौर पर दुनिया में रिजर्व के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। यानी भौतिक मुद्रा में आने वाली गिरावट के दौर में सोना एक सुरक्षित ठिकाना रहा है। भारत में सोना सिर्फ व्यापारिक लिहाज से नहीं, बल्कि पारंपरिक और ऐतिहासिक रूप से भी जुटाया जाता रहा है। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत में सोने का क्या इतिहास है? जब दुनिया में 'सोना' चलन में आया, तब भारत में इस अमूल्य धातु का क्या किया जा रहा था? देश में सोने के उत्पादन के क्या आंकड़े हैं? भारत में कहां-कहां सोना निकलता है? अगर भारत इस धातु का उत्पादक है तो आयात कि जरूरत क्यों पड़ती है और यह आयात कितना है? आइये जानते हैं...
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जब दुनिया में बढ़ा सोने का चलन, तब भारत कहां था?

दुनिया में सोना मिलने और इसका इस्तेमाल बढ़ने का पहला सबूत करीब 6500 साल पहले मिलता है।

जिस दौरान दुनिया सोने का इस्तेमाल शुरू कर चुकी थी, भारत भी इसके प्रयोग में जुटा था। भारत ऐतिहासिक रूप से सोने का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता रहा है। इसे पवित्रता, शक्ति और देवत्व का प्रतीक माना जाता है।

1. प्राचीन काल (प्राचीनतम प्रमाण और सिंधु घाटी सभ्यता)

4000 ईसा पूर्व: भारत में सोने के उपयोग के सबसे शुरुआती प्रमाण कुणाल (हरियाणा) और जलीलपुर जैसे स्थलों से मिलते हैं।

3900 ईसा पूर्व-1700 ईसा पूर्व: सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा और मोहनजोदड़ो) के दौरान सोने का व्यापक उपयोग हुआ। खुदाई में सोने के मोती, कुंडल, हार और अन्य आभूषण मिले हैं।

1000 ईसा पूर्व: हेरिटेज यूनिवर्सिटी ऑफ केरल में प्रकाशित जर्नल के मुताबिक, दक्षिण भारत (धारवाड़ क्रेटन) में 2000 से 1000 ईसा पूर्व सोने के खनन के प्रमाण भी मिलते हैं। महापाषाण (Megalithic) संस्कृति के लोग दक्षिण भारतीय खदानों के खनन का कौशल रखते थे। इस दौरान बड़ी मात्रा में इंसानों के साथ दफन किया गया सोना पुरातत्व खोज में मिलता है, वहीं सोने का एक हिस्सा उस दौर की खुदाई में आभूषण के तौर पर मिलने के भी सबूत हैं।

2. प्रारंभिक ऐतिहासिक काल (सिक्कों और खनन का विकास)

लगभग 100 ईस्वी: कुषाण सम्राट विम कडफिसेस ने उपमहाद्वीप में पहले मानकीकृत सोने के सिक्के चलाए। 
400-600: गुप्त साम्राज्य के दौरान सिक्के व्यापक स्तर पर बनने लगे। समुद्रगुप्त ने छह अलग-अलग प्रकार के सोने के सिक्के जारी किए, जिन्हें कला का उत्कृष्ट नमूना माना जाता है।


3. मध्य काल और औपनिवेशिक काल

धार्मिक महत्व: भारतीय मंदिरों में सोने का विशाल भंडार जमा हुआ, जो आज लगभग 20,000 टन होने का अनुमान है।
खनन का विस्तार: 1500 से 1870 के बीच भारत में सोने के खनन की गतिविधियां लगातार जारी रहीं। मुगलों के बाद अंग्रेजों ने भी खनन जारी रखा।
ब्रिटिश काल: 1880 के करीब अंग्रेजों ने कर्नाटक में कोलार गोल्ड फील्ड्स (केजीएफ) की स्थापना की, जहां सोने का बड़ा भंडार पाया गया।


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4. आजादी के बाद का समय

1947 में देश आजाद हुआ तो भारत की जमीन में छिपे सोने पर देशवासियों का अधिकार हुआ। हालांकि, खदानों और खानों के सही रखरखाव और प्रबंधन के लिए सरकार ने तभी कड़े नियम लागू कर दिए। इतना ही नहीं सोने के आयात और निर्यात पर कड़ा नियंत्रण लागू हुआ, ताकि पूरी व्यवस्था लागू होने तक इसके अवैध खनन और व्यापार पर रोक लग सके। 

कड़े नियंत्रण का दौर (1947 - 1962)

गोल्डन लॉकडाउन: आजादी के तुरंत बाद, विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (FERA) 1947 को लागू कर दिया गया। इससे सोने के आयात और निर्यात पर कड़ा नियंत्रण लगा दिया गया।
रिजर्व प्रणाली में बदलाव: 1956 में भारत ने सोने पर आधारित 'प्रोपोर्शनल रिजर्व सिस्टम' को छोड़कर 'मिनिमम रिजर्व सिस्टम' को अपनाया।

स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम और कैरेट की सीमा (1963-1989)

स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम (1968): भारतीय रुपये के अवमूल्यन को रोकने और सोने के अत्यधिक आयात पर लगाम लगाने के लिए 1968 में यह कानून लाया गया।
14 कैरेट का नियम: इस दौरान आभूषणों के लिए सोने की शुद्धता को 14-कैरेट तक सीमित करने की कोशिश की गई, ताकि जनता में सोने की मांग कम हो सके।

उदारीकरण और नई योजनाएं (1990-1999)

बाजार का खुलना: 1990 में स्वर्ण नियंत्रण कानून को समाप्त कर दिया गया, जिससे सोने के मुक्त आयात के रास्ते खुले।
स्वर्ण जमा योजना: 1999 में सरकार ने सोने को जमा करने की योजना शुरू की, ताकि घरों और मंदिरों में रखे 'बेकार' सोने पर ब्याज कमाया जा सके और उसे अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाया जा सके।

आधुनिक काल (2000 से अब तक)

सबसे अहम खदान की बंदी: 2001 आर्थिक और पर्यावरणीय कारणों से कोलार गोल्ड फील्ड्स को बंद कर दिया गया, जिससे भारत के सोने के उत्पादन में गिरावट आई। 

पहुंच में आसानी: 2002 से बैंकों ने और 2008 से डाकघरों ने सोने के सिक्कों की बिक्री शुरू की।

डिजिटल सोना: 2007 में गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स (ईटीएफ) की शुरुआत हुई, जिससे सोने में निवेश करना और उसे सुरक्षित रखना आसान हो गया।

रिकॉर्ड मांग: 2010 तक भारत में सोने की मांग अपने ऐतिहासिक स्तर 1001.7 टन तक पहुंच गई थी।

भारतीय स्वर्ण सिक्का (IGC): 2015 के करीब राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में 'इंडियन गोल्ड कॉइन' लॉन्च किया गया।

नई खोज: भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में लगभग 700 टन स्वर्ण अयस्क के भंडार की खोज की, हालांकि इसका अनुसंधान अभी बाकी है। 

सोने की एक खदान सक्रिय: मौजूदा समय में कर्नाटक की हट्टी खदान भारत की एकमात्र सक्रिय सोने की खदान है, जो प्रति वर्ष लगभग 1.8 टन सोना पैदा करती है। इस खदान का इतिहास 2,000 साल से भी अधिक पुराना है (पूर्व-अशोक काल), जहां प्राचीन खनिक 2300 फीट की गहराई तक काम करते थे।

भारत में सोने के उत्पादन के क्या आंकड़े हैं?

भारत में सोने का घरेलू उत्पादन इसकी खपत की तुलना में बहुत कम है। वर्तमान में भारत अपनी जरूरत का अधिकांश सोना (लगभग 800 मीट्रिक टन सालाना) आयात करता है, जबकि घरेलू खदानों से उत्पादन काफी सीमित है।

उत्पादन की मात्रा: भारत में सोने का खनन उत्पादन बहुत कम स्तर पर है। 2020 में भारत का कुल स्वर्ण खनन उत्पादन मात्र 1.6 टन था, जबकि 2019 में यह 1.9 टन रहा था।

प्रमुख सक्रिय खदान: कर्नाटक के रायचूर जिले में स्थित हट्टी गोल्ड माइन्स वर्तमान में भारत की एकमात्र प्रमुख सक्रिय स्वर्ण खदान है। यह प्रति वर्ष लगभग 1.8 टन सोने का उत्पादन करती है।

अन्य स्रोत: प्राथमिक खनन के अलावा, सोने का उत्पादन तांबे के उप-उत्पाद के रूप में होता है। गुजरात के दहेज में बिरला कॉपर स्मेल्टर घरेलू और आयातित तांबा सांद्रता से सोना निकालता है, जिसने 2020 में छह टन उत्पादन किया था। झारखंड में कुंदरकोचा खदान भी सक्रिय है, लेकिन वहां से उत्पादन बहुत कम (2018-19 में मात्र 3 किलोग्राम) है।

भारत में कितना सोने का भंडार खोजा जा चुका?

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण और अन्य आंकड़ों के मुताबिक, भारत में सोने के अयस्क के बड़े भंडार मौजूद हैं, जिन तक या तो पहुंचा नहीं जा सका है या फिर इनके अनुसंधान की कोशिशें आगे नहीं बढ़ाई गईं। भारत में लगभग 51.82 करोड़ टन प्राथमिक सोने के अयस्क मौजूद होने का अनुमान है।


* 2021-22 तक के हिस्सेदारी के अनुमानित आंकड़े

छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में देश का 5.22% सोना मौजूद होने का अनुमान है।

शीर्ष राज्य: संसाधनों की उपलब्धता के मामले में बिहार शीर्ष पर है, उसके बाद राजस्थान, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश आते हैं। बिहार में संसाधन अधिक हैं, लेकिन इनमें से अधिकतर सर्वे पर आधारित हैं। इन जगहों पर सोने की मौजूदगी को लेकर अनुसंधान जारी हैं। 

फिलहाल भारत के कुल आर्थिक रूप से निकालने योग्य स्वर्ण भंडार का 88% हिस्सा अकेले कर्नाटक में स्थित है। इसके बाद आंध्र प्रदेश का नंबर है। 


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मौजूदा समय में भारत में कितना सोने का उत्पादन?



* आंकड़े 2021-22 तक के

भारत आज भी दुनिया के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है, जो हर साल लगभग 800 मीट्रिक टन सोने का आयात करता है।

क्या हैं भविष्य की संभावनाएं?

भारत में सोने के भंडार होने के बावजूद इसका खनन काफी कम है। इसके पीछे कई चुनौतियां रही हैं। जैसे विनियामक बाधाएं, बुनियादी ढांचे की समस्या और उपकरणों की कमी। इसके चलते भारत हर साल करीब 800 मीट्रिक टन सोना आयात करता है। 

भारत में सोने के उत्पादन में क्या चुनौतियां रहीं?

1. प्रशासनिक चुनौतियां
  • भारत में खनन लाइसेंस प्राप्त करने की प्रक्रिया बहुत जटिल और लंबी है, जिसमें 10 से 15 अलग-अलग एजेंसियों से मंजूरी की आवश्यकता होती है। 
  • जिन कंपनियों के पास खोज का लाइसेंस है, वे सफलता के बाद खनन पट्टे के लिए दावा नहीं कर सकते, इससे खोज वाली कंपनियां फायदे में नहीं रहतीं। 

2. उच्च कर और आयात शुल्क 
  • खनन के लिए जरूरी विशेषज्ञ उपकरणों और उन्नत तकनीक पर आयात कर काफी ज्यादा है। 
  • भारत में इन उपकरणों का विकल्प मौजूद न होने के कारण कंपनियों को इन्हें ऊंचे दामों पर आयात करना पड़ता है, जिससे पूंजीगत लागत बढ़ जाती है।

3. बुनियादी ढांचे का अभाव
  • भारत के अधिकांश प्रमुख स्वर्ण क्षेत्र दूरदराज के स्थानों पर स्थित हैं, जहां पहुंच काफी मुश्किल होती है।
  • इन क्षेत्रों में सड़क और रेल संपर्क की कमी है, ऐसे में जरूरी सामग्री-उपकरणों को खदान तक लाना-ले जाना महंगा और कठिन होता है।

सरकार ने इन समस्याओं को हल करने के लिए राष्ट्रीय खनिज नीति 2019 और खनन कानूनों में संशोधन जैसे कदम उठाए हैं, हालांकि खदानों को विकसित करने की लंबी प्रक्रिया की वजह से इनका असर दिखने में भी काफी समय लग सकता है। इसके अलावा केंद्र ने छत्तीसगढ़ के बाघमारा और आंध्र प्रदेश के जोनागिरी जैसे नए ब्लॉकों की नीलामी से भविष्य में उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर संसाधनों का सही दोहन हो, तो भारत लंबि अवधि में 20 टन तक सोने का उत्पादन कर सकता है।


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