Explainer: स्वतंत्रता के पांच दशक बाद तक क्यों नहीं थी तिरंगा फहराने की आजादी, अदालत ने कैसे दिया ये अधिकार?
भारत का राष्ट्रीय ध्वज- तिरंगा फहराने पर जिस पाबंदी की बात की जा रही है, वह क्यों आजादी के बाद भी बनी रही थी? किस घटना के बाद तिरंगा फहराने की आजादी अधिकारों का सवाल बन गया? कैसे तिरंगा फहराने का मामला हाईकोर्ट से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा? आखिरकार कैसे देश को तिरंगा फहराने की आजादी मिली और मौजूदा समय में भारतीय तिरंगे को लेकर किस तरह की पाबंदियां लागू हैं? आइये जानते हैं...
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विस्तार
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत का राष्ट्रीय ध्वज- तिरंगा फहराने पर जिस पाबंदी की बात की जा रही है, वह क्यों आजादी के बाद भी बनी रही थी? किस घटना के बाद तिरंगा फहराने की आजादी अधिकारों का सवाल बन गया? कैसे तिरंगा फहराने का मामला हाईकोर्ट से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा? आखिरकार कैसे देश को तिरंगा फहराने की आजादी मिली और मौजूदा समय में भारतीय तिरंगे को लेकर किस तरह की पाबंदियां लागू हैं? आइये जानते हैं...
भारत की आजादी के बाद क्यों तिरंगा फहराने की नहीं थी छूट?
भारत की आजादी के बाद, देश के आम नागरिकों को अपनी मर्जी से रोजाना तिरंगा फहराने की छूट नहीं थी। दरअसल, 1950 में तिरंगे के अनावरण के बाद से ही ध्वज के सम्मान के लिए फ्लैग कोड को लागू कर दिया गया था। आमतौर पर तिरंगे को फहराने, इसके प्रदर्शन आदि के नियम इसी फ्लैग कोड के जरिए संचालित होते थे।फ्लैग कोड में ऐसा क्या था?
राष्ट्रीय ध्वज फहराने के नियम, जो कि फ्लैग कोड के तहत संचालित होते थे, वह कोई संसद की ओर से पारित कानून नहीं, बल्कि सरकार के प्रशासनिक या कार्यकारी निर्देशों का एक समूह था। इस कोड के मुताबिक, आम नागरिकों, निजी संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों को केवल कुछ विशेष राष्ट्रीय अवसरों, जैसे- स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर ही बिना रोक-टॉक के ध्वज फहराने की अनुमति थी। सामान्य दिनों में निजी इमारतों या घरों पर तिरंगा फहराने पर पाबंदी थी।
सिर्फ 'खास कार्यक्रमों' में इस्तेमाल का बन गया चलन
इन कड़े सरकारी प्रतिबंधों की वजह से देश के आम लोगों में यह धारणा घर कर गई थी कि राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल सिर्फ सरकारी कार्यालयों, मंत्रियों और सरकारी भवनों के लिए ही है और आम जनता के लिए इसके खुलेआम इस्तेमाल पर पाबंदी है।
यूं तो संसद ने तिरंगे के व्यावसायिक दुरुपयोग को रोकने के लिए पहले द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स (प्रिवेंशन ऑफ इम्प्रॉपर यूज) एक्ट, 1950 और इसके अपमान को रोकने के लिए प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 जैसे कानून बनाए थे, लेकिन रोजमर्रा के इस्तेमाल पर प्रतिबंध मुख्य रूप से फ्लैग कोड के प्रशासनिक निर्देशों के चलते ही लागू थे।
कब-किस घटना के बाद सवालों के घेरे में आई ये पाबंदी?
इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब अमेरिका में पढ़ाई कर भारत लौटे उद्योगपति नवीन जिंदल को तिरंगा फहराने से जुड़े एक मामले में प्रशासनिक कार्रवाई का सामना करना पड़ा। दरअसल, हुआ कुछ यूं कि 1990 के दशक में नवीन जब अमेरिका में पढ़ाई कर रहे थे और वहां यूनिवर्सिटी स्टूडेंट सीनेट के अध्यक्ष थे, तो उन्हें हर जगह गर्व से तिरंगा फहराने की आदत थी। इसके बाद जब वे भारत लौटे और अपने उद्योग से जुड़े कामकाज को संभालने लगे तो उन्होंने तत्कालीन मध्य प्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के रायगढ़ में अपनी फैक्ट्री के कार्यालय परिसर में हर दिन तिरंगा फहराना शुरू कर दिया।उनका फैक्टरी में तिरंगा फहराना काफी समय तक जारी रहा। हालांकि, सितंबर 1994 में बिलासपुर के तत्कालीन डिविजनल कमिश्नर ने उनकी फैक्टरी का दौरा किया और वहां फहराते तिरंगे को देखकर इस पर आपत्ति जताई। जिंदल को चेतावनी दी गई कि तत्कालीन कड़े फ्लैग कोड के तहत आम नागरिकों को सामान्य दिनों में अपने घरों या कार्यालयों पर तिरंगा फहराने की अनुमति नहीं है और ऐसा करना जारी रखने पर उनके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है।
अदालत तक कैसे पहुंचा पूरा मामला?
बताया जाता है कि नवीन जिंदल के लिए बात स्वीकार करना बहुत मुश्किल था कि वे अपने ही देश की मिट्टी पर, अपनी ही इमारत पर गर्व से अपना राष्ट्रध्वज नहीं फहरा सकते। चूंकि वे उद्योगपति परिवार से आते थे, इसलिए कानून की दुनिया में भी उनकी अच्छी पहचान थी। ऐसे में उन्होंने पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण सहित अन्य कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ली।- कानूनी परामर्श के दौरान स्पष्ट हुआ कि संसद की ओर से पारित सिर्फ दो मुख्य कानून ही राष्ट्रीय ध्वज के उपयोग को नियंत्रित करते हैं- पहला व्यावसायिक दुरुपयोग रोकने के लिए द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स (प्रिवेंशन ऑफ इम्प्रॉपर यूज) एक्ट, 1950 और दूसरा राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान को रोकने के लिए प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971।
- वकीलों ने जिंदल को बताया कि रोजमर्रा के इस्तेमाल पर पाबंदी लगाने वाला फ्लैग कोड संसद का कोई कानून नहीं, बल्कि केवल प्रशासनिक या कार्यकारी निर्देशों का समूह भर है। ऐसे में महज फ्लैग कोड के जरिए नागरिकों की अभिव्यक्ति की सांविधानिक स्वतंत्रता को कोई नहीं छीन सकता। यह एक अधिकार की श्रेणी में है।
दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले में क्या हुआ?
दिल्ली हाईकोर्ट में नवीन जिंदल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (केंद्र सरकार) मामले की सुनवाई के दौरान कानूनी सिद्धांतों की बेहद अहम लड़ाई हुई। इस मामले में हाईकोर्ट के सामने दोनों पक्षों ने अपने-अपने तर्क रखे और अंततः कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।1. नवीन जिंदल की मांग
नवीन जिंदल ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर कड़े फ्लैग कोड के उन प्रतिबंधों को चुनौती दी थी, जो आम नागरिकों को सामान्य दिनों में अपने परिसरों में राष्ट्रध्वज फहराने से रोकते थे। उन्होंने मांग की कि इन प्रतिबंधों को अवैध और अमान्य घोषित कर खारिज किया जाए। उनका मुख्य तर्क यह था कि गरिमा और सम्मान के साथ तिरंगा फहराना उनका अधिकार है और इसे प्रशासनिक निर्देशों के जरिए छीना नहीं जा सकता।
2. केंद्र सरकार के तर्क
हाईकोर्ट के सामने केंद्र सरकार ने इस पाबंदी को सही ठहराने के लिए तीन मुख्य दलीलें दीं...
- 'द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स (प्रिवेंशन ऑफ इम्प्रॉपर यूज) एक्ट, 1950' की धारा 3 के तहत केंद्र सरकार को किसी भी सार्वजनिक स्थान या इमारत पर राष्ट्रीय ध्वज के इस्तेमाल को नियंत्रित और प्रतिबंधित करने का अधिकार है।
- सरकार की ओर से लगाए गए प्रतिबंध संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाए गए पूरी तरह से उचित प्रतिबंध हैं।
- नागरिकों को तिरंगा फहराने की खुली छूट देना या न देना सरकार और संसद का एक नीतिगत निर्णय है। चूंकि यह पूरी तरह से नीतिगत मामला है, इसलिए अदालतों को इसमें दखल नहीं देना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट का क्या रहा फैसला?
हाईकोर्ट ने सरकार के तर्कों को दरकिनार करते हुए सितंबर 1995 में नवीन जिंदल के पक्ष में फैसला सुनाया। अदालत ने मुख्य तौर पर चार तर्क दिए।फ्लैग कोड 'कानून' नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि फ्लैग कोड के कड़े प्रतिबंध केवल सरकार के प्रशासनिक या कार्यकारी निर्देश हैं, वे संसद से पारित 'कानून' नहीं हैं। चूंकि ये प्रशासनिक निर्देश हैं, इसलिए इनके आधार पर नागरिकों की स्वतंत्रता को सीमित नहीं किया जा सकता और न ही इन्हें दंडात्मक माना जा सकता है।
सम्मानपूर्वक फहराने पर पाबंदी गलत: अगर कोई नागरिक तिरंगे का पूरा सम्मान करते हुए उसे फहराना चाहता है और वह देश के किसी वास्तविक कानून का उल्लंघन नहीं कर रहा है, तो उसे केवल फ्लैग कोड के निर्देशों का हवाला देकर तिरंगा फहराने से रोका नहीं जा सकता।
सम्मान की रक्षा जरूरी, पर रोक नहीं: संविधान सभा की ऐतिहासिक बहसों का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि नागरिकों को ध्वज संहिता के जरिए जागरूक और शिक्षित किया जाना चाहिए, लेकिन जब तक नागरिक सम्मानपूर्वक ध्वज फहरा रहा है, उस पर पाबंदी थोपना सही नहीं है।
दिल्ली हाईकोर्ट का यही फैसला आगे चलकर इस ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई का मुख्य आधार बना। केंद्र सरकार ने इस फैसले को स्वीकार करने के बजाय इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ, कैसे तिरंगा फहराना बना अधिकार?
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ जब केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की, तो यह मामला भारतीय इतिहास के सबसे अहम सांविधानिक मुकदमों में से एक बन गया। इसका फैसला 2004 में हुआ, हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से पहले ही केंद्र सरकार 2002 में फ्लैग कोड में आमूलचूल बदलाव कर चुकी थी।1. कोर्ट के सुझाव पर नियमों की समीक्षा (2002)
दरअसल हुआ कुछ यूं कि जब सुप्रीम कोर्ट में यह अपील लंबित थी, तब कोर्ट के सुझाव पर केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय ध्वज से जुड़े प्रतिबंधों की समीक्षा के लिए अक्टूबर 2000 में एक समिति का गठन किया। इस समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने फ्लैग कोड ऑफ इंडिया, 2002 तैयार किया, जो 26 जनवरी 2002 से प्रभावी हुआ। इस नए कोड ने आम नागरिकों, निजी संगठनों और शैक्षणिक संस्थानों को वर्ष के सभी दिनों में राष्ट्रध्वज फहराने की व्यावहारिक अनुमति दे दी, लेकिन इस अधिकार की सांविधानिक स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम कानूनी फैसला आना अभी बाकी था।
2. ऐतिहासिक फैसला और पीठ (23 जनवरी 2004)
रायगढ़ की फैक्ट्री में तिरंगा फहराने को लेकर शुरू हुआ यह संघर्ष करीब एक दशक बाद 23 जनवरी 2004 को अपने अंतिम मुकाम पर पहुंचा। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वीएन. खरे, जस्टिस बृजेश कुमार और जस्टिस एसबी. सिन्हा की तीन-जजों की बेंच ने सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला सुनाया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस ऐतिहासिक फैसले में इन अहम सिद्धांतों को स्थापित किया...
तिरंगा फहराना एक 'मौलिक अधिकार' है: कोर्ट ने व्यवस्था दी कि सम्मान और गरिमा के साथ स्वतंत्र रूप से तिरंगा फहराना भारतीय नागरिकों का मौलिक अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत मिली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है, क्योंकि झंडा फहराना देश के प्रति अपनी निष्ठा, भावनाओं और गर्व को प्रकट करने का एक जरिया है।
यह अधिकार असीमित नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एक मर्यादित अधिकार है, जिस पर संविधान के अनुच्छेद 19(2) के तहत जरूरी प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। संसद की ओर से पारित दो कानून द एम्ब्लेम्स एंड नेम्स एक्ट, 1950 और 'प्रिवेंशन ऑफ इंसल्ट्स टू नेशनल ऑनर एक्ट, 1971 तिरंगे के इस्तेमाल को विनियमित करते रहेंगे।
फ्लैग कोड 'कानून' नहीं: कोर्ट ने माना कि 'फ्लैग कोड' संविधान के अनुच्छेद 13(3)(ए) के तहत कोई कानून नहीं है, बल्कि यह केवल सरकार के कार्यकारी या प्रशासनिक निर्देश हैं। अदालत ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले की ही पुष्टि करते हुए कहा कि एक कोड के आधार पर नागरिकों की स्वतंत्रता पर दंडात्मक प्रतिबंध नहीं लगाए जा सकते। हालांकि, तिरंगे के सम्मान और गरिमा की रक्षा के लिए इन निर्देशों का पूरी तरह पालन किया जाना चाहिए।
अधिकारों के साथ कर्तव्यों का समन्वय: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों और सरकार के नियमों के बीच संतुलन बनाने के लिए संविधान के भाग IV (नीति निदेशक तत्व) और भाग IVए (मौलिक कर्तव्य- विशेष रूप से अनुच्छेद 51ए) की सहायता ली जा सकती है। इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी लड़ाई के जरिए देश के आम नागरिकों को उनके राष्ट्रध्वज पर गर्व करने और उसे सम्मानपूर्वक फहराने का संवैधानिक अधिकार सौंप दिया।
इस तरह सुप्रीम कोर्ट ने इस कानूनी लड़ाई के जरिए देश के आम नागरिकों को उनके राष्ट्रध्वज पर गर्व करने और उसे सम्मानपूर्वक फहराने का सांविधानिक अधिकार सौंपा।
मोदी सरकार ने 2022 में इन नियमों में क्या बदला?
वर्ष 2022 आजादी के 75 साल पूरे होने पर केंद्र सरकार ने अमृत महोत्सव का एलान किया। इसके तहत सरकार ने हर घर तिरंगा अभियान की शुरुआत की और इसे सफल बनाने के लिए भारतीय ध्वज संहिता में दो बेहद अहम ऐतिहासिक बदलाव किए थे।
1. दिन और रात दोनों समय तिरंगा फहराने की अनुमति (जुलाई 2022 का संशोधन)
पहले का नियम: पहले के नियमों के अनुसार, तिरंगे को केवल सूर्योदय से सूर्यास्त के बीच ही फहराया जा सकता था, यानी सूर्यास्त के बाद झंडा उतारना अनिवार्य था।
बदलाव: गृह मंत्रालय की ओर से 19 जुलाई 2022 को जारी आदेश के तहत ध्वज संहिता में संशोधन किया गया। इसके बाद अब यदि राष्ट्रीय ध्वज खुले में या किसी नागरिक के निजी घर पर प्रदर्शित किया जाता है, तो उसे दिन और रात दोनों समय (24 घंटे) फहराया हुआ रखा जा सकता है।
पहले का नियम: पहले सिर्फ हाथ से काते गए और हाथ से बुने गए सूती, रेशमी, ऊनी या खादी के कपड़ों से बने झंडों को ही फहराने की अनुमति थी। मशीन से बने या पॉलिस्टर के झंडों के इस्तेमाल पर पूरी तरह प्रतिबंध था।
नया बदलाव: सरकार ने 30 दिसंबर 2021 के आदेश के माध्यम से नियमों में बदलाव किया और मशीन से बने तथा पॉलिस्टर से बने राष्ट्रीय ध्वज फहराने की भी स्पष्ट अनुमति दे दी।
- यह बदलाव इसलिए किए गए ताकि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील पर देश के नागरिक 13 से 15 अगस्त के बीच अपने घरों पर हर घर तिरंगा अभियान के तहत झंडा फहराएं, तो नियमों के कड़ेपन के कारण किसी नागरिक से अनजाने में कानून का उल्लंघन न हो। इन संशोधनों ने तिरंगे के निर्माण को व्यावहारिक और आसान बनाया।
- इस बदलाव का नवीन जिंदल समेत कई लोगों ने स्वागत किया, लेकिन खादी समर्थकों और स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों को मानने वाले कार्यकर्ताओं ने इसका तीखा विरोध किया। हुबली, कर्नाटक में देश की एकमात्र बीआईएस प्रमाणित झंडा बनाने वाली इकाई कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ ने इसके खिलाफ पीएम को पत्र लिखा था।
- उनका तर्क था कि इस कदम से खादी क्षेत्र को भारी नुकसान होगा, स्वतंत्रता संग्राम की मूल भावना प्रभावित होगी और झंडा बनाने के काम में लगी हजारों गरीब ग्रामीण महिलाओं की आजीविका छिनने का खतरा पैदा हो जाएगा।