रह-रहकर उलझती जा रही है कि भारत-चीन रिश्तों की डोर, अब एलएसी को लेकर चीन ने छेड़ी नई बहस
1962 में युद्ध के बाद लद्दाख, हिमाचल में भारत और चीन की सेनाएं जहां-जहां रूक गई थीं, 1993 में उसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएएसी) का नाम दिया गया था। इसमें 1962 से पहले के तमाम कब्जे वाला भारतीय क्षेत्र चीन की तरफ चला गया था...
विस्तार
भारत-चीन रिश्ते की डोर रह-रहकर उलझती जा रही है। हालांकि सेना मुख्यालय, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के अधिकारी इस तनाव के अंत में कोई भविष्यवाणी नहीं करना चाहते, लेकिन रणनीतिकारों को लग रहा है कि क्या युद्ध का भय दिखाकर लद्दाख में जारी मौजूदा तनाव का हल निकल आए। भारत और चीन के बीच में जारी तनाव को लेकर वायुसेनाध्यक्ष एयरचीफ मार्शल आरके एस भदौरिया ने अपनी चुप्पी तोड़ी है। वायुसेनाध्यक्ष ने कहा कि चीन के साथ न तो युद्ध जैसी स्थिति है और न ही शांति की। इस बीच भारत ने चीन की तरफ से 1959 में एकतरफा परिभाषित वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) साफ तौर पर खारिज कर दिया है।
क्या है एलएएसी ?
1962 में युद्ध के बाद लद्दाख, हिमाचल में भारत और चीन की सेनाएं जहां-जहां रूक गई थीं, 1993 में उसे वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएएसी) का नाम दिया गया था। इसमें 1962 से पहले के तमाम कब्जे वाला भारतीय क्षेत्र चीन की तरफ चला गया था। जबकि पूर्वोत्तर के राज्यों में भारत और चीन की सीमा को मैकमोहन लाइन से बांटा जाता है। चीन को लद्दाख-हिमाचल में मैकमोहन लाइन स्वीकार नहीं है। जबकि भारत को 1959 में चीन द्वारा एकतरफा तरीके से बताई जा रही सीमा रेखा स्वीकार नहीं है। इसकी स्थिति पाकिस्तान से लगती नियंत्रण रेखा (एलओसी) से बिल्कुल उलट है। चीन 1899 की मैकार्टनी-मैडोनाल्ड लाइन को और भारत सरकार 1865 की जॉनसन लाइन से मिलती-जुलती रेखा को दोनों देशों की सीमा मानती है।
नेहरू युग से पीवी नरसिंहा राव तक
50 के दशक में भारत-चीन सीमा विवाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच में झड़प का रूप लेने लगा था। इसे केंद्र में रखकर 25 अक्तूबर 1959 को चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री चाऊ-एन-लाई ने प्रधानमंत्री नेहरू को एक पत्र लिखा था। लाई ने करीब दो सप्ताह बाद सात नवंबर को दूसरा पत्र लिखा और भारतीय सेनाओं को लद्दाख, हिमाचल से लगती सीमा पर करीब 20 किमी पीछे ले जाने के लिए कहा। लाई के इस तर्क को पंडित नेहरू ने मानने से इंकार कर दिया। भारत का कहना था कि चीन पहले ही कई किमी तक भारतीय सीमा में घुस आया है। ऐसे में भारतीय सेना का अपनी ही जमीन पर और पीछे हटने का सवाल ही नहीं उठता। इसके बाद 1962 में चीन ने भारत के साथ युद्ध छेड़ दिया।
1962 के युद्ध के बाद लंबे समय तक दोनों देश शांत रहे। भारत और चीन के बीच रिश्ते में एक अजीब सी स्थिति बनी रही। प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने रिश्ते पर जमी इस बर्फ को हटाया और उसके बाद 1993 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव ने चीन के साथ रिश्तों को एक नई दिशा देने की पहल की। 1962 के युद्ध के बाद जो स्थान जिस देश की सेना के निगरानी के दायरे में रहा उसे वास्तविक नियंत्रण रेखा एलएसी) माना गया। इसी आधार पर भारत और चीन द्विपक्षीय रिश्ते, व्यापार, विश्वास बहाली के उपायों को अब तक आगे बढ़ाते आ रहे हैं।
क्यों अचानक प्रासंगिक हुआ इतिहास....बने जंग से हालात
2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जनता ने प्रचंड बहुमत के साथ दूसरी बार देश का नेता बनाया। पिछले साल सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए लद्दाख और जम्मू-कश्मीर को अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दे दिया। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को यह बदलाव अखर गया। चीन ने भारत के इस कदम का पिछले साल भी विरोध किया था और लद्दाख में दोनों देशों की सेनाओं के बीच जारी तनाव के बाद चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने फिर कहा कि उनका देश भारत सरकार के इस कदम को मान्यता नहीं देता। चीनी प्रवक्ता ने एक बार फिर 1959 के समय की स्थिति को ही दोनों देशों की सीमारेखा का मुख्य टर्निंग प्वांइट बताया है। भारत ने चीन के इस कदम का खुल कर विरोध किया है और कहा कि यह चीन की एकतरफा कोशिश उसे स्वीकार नहीं है।
तो फिर क्या होगी भारत और चीन में जंग?
1959 में दोनों देशों के सैनिकों में सीमा को लेकर छिटपुट झड़प शुरू हो गई थी। इस समय भी भारत और चीन के सैनिक युद्ध जैसी स्थिति में तैयार बैठे हैं। भारत ने भी साफ किया है कि यदि चीन के सैनिक वास्तविक नियंत्रण रेखा को एकतरफा बदलने का प्रयास करेंगे तो भारतीय सैनिक मुहतोड़ जवाबी कार्रवाई करेंगे। पांच मई के बाद से अब तक दोनों देशों के सैनिकों ने तीन से अधिक बार गोलिया चलाई हैं।
वाइस एयरमार्शल (रिटा.) एनबी सिंह का कहना है मौजूदा स्थिति 60 के दशक के हालात को ही दोहरा रही है। विदेश मंत्रालय के अधिकारी भी इस पर बहुत ठंडी प्रतिक्रिया देते हैं। भारतीय रणनीतिकारों के मुताबिक कोविड-19 संक्रमण ने चीन की अर्थव्यवस्था को बड़ा झटका दिया है। वहां बेरोजगारी चरम पर है। देश की जनता शी जिनपिंग से नाराज है और अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन के लिए आए दिन मुसीबत खड़ी हो रही है। लिहाजा चीनी फौज ने शीर्ष नेतृत्व के इशारे पर ध्यान भटकाने के लिए लद्दाख में घुसपैठ की है। 1962 में भी इसी तरह के हालात थे। तब चीन में भयानक भुखमरी का दौर चल रहा था और माओ त्से तुंग ने भारत के साथ युद्ध पर सहमति दे दी थी।
रह-रहकर चीन बढ़ा रहा है तनाव
विदेश मंत्री पहले ही भारत-चीन के बीच में 1962 के बाद अब तक की सबसे खराब स्थिति बता चुके हैं। कूटनीतिक जानकारों का कहना है कि वास्तव में ऐसा ही है। भारत और चीन के राजनयिकों, अधिकारियों के बीच में सहमति बनती है और बाद में चीन उससे पलट जाता है। 15 जून के बाद दोनों देशों के विदेश मंत्रियों में वार्ता हुई। पांच जुलाई को दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधि (अजीत डोभाल और वांग यी) के बीच में सहमति बनी। सितंबर में दोनों देशों के रक्षा मंत्रियों की वार्ता हुई और 10 सितंबर को मास्को में विदेश मंत्री एस जयशंकर, वांग यी के बीच पांच सूत्रीय सहमति बनी, लेकिन तनाव भी लगातार बढ़ रहा है। रणनीतिकारों के मुताबिक चीन जानबूझ कर दोनों देशों में विश्वास बहाली के प्रयास और शांतिपूर्ण प्रक्रिया को उलझा रहा है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दो महीने पहले ही संवाद से मुद्दे का समाधान न निकलने की आशंका जाहिर कर दी थी। इसके सामानांतर सीडीएस जनरल विपिन रावत, सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकमंद नरवाणे ने भारतीय सैन्य बलों के किसी भी चुनौती से निबटने के लिए तैयार होने का कई बार संकेत दे दिया है। जनरल रावत ने तो चीन और पाकिस्तान दोनों की एकसाथ चुनौती से निबटने की तैयारी का वक्तव्य दिया है।
...नहीं तो जंग है आखिरी रास्ता
एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि भारत और चीन एशिया के प्रभावशाली देश हैं। दोनों परमाणु शक्ति संपन्न और सामरिक क्षेत्र में अपना स्थान रखते हैं। दोनों ही देशों की सेनाएं लद्दाख में आमने-सामने हैं। यदि चीन ने एकतरफा कार्रवाई की कोशिश की तो कुछ भी हो सकता है। लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) बलबीर सिंह का कहना है कि भारतीय सेना हमेशा अनुशासन में रहती है, लेकिन पिछला इतिहास गवाह है कि दुश्मनों को मुहतोड़ जवाब देना जानती है। फिर भी कूटनीति के जानकारों को अभी दोनों देशों में शांति की उम्मीद है। वह कहते हैं कि युद्ध की संभावना तैयार है और इसे देखते हुए दोनों देशों के बीच में शांति का कूटनीतिक, राजनयिक प्रयास जारी है।