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Explainer: ईरान को मिली निर्बाध तेल बेचने की छूट, भारत को फायदा कब तक; क्या आम लोगों को मिलेगा सस्ता ईंधन?
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Tue, 23 Jun 2026 04:56 PM IST
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सार
अमेरिकी वित्त मंत्रालय ने स्विट्जरलैंड वार्ता के बाद ईरान को 21 अगस्त तक कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री के लिए 60 दिनों का 'जनरल लाइसेंस' जारी किया है। इसके बदले ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य में मुक्त आवाजाही बनाए रखने और अपने यहां आईएईए निरीक्षकों को अनुमति देने के लिए सहमत हुआ है। आइये जानते हैं इसका दुनिया और भारत को क्या फायदा हो सकता है...
ईरान का तेल खरीदने पर भारतीय रिफाइनरियों की नजर।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
अमेरिका की तरफ से जब 28 फरवरी को ईरान पर ताबड़तोड़ हमले बोले गए, तब किसी ने उम्मीद भी नहीं की थी कि साढ़े तीन महीने बाद हमला करने वाले को ही हमला झेलने वाले देश के नुकसान की भरपाई करनी पड़ेगी। हालांकि, हुआ कुछ ऐसा ही। 22 जून को अमेरिका का वित्त मंत्रालय ने एक नोटिफिकेशन जारी कर ईरान को 60 दिन तक तेल का उत्पादन करने, उसे बेचने और बाकी देशों को ईरानी तेल खरीदने की छूट दे दी। यानी जिस ईरान के तेल को करीब एक दशक तक खरीदने पर पाबंदी लगी रही, युद्ध के बाद उसी तेल को एक बार फिर वैश्विक बाजार में पहुंचाने की शुरुआत अमेरिका ने ही कर दी। इस पूरे घटनाक्रम से उन देशों को सबसे ज्यादा फायदे की उम्मीद है, जो तेल के बड़े आयातक हैं। खासकर चीन और भारत जैसे बड़ी आबादी वाले देश, जिनके लिए ईरान पारंपरिक तौर पर ईंधन का बड़ा सप्लायर रहा है।
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ईरान को तेल निर्यात के लिए मिली छूट के दुनिया के लिए क्या मायने हैं? भारत पारंपरिक तौर पर ईरान से तेल का कितना बड़ा आयातक रहा है और क्यों हमें ईरानी तेल की खरीदारी बंद करनी पड़ी थी? अब ईरान को पाबंदियों से छूट मिलने के भारत के लिए क्या मायने हैं? क्या भारत के तेल भंडारों को कम दरों के तेल से भरने में मदद मिलेगी? इसके अलावा भारत को जो राहत मिलने की संभावना है, उसका फायदा आम लोगों को कब तक और कितना मिलेगा? आइये जानते हैं...
ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर ईरान को तेल निर्यात के लिए मिली छूट के दुनिया के लिए क्या मायने हैं? भारत पारंपरिक तौर पर ईरान से तेल का कितना बड़ा आयातक रहा है और क्यों हमें ईरानी तेल की खरीदारी बंद करनी पड़ी थी? अब ईरान को पाबंदियों से छूट मिलने के भारत के लिए क्या मायने हैं? क्या भारत के तेल भंडारों को कम दरों के तेल से भरने में मदद मिलेगी? इसके अलावा भारत को जो राहत मिलने की संभावना है, उसका फायदा आम लोगों को कब तक और कितना मिलेगा? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- अमेरिका के ईरान के तेल से प्रतिबंध हटाने के दुनिया के लिए क्या मायने?
अमेरिका की तरफ से ईरान के तेल निर्यात पर से प्रतिबंधों में 60 दिनों की अस्थायी छूट से वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजारों के लिए कई बड़े और दूरगामी मायने हैं।1. कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और 'ऑयल सरप्लस'
वैश्विक बाजार में ईरानी तेल की वापसी से कच्चे तेल की आपूर्ति में भारी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) का अनुमान है कि तेल की आपूर्ति मांग की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ेगी, जिससे 2027 तक वैश्विक बाजार में 'ऑयल सरप्लस' यानी ज्यादा तेल की स्थिति पैदा हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अतिरिक्त आपूर्ति के कारण कच्चे तेल की कीमतें 60 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे आ सकती हैं।
ये भी पढ़ें: ईरान को बड़ी राहत: अमेरिका ने तेल बिक्री के लिए जारी किया 'जनरल लाइसेंस', स्विट्जरलैंड वार्ता के बाद फैसला
2. होर्मुज जलडमरूमध्य का खुलना और आपूर्ति शृंखला में सुधार
इस समझौते के साथ होर्मुज जलडमरूमध्य का फिर से खुलना दुनिया की ईंधन सप्लाई के लिए किसी खुशखबर से कम नहीं है। दरअसल, समुद्री तेल व्यापार के लगभग पांचवें हिस्से के लिए यह अहम मार्ग है। इसके खुलने से वैश्विक शिपिंग और आपूर्ति में आ रही बाधाएं खत्म होने की संभावना है और इससे तेल की कीमतों में जुड़ा भू-राजनीतिक जोखिम कम होगा।
3. तेल आयातक देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बड़ी राहत
भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों को इस फैसले से सबसे ज्यादा फायदा होगा। तेल की कीमतें कम होने और बाजार में तेल आयात के ज्यादा विकल्प मौजूद होने से इन देशों का आयात बिल घटेगा। इससे दुनिया भर में महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी और आयातकों को अपने खाली हो चुके रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को फिर से भरने का मौका मिलेगा।
4. अमेरिकी डॉलर में व्यापार और लेनदेन की लागत में कमी
प्रतिबंधों में छूट के कारण ईरान को दशकों बाद अपना तेल अमेरिकी डॉलर में बेचने की अनुमति मिल गई है। पहले डॉलर से कटे होने के कारण ईरान और उसके खरीदारों को स्थानीय मुद्राओं, महंगे मध्यस्थों और शैडो फ्लीट (गुप्त जहाजी बेड़े) का इस्तेमाल करना पड़ता था, जो बहुत महंगा और जोखिम भरा था। अब डॉलर में वैध लेनदेन, शिपिंग और बीमा की अनुमति मिलने से पूरी दुनिया के लिए इस व्यापार की लागत और जटिलता काफी कम हो जाएगी।
भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे प्रमुख तेल आयातक देशों को इस फैसले से सबसे ज्यादा फायदा होगा। तेल की कीमतें कम होने और बाजार में तेल आयात के ज्यादा विकल्प मौजूद होने से इन देशों का आयात बिल घटेगा। इससे दुनिया भर में महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी और आयातकों को अपने खाली हो चुके रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को फिर से भरने का मौका मिलेगा।
4. अमेरिकी डॉलर में व्यापार और लेनदेन की लागत में कमी
प्रतिबंधों में छूट के कारण ईरान को दशकों बाद अपना तेल अमेरिकी डॉलर में बेचने की अनुमति मिल गई है। पहले डॉलर से कटे होने के कारण ईरान और उसके खरीदारों को स्थानीय मुद्राओं, महंगे मध्यस्थों और शैडो फ्लीट (गुप्त जहाजी बेड़े) का इस्तेमाल करना पड़ता था, जो बहुत महंगा और जोखिम भरा था। अब डॉलर में वैध लेनदेन, शिपिंग और बीमा की अनुमति मिलने से पूरी दुनिया के लिए इस व्यापार की लागत और जटिलता काफी कम हो जाएगी।
5. बाजार में खरीदारों की बढ़ती ताकत और कड़ी प्रतिस्पर्धा
बाजार में ईरानी तेल के आने से खरीदार देशों की सौदेबाजी की ताकत मजबूत होगी। हालांकि, ईरान के लिए भी यह आसान नहीं होगा, क्योंकि उसे अब अपनी पुरानी जगह वापस पाने के लिए रूस, अमेरिका, पश्चिम एशिया और लातिन अमेरिका जैसे उन आपूर्तिकर्ताओं से कड़ा मुकाबला करनी होगी, जिन्होंने प्रतिबंधों के दौरान बाजार पर कब्जा कर लिया था।
कुल मिलाकर देखा जाए तो ईरान को तेल बिक्री में छूट मिलना न सिर्फ ऊर्जा बाजार में मौजूदा तनाव और अस्थिरता को कम करेगा, बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए तेल की कीमतों को सस्ता और आपूर्ति को ज्यादा सुरक्षित बनाने का काम करेगा।
बाजार में ईरानी तेल के आने से खरीदार देशों की सौदेबाजी की ताकत मजबूत होगी। हालांकि, ईरान के लिए भी यह आसान नहीं होगा, क्योंकि उसे अब अपनी पुरानी जगह वापस पाने के लिए रूस, अमेरिका, पश्चिम एशिया और लातिन अमेरिका जैसे उन आपूर्तिकर्ताओं से कड़ा मुकाबला करनी होगी, जिन्होंने प्रतिबंधों के दौरान बाजार पर कब्जा कर लिया था।
कुल मिलाकर देखा जाए तो ईरान को तेल बिक्री में छूट मिलना न सिर्फ ऊर्जा बाजार में मौजूदा तनाव और अस्थिरता को कम करेगा, बल्कि दुनिया भर के देशों के लिए तेल की कीमतों को सस्ता और आपूर्ति को ज्यादा सुरक्षित बनाने का काम करेगा।
भारत पारंपरिक तौर पर ईरान से तेल का कितना बड़ा आयातक रहा है?
भारत पारंपरिक रूप से ईरान के कच्चे तेल का एक बहुत बड़ा और प्रमुख आयातक रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों के लागू होने से पहले तक भारत की ऊर्जा सुरक्षा का ईरान एक अहम हिस्सा था और इसके शीर्ष तेल आपूर्तिकर्ताओं में गिना जाता था।स्वर्णिम काल (2009-2010): साल 2009 में ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता था। 2009-10 के दौरान भारत ने ईरान से 2.21 करोड़ टन कच्चे तेल का आयात किया था, जो उस वर्ष भारत के कुल 15.36 करोड़ टन तेल आयात का लगभग 14.4% हिस्सा था।
भारत के ईरान से तेल खरीद में क्यों आई गिरावट?
1. वैश्विक प्रतिबंधों के बाद गिरावट का दौर (2010-2015)
2010 के बाद जैसे-जैसे ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध कड़े हुए, वैसे ही उसके लेन-देन (बैंकिंग) के जरियों में दिक्कतें आने लगीं और परिवहन में भारी मुश्किलें हुईं। नतीजतन भारत का ईरानी तेल आयात 2010-11 के 1.61 करोड़ टन से लगातार गिरते हुए 2014-15 में 1.12 करोड़ टन रह गया। हालांकि इस कठिन दौर (2012-2015) में भी व्यापार पूरी तरह से नहीं रुका, क्योंकि भारत और ईरान ने रुपये में भुगतान का एक विशेष तंत्र बना लिया था। इसमें 45% भुगतान रुपये में किया जाता था और बची हुई राशि प्रतिबंध हटने के बाद के लिए टाल दी गई थी।
2. परमाणु समझौते के बाद रिकॉर्ड उछाल (2015-2018)
ईरान परमाणु समझौते (जेसीपीओए) के बाद जब प्रतिबंध हटाए गए, तो भारतीय रिफाइनरियों ने फिर से ईरान का रुख किया। 2016-17 में ईरान से आयातित तेल की मात्रा में जबरदस्त उछाल आया और यह 2.71 करोड़ टन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। इस दौरान ईरान सऊदी अरब और इराक के बाद भारत का तीसरा सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन गया था, जो भारत के कुल कच्चे तेल आयात का 12.6% था। साल 2018 में भारत ने ईरान से औसतन 5,18,000 बैरल प्रतिदिन तेल खरीदा था।
3. व्यापार का पूरी तरह ठप होना (मई 2019 से)
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा अमेरिका को ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकालने और दोबारा कड़े प्रतिबंध लगाने के बाद हालात बदल गए। 2017-18 में जो आयात 2.39 करोड़ टन था, वह 2019-20 में गिरकर मात्र 20 लाख टन रह गया। मई 2019 में अमेरिका की तरफ से भारत जैसे खरीदारों को दी गई छूट के खत्म होने के बाद, अमेरिकी सेकेंडरी सैंक्शन्स से बचने के लिए भारत ने ईरान से तेल खरीदना बिल्कुल बंद कर दिया।
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा अमेरिका को ईरान परमाणु समझौते से बाहर निकालने और दोबारा कड़े प्रतिबंध लगाने के बाद हालात बदल गए। 2017-18 में जो आयात 2.39 करोड़ टन था, वह 2019-20 में गिरकर मात्र 20 लाख टन रह गया। मई 2019 में अमेरिका की तरफ से भारत जैसे खरीदारों को दी गई छूट के खत्म होने के बाद, अमेरिकी सेकेंडरी सैंक्शन्स से बचने के लिए भारत ने ईरान से तेल खरीदना बिल्कुल बंद कर दिया।
क्या है ईरान से तेल खरीद में भारत की मौजूदा स्थिति?
लगभग सात साल तक कोई व्यापार न होने के बाद इस साल अप्रैल में होर्मुज जलडमरूमध्य संकट के दौरान अमेरिका ने ईरान के तेल की खरीद के लिए देशों को सीमित अवधि दी थी। अमेरिका ने पाबंदी हटाते हुए कहा था कि ईरान का जितना भी तेल समुद्री मार्गों पर होगा, उसे खरीदा जा सकेगा। एक महीने की छोटी छूट का फायदा उठाते हुए भारत ने फिर से लगभग 5,30,000 टन ईरानी तेल खरीदा था।ईरान अब तक भारत से न सिर्फ अपनी भौगोलिक करीबी और बेहतर क्रेडिट शर्तों के कारण तेल खरीद का एक पसंदीदा विकल्प रहा है, बल्कि ईरान लाइट और हैवी जैसे कच्चे तेल भारतीय रिफाइनरियों की तकनीकी जरूरतों के बेहद अनुकूल भी रहे हैं।
अब ईरान को पाबंदियों से छूट मिलने के भारत के लिए क्या मायने हैं?
ईरान के कच्चे तेल के निर्यात पर 21 अगस्त तक दी गई 60 दिनों की अस्थायी छूट के भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक रूप से कई बड़े मायने हैं।1. आपूर्ति का नया विकल्प और कम दर पर तेल की उपलब्धि
इस छूट से भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति का एक अतिरिक्त और अहम विकल्प मिल गया है। भले ही भारतीय रिफाइनरियां तुरंत भारी मात्रा में ईरानी तेल न खरीदें, लेकिन बाजार में इस नए विकल्प की मौजूदगी भारत को अपने मौजूदा सप्लायर्स, जैसे- रूस, इराक और सऊदी अरब के साथ बेहतर कीमत पर सौदेबाजी करने की बड़ी ताकत प्रदान करेगी।
2. आयात बिल और महंगाई में कमी
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल आयात करता है, जिसके लिए सालाना 100 अरब डॉलर से ज्यादा का भारी-भरकम बिल चुकाना पड़ता है। वैश्विक बाजार में ईरानी तेल की वापसी से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतें कम होने की उम्मीद है। कीमतों में मामूली गिरावट भी भारत के आयात बिल से अरबों डॉलर कम कर सकती है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और घरेलू महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
3. डॉलर में आसान और सस्ता लेनदेन
इस नई छूट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अमेरिका ने ईरानी तेल की खरीद-बिक्री के लिए अमेरिकी डॉलर में भुगतान को वैध कर दिया है। इससे पहले ईरान के डॉलर तंत्र से कटे होने के कारण भारत को स्थानीय मुद्राओं या महंगे मध्यस्थों का सहारा लेना पड़ता था। अब डॉलर में वैध व्यापार की अनुमति मिलने से शिपिंग, बीमा और बैंकिंग लेनदेन से जुड़े कानूनी जोखिम और लागत काफी कम हो जाएंगे।
4. ईरान की परियोजनाओं में भारत के निवेश की संभावनाएं
लंबे समय के लिए पाबंदियों में राहत मिलने से भारतीय तेल और गैस कंपनियों के लिए ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में वापस लौटने के दरवाजे खुल सकते हैं। उदाहरण के लिए, ओएनजीसी विदेश (ओवीएल) के नेतृत्व वाले जिस कंसोर्टियम ने 2008 में ईरान में फरजाद बी गैस क्षेत्र की खोज की थी और पाबंदियों के कारण जिसे छोड़ना पड़ा था, उस गैस परियोजना में भारतीय कंपनियां भविष्य में फिर से शामिल होने के अवसर तलाश सकती हैं।
इस नई छूट का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अमेरिका ने ईरानी तेल की खरीद-बिक्री के लिए अमेरिकी डॉलर में भुगतान को वैध कर दिया है। इससे पहले ईरान के डॉलर तंत्र से कटे होने के कारण भारत को स्थानीय मुद्राओं या महंगे मध्यस्थों का सहारा लेना पड़ता था। अब डॉलर में वैध व्यापार की अनुमति मिलने से शिपिंग, बीमा और बैंकिंग लेनदेन से जुड़े कानूनी जोखिम और लागत काफी कम हो जाएंगे।
4. ईरान की परियोजनाओं में भारत के निवेश की संभावनाएं
लंबे समय के लिए पाबंदियों में राहत मिलने से भारतीय तेल और गैस कंपनियों के लिए ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में वापस लौटने के दरवाजे खुल सकते हैं। उदाहरण के लिए, ओएनजीसी विदेश (ओवीएल) के नेतृत्व वाले जिस कंसोर्टियम ने 2008 में ईरान में फरजाद बी गैस क्षेत्र की खोज की थी और पाबंदियों के कारण जिसे छोड़ना पड़ा था, उस गैस परियोजना में भारतीय कंपनियां भविष्य में फिर से शामिल होने के अवसर तलाश सकती हैं।
भारत को कब तक मिल सकता है ईरान से प्रतिबंध हटने का फायदा?
भारत में ईरान के तेल की अभी कम है मांग
पाबंदियों के दौरान (मई 2019 के बाद से) भारत ने अपने तेल स्रोतों को विविध करने में सफलता हासिल की है। इस समय रियायतों और निर्बाध आपूर्ति की वजह से रूस भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। तेल की शिपिंग पर नजर रखने वाली कंपनी केप्लर के मुताबिक, भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी लगभग 50% पहुंच चुकी है। इसके अलावा अमेरिका, लातिन अमेरिका और पश्चिम एशिया के देश भी भारत को तेल बेच रहे हैं।
ऐसे में ईरान को भारतीय रिफाइनरियों को वापस अपनी ओर खींचने के लिए इन देशों से कड़े मुकाबले से गुजरना होगा और कम दर पर तेल उपलब्ध कराने के साथ, बेहतर छूट और कम सख्त क्रेडिट शर्तें देनी होंगी। अगर यह संभव होता है तो भारत जल्द ईरान के तेल की खरीद कर आयात में विविधता को फिर बढ़ा सकता है। हालांकि, इसकी प्रक्रिया और इसके लाभ मिलने में कुछ समय लगने की संभावना है।
भारतीय रिफाइनरियों ने भी अपनाया है सतर्क रुख
रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी (एनआईओसी) ने भारतीय रिफाइनरियों से संपर्क किया है, लेकिन भारतीय कंपनियां जल्दबाजी नहीं कर रही हैं, क्योंकि उन्होंने अगले दो महीनों के लिए पर्याप्त कच्चा तेल पहले ही सुरक्षित कर लिया है। फिलहाल भारतीय व्यापारिक दल इस खरीद के तकनीकी-वाणिज्यिक पहलुओं को देख रहे हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भुगतान, बीमा और माल ढुलाई के दौरान उन्हें कोई व्यावसायिक या कानूनी जोखिम न उठाना पड़े और तेल की कीमत उनके लिए बेहतर दरों पर हो।
फिर नागरिकों को कम मिल सकती है महंगे ईंधन से राहत?
ईरान को तेल बेचने के लिए अमेरिका से मिली छूट के बावजूद भारतीय नागरिकों को तुरंत सस्ती दरों पर पेट्रोल और डीजल मिलने की संभावना नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ईंधन की कीमतों में सुधार और इसका फायदा आम जनता तक पहुंचने में कम से कम 5 से 6 महीने का समय लग सकता है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी (एनआईओसी) ने भारतीय रिफाइनरियों से संपर्क किया है, लेकिन भारतीय कंपनियां जल्दबाजी नहीं कर रही हैं, क्योंकि उन्होंने अगले दो महीनों के लिए पर्याप्त कच्चा तेल पहले ही सुरक्षित कर लिया है। फिलहाल भारतीय व्यापारिक दल इस खरीद के तकनीकी-वाणिज्यिक पहलुओं को देख रहे हैं। वे यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि भुगतान, बीमा और माल ढुलाई के दौरान उन्हें कोई व्यावसायिक या कानूनी जोखिम न उठाना पड़े और तेल की कीमत उनके लिए बेहतर दरों पर हो।
फिर नागरिकों को कम मिल सकती है महंगे ईंधन से राहत?
ईरान को तेल बेचने के लिए अमेरिका से मिली छूट के बावजूद भारतीय नागरिकों को तुरंत सस्ती दरों पर पेट्रोल और डीजल मिलने की संभावना नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, ईंधन की कीमतों में सुधार और इसका फायदा आम जनता तक पहुंचने में कम से कम 5 से 6 महीने का समय लग सकता है।
तुरंत नहीं घटेंगी खुदरा कीमतें: भारत में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतें सीधे तौर पर केवल वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर नहीं होती हैं। ये कई अन्य चीजों जैसे- करों, विनिमय दरों, रिफाइनिंग मार्जिन और तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) की कीमतों के निर्धारण से जुड़े फैसलों पर निर्भर करती हैं। इसलिए सिर्फ ईरानी तेल के कुछ कार्गो आ जाने से पेट्रोल-डीजल की कीमतें अपने आप कम नहीं हो जाएंगी।
रिफाइनरियों के पास पहले से मौजूद स्टॉक: भारतीय रिफाइनरियों ने पहले ही अगले दो महीनों के लिए पर्याप्त कच्चा तेल सुरक्षित कर लिया है। ऐसे में नए और संभावित रूप से सस्ते ईरानी तेल के सौदों का सीधा असर घरेलू बाजार की कीमतों पर दिखने में समय लगेगा।
2027 तक सस्ते तेल का बड़ा अनुमान: लंबी अवधि में नागरिकों के लिए राहत की बड़ी उम्मीद है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुमान के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति उसकी मांग से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इससे 2027 तक ऑयल सरप्लस (तेल की मांग से ज्यादा आपूर्ति) की स्थिति पैदा हो सकती है।
रिफाइनरियों के पास पहले से मौजूद स्टॉक: भारतीय रिफाइनरियों ने पहले ही अगले दो महीनों के लिए पर्याप्त कच्चा तेल सुरक्षित कर लिया है। ऐसे में नए और संभावित रूप से सस्ते ईरानी तेल के सौदों का सीधा असर घरेलू बाजार की कीमतों पर दिखने में समय लगेगा।
2027 तक सस्ते तेल का बड़ा अनुमान: लंबी अवधि में नागरिकों के लिए राहत की बड़ी उम्मीद है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के अनुमान के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर तेल की आपूर्ति उसकी मांग से कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रही है। इससे 2027 तक ऑयल सरप्लस (तेल की मांग से ज्यादा आपूर्ति) की स्थिति पैदा हो सकती है।