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खुलासा: पाकिस्तान में किसने आतंकी रियाज भटकल को रास्ते से हटाया? पूर्व आईपीएस की किताब में बड़ा दावा

Mon, 06 Jul 2026 10:39 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल सुनील मेहरोत्रा, अमर उजाला, मुंबई
सुनील मेहरोत्रा, अमर उजाला, मुंबई Published by: हिमांशु सिंह चंदेल Updated Mon, 06 Jul 2026 10:39 AM IST
सार

भारत में कई बड़े बम धमाकों का आरोपी और इंडियन मुजाहिदीन का सरगना रियाज भटकल क्या पाकिस्तान में मारा जा चुका है? पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडेय की किताब में दावा किया गया है कि डॉन बबलू श्रीवास्तव की इस मामले में भूमिका रही। आइए, विस्तार से जानते हैं कि आखिर इस किताब में ऐसा क्या लिखा है, जिसने इस पुराने मामले को फिर चर्चा में ला दिया?

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Indian Mujahideen terrorists Riyaz Bhatkal Killed in Pakistan ex IPS Book Makes claim by don Babloo Srivastava
डॉन बबलू श्रीवास्तव। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

साल 2003 से 2008 तक देश भर में दर्जनों जगह इंडियन मुजाहिदीन ने बम धमाके करवाए थे। धमाकों से जुड़े इन सभी केसों में काफी आरोपी गिरफ्तार हुए, लेकिन धमाकों के सरगना जिस रियाज और इकबाल भटकल ने अपने आतंकवादी संगठन को इंडियन मुजाहिदीन नाम दिया था, वो दोनों बाद में नेपाल के रास्ते पाकिस्तान भाग गए थे। 

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पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडेय की किताब 'अंतहीन ' में डॉन बबलू श्रीवास्तव के हवाले से दावा किया गया है कि रियाज भटकल का मर्डर पाकिस्तान में हो चुका है। किताब के अनुसार, बबलू यह दावा करता है कि उसने खुद अपने लोगों के जरिए यह मर्डर करवाया था। राजेश पांडेय जब बरेली के आईजी थे, तब बबलू बरेली जेल में बंद था। उसी दौरान राजेश पांडेय ने जेल में उससे पूछताछ की थी। उन्होंने अपनी इस किताब में इस बात का उल्लेख किया है।

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किस आधार पर हुआ अंडरवर्ल्ड में दो फाड़?

किताब में राजेश पांडेय ने लिखा है कि सीबीआई की एक टीम ने इंडोनेशिया जाकर छह नवंबर 2015 को छोटा राजन को अपनी कस्टडी में ले लिया और भारत लेकर आई। इसके बाद से वो तिहाड़ जेल में बंद है। जब छोटा राजन गिरफ्तार नहीं हुआ था, तब उसने भी दावा किया था कि रियाज भटकल का मर्डर पाकिस्तान में उसके लोगों ने करवाया था। किताब में राजेश पांडेय लिखते हैं कि 1993 के बम ब्लास्ट के बाद अंडरवर्ल्ड हिंदू-मुस्लिम को आधार बनाकर जो दो फाड़ हुआ था, अब वो नदी के दो किनारे हो चुके हैं।

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दाऊद पाकिस्तान में पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई के कब्जे में था और उसके विरोधी हिंदू गुट के छोटा राजन, सुभाष ठाकुर, बबलू श्रीवास्तव, पीपी पाण्डेय उर्फ बंटी पांडे भारतीय जेलों में थे। पुराने मुकदमों में इन सभी को सजा हो गई। सभी आज भी आजीवन कारावास काट रहे हैं। राजेश पांडेय के मुताबिक, छोटा राजन की गिरफ्तारी यानी 2015 के बाद मुंबई पूरी तरह से अंडरवर्ल्ड के दबाव से मुक्त हो चुकी थी। दोनों पक्षों के शूटर या तो मारे गए या फिर जेलों में हैं।

किस देश से खत्म कर दिया दाऊद का नेटवर्क?

पूर्व आईपीएस अधिकारी के अनुसार, साल 2015 में छोटा राजन के तिहाड़ में आते ही इन सभी का जेलों में रहते हुए परस्पर संपर्क हुआ। बाकी लोगों ने बबलू श्रीवास्तव को इस बात के लिए बधाई दी कि उसने अकेले अपने दम पर नेपाल में दाऊद का पूरा नेटवर्क खत्म कर दिया। (ऐसा कहा जाता है कि दाउद से कथित तौर पर जुड़े रहे नेपाली सांसद मिर्जा दिलशाद बेग की हत्या की साजिश में भी बबलू श्रीवास्तव का हाथ था)।

बबलू ने सबसे कहा, 'अब दाऊद के साथ के जो लोग पाकिस्तान भाग गए हैं, उन्हें भी खत्म करना जरूरी है, इसके लिए सबको एक होना पड़ेगा। हालांकि नेपाल में नेटवर्क खत्म करते समय जो लोग पाकिस्तान भागे थे, मैंने उनका भी काम पाकिस्तान में ही करा दिया था, जिनमें मोहम्मद शरीक उर्फ छोटा दाऊद, सगीर अहमद, रियाज भटकल, अनवर खान समेत कई बड़े आतंकवादी भी शामिल थे।' बबलू ने यहां जिन लोगों का नाम लिया है, उसमें रियाज भटकल का नाम सबसे गौर करने वाला है।

डॉन बबलू श्रीवास्तव ने दाऊद को लेकर क्या कहा?

राजेश पांडेय के मुताबिक, बबलू श्रीवास्तव ने आगे कहा, अभी भी मौलाना मसूद अजहर, सैयद सलाहुद्दीन, तलहा हाफिज सईद, जकी उर रहमान लखवी, अमीर सरफराज तांबा जिसने सरबजीत सिंह की हत्या की थी, सब अपना नेटवर्क पाकिस्तान में बैठकर चला रहे हैं। ये सभी कभी-न-कभी दाऊद के कृपापात्र रहे हैं। बबलू ने आगे बताया, 'जब तक दाऊद खत्म नहीं होता, हमारा बदला पूरा नहीं होगा, क्योंकि वो देश के खिलाफ काम करता रहा है और आईएसआई के इशारे पर देश को बहुत नुकसान पहुंचा चुका है। इसलिए हम सभी को एक होकर भारतीय एजेसियों की मदद करनी होगी।'



किताब के अनुसार, सभी डॉन इस बात से सहमत हो गए, क्योंकि उनके पास कोई और विकल्प नहीं था। जेल से छूटने के कोई आसार नहीं थे और जेलों में उन्हें छोटी-मोटी सुविधाएं भी चाहिए थीं। एजेंसियों की मदद के बदले में स्थानीय प्रशासन से अच्छे खाने, बैरक में अलग रहने, टीवी देखने और जेल के डॉक्टर्स की अच्छी सुविधा मिल सकती थी। एजेंसियों का काम कराने के बहाने उन्हें मोबाइल की भी आवश्यकता होती थी, इसलिए वो सभी 'देशभक्त' हो गए, ताकि जेल का जीवन दुरुह न हो।

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