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Aviation:ईरान-इजरायल युद्ध से हिला एविएशन सेक्टर, खर्च बढ़ा और उड़ानें हुईं कम; जानें अब तक कितना हुआ नुकसान

डिजिटल ब्यूरो ,अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Asmita Tripathi Updated Mon, 06 Apr 2026 04:44 PM IST
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सार

विशेषज्ञों का कहना है, युद्ध के बीच उड़ानों की अनुमति अक्सर आखिरी समय पर मिलती है। जिससे शेड्यूल तय करना मुश्किल हो जाता है। दुबई और अबू धाबी जैसे एयरपोर्ट पर खाड़ी देशों की एयरलाइंस को प्राथमिकता मिलती है। जबकि कुछ रूट्स पर यात्रियों की आवाजाही एकतरफा होने से विमानों को खाली लौटना पड़ता है, जो घाटे का सौदा है। नई उड़ानों के लिए मंजूरी, टिकट बिक्री और मार्केटिंग में समय लगता है। इसलिए क्षमता बढ़ाना आसान नहीं है।

Iran-Israel war shakes aviation sector, costs rise and flights decrease find out how much damage has been done
हवाई जहाज। - फोटो : Freepik
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विस्तार

पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव का असर अब भारतीय विमानन कंपनियों की कमाई पर भी साफ दिखाई देने लगा है। ताजा आकलन के मुताबिक, एयरलाइंस को अब तक करीब 2,500 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। उद्योग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि ईरान के साथ-साथ खासकर पाकिस्तान का हवाई क्षेत्र बंद ही रहता है तो हालात और बिगड़ सकते हैं। इसका सीधा असर भारत से यूरोप जाने वाले सबसे कमाऊ रूट्स पर पड़ेगा, जिससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव और बढ़ सकता है।

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दरअसल, पश्चिम एशिया भारतीय एयरलाइंस के लिए अहम अंतरराष्ट्रीय बाजार माना जाता है। लेकिन वहां जारी तनाव का सीधा असर उड़ानों पर पड़ा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि कंपनियों को रोजाना संचालित होने वाली उड़ानों में बड़ी कटौती करनी पड़ी है। इस कटौती के कारण विमानों की क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। कई विमान खाली खड़े हैं, जिससे कंपनियों की कमाई पर लगातार दबाव बढ़ रहा है। विमानन विशेषज्ञों के मुताबिक, इंडिगो को समर शेड्यूल में रोज करीब 310 अंतरराष्ट्रीय उड़ानें चलाने की मंजूरी मिली हुई है, लेकिन फिलहाल वह अपनी कुल क्षमता का लगभग 60 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पा रही है।
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खाड़ी क्षेत्र में बढ़ते तनाव का असर उड़ानों पर साफ दिख रहा है। एयरलाइंस ने खाड़ी सहयोग परिषद देशों के लिए करीब 115 उड़ानें और राष्ट्रमंडल देशों के लिए 10 उड़ानें रद्द कर दी हैं। जिससे इन रूट्स पर सेवाएं अस्थायी रूप से बंद हैं। भारत-जीसीसी मार्ग पर इंडिगो की हिस्सेदारी लगभग 40 फीसदी मानी जाती है, ऐसे में इस कटौती का उस पर खासा असर पड़ा है। एयर इंडिया समूह भी इससे अछूता नहीं है। अनुमान के मुताबिक, जहां इस क्षेत्र में उसकी 100 से ज्यादा दैनिक उड़ानें तय थीं, वहीं मौजूदा हालात में वह केवल 30 से 40 उड़ानें ही चला पा रही है। इससे कंपनियों की संचालन क्षमता और राजस्व दोनों पर दबाव बढ़ गया है।

विशेषज्ञों का कहना है, उड़ानों की अनुमति अक्सर आखिरी समय पर मिलती है। जिससे शेड्यूल तय करना मुश्किल हो जाता है। दुबई और अबू धाबी जैसे एयरपोर्ट पर खाड़ी देशों की एयरलाइंस को प्राथमिकता मिलती है। जबकि कुछ रूट्स पर यात्रियों की आवाजाही एकतरफा होने से विमानों को खाली लौटना पड़ता है, जो घाटे का सौदा है। नई उड़ानों के लिए मंजूरी, टिकट बिक्री और मार्केटिंग में समय लगता है। इसलिए क्षमता बढ़ाना आसान नहीं है। भारत को ट्रांजिट हब बनाने की कोशिशें भी जारी हैं, लेकिन मौजूदा हालात से यह योजना प्रभावित हो रही है। वहीं, पाकिस्तान और पश्चिम एशिया के कुछ हवाई क्षेत्रों के बंद रहने से उड़ानों में 40-50 प्रतिशत तक देरी हो रही हैं। इससे ईंधन खर्च बढ़ गया है। इंडिगो को राष्ट्रमंडल देशों की कुछ सेवाएं रोकनी पड़ी हैं और बाकी रूट्स पर लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है।

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