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Kargil Vijay Diwas Exclusive: जनरल वीपी मलिक ने बताया- कैसे सलवार-कमीज में आई थी पाक सेना

Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Tue, 26 Jul 2022 11:30 PM IST
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सार
Kargil Vijay Diwas: कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय थल सेना अध्यक्ष रहे जनरल वीपी मलिक ने अमर उजाला डॉट कॉम से विशेष बातचीत में बताया कि युद्ध में ऐसे बनाई थी पाकिस्तान को हराने की रणनीति...
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Kargil Vijay Diwas:Retired General VP Malik said - Kargil war was definitely very challenging
Kargil Vijay Diwas - फोटो : Sonu Kumar/Amar Ujala

विस्तार

हमारे पास जो इनपुट खुफिया एजेंसियों से आ रहे थे, वह यह थे कि कश्मीर घाटी में घुसपैठिए अलग-अलग रास्तों से घुसपैठ करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दुश्मन 'काली सलवार और कमीज' पहनकर कश्मीर और लद्दाख की दुर्गम पहाड़ियों से चढ़े। हमारे लिए चुनौतियां बहुत थी। कहीं ऊंचाई पर हथियार पहुंचाने में दिक्कत आ रही थी, तो कहीं जवानों को तुरंत भेजने में भौगोलिक परिस्थितियां का सामना करना पड़ रहा था। लेकिन मई के आखिरी हफ्ते में जो प्लान बना, उसके बाद दुश्मनों के सिर धड़ से अलग होते रहे और 26 जुलाई को हमने कारगिल पर विजय प्राप्त कर ली। कारगिल युद्ध के दौरान तत्कालीन थल सेना अध्यक्ष रहे जनरल वीपी मलिक ने अमर उजाला डॉट कॉम के आशीष तिवारी से कारगिल युद्ध की तैयारियों और चुनौतियों पर विशेष बातचीत की।

सवाल: आज 23 साल हो गए कारगिल युद्ध में विजय पाए हुए। एक लंबा अरसा गुज़र गया। बहुत कठिन रहा होगा इतनी ऊंचाई पर लड़ा जाने वाला युद्ध।

जवाब: हां...आज 23 साल हो गए इस युद्ध को और इस युद्ध में विजय प्राप्त किए हुए। कठिन तो बिल्कुल नहीं था क्योंकि हमें अपने जवानों-अधिकारियों पर पूरा भरोसा था। लेकिन निश्चित तौर पर बहुत चैलेंजिंग था कारगिल का युद्ध।

सवाल: सेना को खुफिया सूचनाएं तो शायद अप्रैल 1999 से मिलने लगी थीं कि पाकिस्तानी सेना की ओर से कोई ऐसी हरकत होने वाली है।

जवाब: नहीं। हमारे पास अप्रैल में ऐसी कोई सूचना नहीं थी कि पाकिस्तानी सेना इस तरीके से योजना बना रही है। जो इनपुट हमारे पास खुफिया विभाग से आए थे, वह थे कि कश्मीर घाटी में घुसपैठिए घुसपैठ की फिराक में हैं।

सवाल: फिर आप लोगों को कब पता चला कि यह घुसपैठिए नहीं पाकिस्तानी सेना के लोग हैं और जो इंटेलिजेंस इनपुट घुसपैठियों के तौर पर था उसका क्या हुआ?

जवाब: सेना को तो मई में इस बात का पहली बार पता चला कि काली सलवार-कमीज पहनकर कुछ लोग बटालिक और द्रास सेक्टर में घुस आए हैं। सेना ने इंटेलिजेंस के लोगों को इस बात की इत्तला दी थी कि यह घुसपैठिए नहीं बल्कि पाकिस्तानी सेना है। खैर हमारी सेना दुश्मनों का मुकाबला करने और खदेड़ने के लिए तैयार हो चुकी थी।

सवाल: जब आपको पता चला कि पाक सेना हमारी सीमा में घुस आई है, तो कैसे सब कुछ किया गया। क्योंकि हमारी खुफिया जानकारी कुछ और थी।

जवाब: चूंकि खुफिया सूचना तो घाटी में घुसपैठ की थी वह भी घुसपैठियों की। लेकिन पाकिस्तानी सेना के लोग हमारी सीमा में घुस आए थे। इसलिए तैयारियों के तौर पर हम लोगों को बहुत जल्दी और बहुत बड़े बड़े फैसले लेने पड़े। बटालिक और द्रास सेक्टर में सेना के कमांडरों को न सिर्फ तैनात कर फ्रंट पर भेजा गया। बल्कि अलग-अलग डिवीजन से सेना के अधिकारियों और जवानों को दुश्मन प्रभावित इलाकों में रवाना किया गया। इस दौरान लगातार सेना केंद्र और कैबिनेट के संपर्क में रही।

सवाल: आपको क्या लग रहा था कि पाक की ओर से आने वाली सेना के लोगों से एक लंबा युद्ध होगा?

जवाब: देखिए इस बात का बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि द्रास और बटालिक सेक्टर से जो पाकिस्तानी सेना के लोग ऊपर बढ़ रहे थे या आ चुके थे उनकी संख्या कितनी थी। इसलिए हम लोग हर तरीके से तैयार थे। बाद में जब इस बात का पता चला कि उनकी संख्या तीन से चार हजार के करीब है तो फिर हम लोगों ने बड़ी रणनीति बनाई और दुश्मनों के ठिकानों से लेकर उनके सभी नापाक मंसूबों को नाकाम करना शुरू कर दिया।

सवाल: क्या थी वह बड़ी योजना? कैसे इतने दुश्मनों का मुकाबला करने के लिए हम लोग तैयार थे?

सवाल: देखिए...मई के आखिरी हफ्ते में कैबिनेट के साथ बैठक हुई और उसके बाद तय हुआ कि भारतीय सेना के सभी अंग जिसमें थल सेना, वायु सेना और जल सेना मिलकर इस पूरे ऑपरेशन को अंजाम देगी। बस फिर क्या था...हमारी सेना के सभी तीनों प्रमुख अंगों के जवान दुश्मन का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए मैदान-ए-जंग में निकल पड़े थे। असली लड़ाई तो मैदान में पहाड़ी इलाकों पर हो रही थी। इसलिए थल सेना के जवान और अधिकारी सबसे आगे उस हर मोर्चे पर खड़े थे जहां से दुश्मनों को मार गिराया जाना था।

सवाल: भौगोलिक दृष्टिकोण से पाकिस्तान की सेना के लोग हमारे ऊपर यानी ऊंचाई वाले इलाकों में थे। उस पर कंट्रोल करने के लिए क्या रणनीति बनी और कैसे उनको पीछे खदेड़ा गया।

जवाब: एक बार जब आदेश मिल जाए तो भारतीय सेना के लिए यह सब चीजें बहुत मायने नहीं रखती है। हां, यह ज़रूर है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में युद्ध के दौरान तमाम तरीकों की मुश्किलों का सामना जरूर करना पड़ा। मसलन हमें हथियारों को कैसे पहुंचाना है। सैनिकों की पूरी-पूरी टुकड़िया विपरीत परिस्थितियों वाले पहाड़ी और बर्फीले मैदानों में कैसे भेजनी है। लेकिन यह चैलेंज हमें दुश्मनों को पीछे खदेड़ने में कभी आड़े नहीं आए। और यही हमारे सैनिकों और हमारे अधिकारियों का जज्बा जुनून था कि पाकिस्तान की सेना को नाक रगड़ने पर मजबूर कर दिया और उनको खदेड़ दिया।

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