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सांविधानिक पद की गरिमा से दूर रखें सियासी मतभेद
Wed, 11 Mar 2026 04:51 AM IST
Himanshu Singh Chandel
नवनीत सहगल, पूर्व अध्यक्ष प्रसार भारती
नवनीत सहगल, पूर्व अध्यक्ष प्रसार भारती
Published by: Himanshu Singh Chandel
Updated Wed, 11 Mar 2026 04:51 AM IST
सार
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान हुए घटनाक्रम ने संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर नई बहस छेड़ दी है। पूर्व प्रसार भारती अध्यक्ष नवनीत सहगल का कहना है कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च पद के साथ प्रोटोकॉल की अनदेखी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा के प्रति असंवेदनशीलता है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का हिस्सा हैं, लेकिन कुछ पद ऐसे हैं जिन्हें सियासत से ऊपर रखना जरूरी है।
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नवनीत सहगल, पूर्व अध्यक्ष, प्रसार भारती
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
भारत के संविधान ने कुछ पदों को ऐसी गरिमा और प्रतिष्ठा प्रदान की है जो दलगत राजनीति से ऊपर है। भारत के राष्ट्रपति का पद भी उसी श्रेणी में आता है। राष्ट्रपति देश की प्रथम नागरिक हैं और संघीय ढांचे की सर्वोच्च सांविधानिक प्रमुख भी। हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के प. बंगाल दौरे में जो घटनाक्रम हुआ, उसने स्वाभाविक रूप से गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं।
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भारतीय प्रशासनिक सेवा में लगभग 40 वर्षों के अनुभव के आधार पर मैं कह सकता हूं कि राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च सांविधानिक पद के साथ प्रोटोकॉल की अनदेखी केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सांविधानिक मर्यादा के प्रति असंवेदनशीलता का गंभीर मामला है। भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था में राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री सहित शीर्ष सांविधानिक पदों की यात्राओं के लिए प्रोटोकॉल व्यवस्था निर्धारित है। इस व्यवस्था को सामान्यतः ‘ब्लू बुक’ के नाम से जाना जाता है। यह दस्तावेज केवल औपचारिक शिष्टाचार का संहिता नहीं है, बल्कि इसमें सुरक्षा, प्रशासनिक समन्वय और संवैधानिक सम्मान से जुड़े स्पष्ट दिशा-निर्देश होते हैं। माननीय राष्ट्रपति जब किसी राज्य की यात्रा पर जाती हैं, तो राज्य के मुख्यमंत्री, राज्यपाल के साथ-साथ वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी अगवानी करते हैं। यह किसी व्यक्ति विशेष का सम्मान नहीं, बल्कि उस सांविधानिक पद का सम्मान होता है जो पूरे राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है।
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राष्ट्रपति की संयमित प्रतिक्रिया और उसका संदेश
राष्ट्रपति ने इस विषय को अत्यंत संयमित और सौम्य भाषा में व्यक्त किया और यहां तक कहा कि वे भी ‘बंगाल की बेटी’ हैं और मुख्यमंत्री उनकी ‘छोटी बहन’ के समान हैं। इस प्रकार की भाषा इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रपति ने इस विषय को राजनीतिक विवाद का रूप देने के बजाय एक नैतिक और मानवीय दृष्टिकोण से रखा।
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प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया व मूल सांविधानिक सिद्धांत
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले लोगों और आदिवासी समाज की भावनाओं को इससे ठेस पहुंची है। प्रधानमंत्री का यह कहना कि राष्ट्रपति का पद राज्य की राजनीति से ऊपर होता है, वस्तुतः भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना को ही व्यक्त करता है।
राजनीतिक मतभेद व संवैधानिक मर्यादाएं
राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। विभिन्न दलों की सरकारें अपने-अपने दृष्टिकोण और विचारधाराओं के आधार पर काम करती हैं। परंतु कुछ संस्थाएं और पद ऐसे होते हैं जिन्हें इन मतभेदों से ऊपर रखा जाता है। राष्ट्रपति का पद उन्हीं में से एक है। पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के आगमन के दौरान जिस प्रकार से राज्य सरकार की ओर से अपेक्षित स्तर की उपस्थिति नहीं रही, उसने अनेक सवाल खड़े किए हैं। किसी राज्य में राष्ट्रपति का आगमन केवल एक कार्यक्रम में भाग लेने नहीं आते, बल्कि वह उस राज्य के लोगों के साथ राष्ट्र की एकता और सांविधानिक जुड़ाव का प्रतीकात्मक संदेश भी लेकर आते हैं। यदि राज्य की सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित नहीं होते, तो यह एक असामान्य स्थिति मानी जाती है।