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Khabaron Ke Khiladi: क्यों नहीं चल सका इस बार का मानसून सत्र? विश्लेषकों ने बताया कहां अटकी बात
Sat, 15 Aug 2026 08:54 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sat, 15 Aug 2026 08:54 PM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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इस हफ्ते संसद का मानसून सत्र खत्म हो गया। लगभग पूरा सत्र सत्ता पक्ष और विपक्ष की जिद के चलते धुल गया। सत्ता पक्ष विपक्ष पर गोल पोस्ट बदलने का आरोप लगाता रहा। वहीं, विपक्ष सत्ता पक्ष पर जवाबदेही से भागने का आरोप लगाता रहा। इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में इसी पर चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पीयूष पंत, पूर्णिमा त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और एसके दत्ता मौजूद रहे।
पीयूष पंत: मानसून सत्र एक तरह से धुल गया। आंकड़े बताते हैं कि इस सत्र की प्रोडक्टिविटी 15 फीसदी ही रही। इस पूरे सत्र में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का सदन में नहीं दिखाई दिए। आखिरी दिन सिर्फ वंदे मातरम के गान के वक्त नजर आए। इस पूरे सत्र में ये कहा जा सकता है कि विपक्ष हावी रहा।
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पीयूष पंत: मानसून सत्र एक तरह से धुल गया। आंकड़े बताते हैं कि इस सत्र की प्रोडक्टिविटी 15 फीसदी ही रही। इस पूरे सत्र में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री का सदन में नहीं दिखाई दिए। आखिरी दिन सिर्फ वंदे मातरम के गान के वक्त नजर आए। इस पूरे सत्र में ये कहा जा सकता है कि विपक्ष हावी रहा।
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राकेश शुक्ल: जो परंपराएं डाली गई हैं उसी परंपरा के तहत ये सब चल रहा है। ये परंपरा जैसी बन गई है। कुल मिलाकर जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर सदन चल रहा है। 19 दिन के सदन में सिर्फ 12 मिनट का प्रश्नकाल चला है। सदन सुचारू कैसे चले और उसमें हमारी क्या जिम्मेदारी है ये दोनों पक्षों को सोचना होगा।
पूर्णिमा त्रिपाठी: ये सत्र मानसून की वजह से बह गया। किसी बिल की स्क्रूटनी तब होती है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तालमेल हो। ऐसा कोई माहौल इस बार दिखा नहीं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी लठ लेकर आमने-सामने हो गए। प्रोडक्टिविटी की बात अगर की जाए तो सिर्फ बिल पास कराने से इसे नहीं नापा जा सकता है। दोनों पक्षों की ओर से कोई संवाद की स्थिति बनी ही नहीं। पूरे सत्र के दौरान सांप-छछूंदर वाली हालत हो गई है।
पूर्णिमा त्रिपाठी: ये सत्र मानसून की वजह से बह गया। किसी बिल की स्क्रूटनी तब होती है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तालमेल हो। ऐसा कोई माहौल इस बार दिखा नहीं। दोनों पक्ष अपनी-अपनी लठ लेकर आमने-सामने हो गए। प्रोडक्टिविटी की बात अगर की जाए तो सिर्फ बिल पास कराने से इसे नहीं नापा जा सकता है। दोनों पक्षों की ओर से कोई संवाद की स्थिति बनी ही नहीं। पूरे सत्र के दौरान सांप-छछूंदर वाली हालत हो गई है।
एसके दत्ता: ये पहली बार नहीं हुआ है। आप चर्चा चाहते हैं तो चर्चा के लिए किसी ने मना नहीं किया था, लेकिन अगर आप लगातार गोल पोस्ट बदलते रहेंगे तो कोई समाधान नहीं निकलेगा। चर्चा सभी चीजों पर होनी चाहिए। किसी भी मामले में सिलेक्टिव अप्रोच सही नहीं है।
विनोद अग्निहोत्री: मुझे लगता है कि ये सत्र निश्चित रूप से धुल गया है। ये तकलीफदेह है। सवाल ये है कि सत्र को गंभीरता से कितना लिया जाता है। जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री एक दिन भी नहीं आएंगे तो सवाल तो उठेंगे ही। सरकार का इरादा भी सदन को चलाने का नहीं लगा। दोनों तरफ से रस्साकस्सी हुई है। दोनों पक्षों ने अपनी नाक का सवाल बना लिया। कई मुद्दों पर सार्थक चर्चा हो सकती थी जो नहीं हो सकी।
विनोद अग्निहोत्री: मुझे लगता है कि ये सत्र निश्चित रूप से धुल गया है। ये तकलीफदेह है। सवाल ये है कि सत्र को गंभीरता से कितना लिया जाता है। जब प्रधानमंत्री और गृहमंत्री एक दिन भी नहीं आएंगे तो सवाल तो उठेंगे ही। सरकार का इरादा भी सदन को चलाने का नहीं लगा। दोनों तरफ से रस्साकस्सी हुई है। दोनों पक्षों ने अपनी नाक का सवाल बना लिया। कई मुद्दों पर सार्थक चर्चा हो सकती थी जो नहीं हो सकी।