Karur Stampede: तमिलनाडु सरकार करुर के भगदड़ पीड़ितों को नौकरी देगी, मद्रास हाईकोर्ट के फैसले में क्या?
मद्रास हाईकोर्ट ने करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने की तमिलनाडु सरकार की योजना पर अंतरिम राहत देते हुए नियुक्ति पत्र बांटने की अनुमति दे दी। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये नियुक्तियां अस्थायी होंगी और अंतिम फैसला न्यायिक समीक्षा के बाद होगा।
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विस्तार
मद्रास हाईकोर्ट ने शुक्रवार को तमिलनाडु वेट्री कझगम (TVK) के नेतृत्व वाली राज्य सरकार को पिछले साल सितंबर में करूर भगदड़ त्रासदी में जान गंवाने वाले पीड़ितों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने की अनुमति दे दी। हालांकि, कोर्ट ने साफ किया कि ये नियुक्तियां फिलहाल अस्थायी होंगी और न्यायिक समीक्षा के अधीन रहेंगी। मदुरै बेंच के जस्टिस सीवी कार्तिकेयन और जस्टिस आर शक्तिवेल की बेंच ने कहा कि सरकार के नीतिगत फैसले में दखल देना अदालत के लिए अत्यधिक संकीर्ण दृष्टिकोण होगा। इसी के साथ कोर्ट ने राज्य सरकार को शुक्रवार दोपहर तीन बजे होने वाले उस सार्वजनिक कार्यक्रम को आयोजित करने की अनुमति दे दी, जिसमें मृतकों के परिजनों को नियुक्ति पत्र सौंपे जाने हैं।
कोर्ट ने नियुक्तियों पर कौन सी शर्त लगाई?
बेंच ने कहा, 'सरकार के नीतिगत फैसले में दखल देना कोर्ट के लिए बहुत संकीर्ण सोच होगी। इसलिए राज्य इस शर्त पर कार्यक्रम को आगे बढ़ा सकता है कि नौकरी अस्थायी आधार पर होगी और न्यायिक समीक्षा के अधीन होगी। हम इस महीने के अंत तक इस मामले की सुनवाई करना चाहते हैं, ताकि जिन लोगों को नौकरी की पेशकश की गई है, उन्हें पहली सैलरी मिलने से पहले ही सुनवाई हो सके।'
पब्लिक सर्विस कमीशन से कोर्ट ने क्या रिपोर्ट मांगी?
बेंच ने स्वतः संज्ञान लेते हुए तमिलनाडु पब्लिक सर्विस कमीशन के सदस्य सचिव को भी मामले में पक्षकार बनाया और उनसे सहानुभूति के आधार पर नियुक्ति (कंपैशनेट अपॉइंटमेंट) से जुड़ी मौजूदा गाइडलाइंस तथा यह बताने को कहा कि क्या इस मामले में उन दिशानिर्देशों का पालन किया गया है। कोर्ट ने इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।
याचिका में सरकार के किस फैसले को चुनौती दी गई थी?
कोर्ट की यह टिप्पणी मदुरै के वकील थीरन थिरुमुरुगन की याचिका पर आई। उन्होंने मुख्यमंत्री विजय की सरकार के उस फैसले को चुनौती दी थी जिसके तहत पिछले साल सितंबर में करूर भगदड़ त्रासदी में जान गंवाने वाले 41 लोगों के परिवारों को सरकारी नौकरी देने का निर्णय लिया गया था।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से क्या मांग की थी?
याचिकाकर्ता ने मुख्य सचिव, अतिरिक्त मुख्य सचिव, सचिव (कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग), सचिव (गृह विभाग), सचिव (राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग) और करूर के जिला कलेक्टर को निर्देश देने की मांग की थी कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित कार्यवाही पूरी होने तक करूर भगदड़ से जुड़ी किसी भी सरकारी नियुक्ति का आदेश जारी न किया जाए और न ही उसे लागू किया जाए।
सरकारी नौकरी देने पर याचिकाकर्ता ने क्या आपत्ति जताई?
याचिकाकर्ता का कहना था कि ऐसी त्रासदियों के मामलों में स्थायी सरकारी नौकरी देने के लिए कोई समान नीति या स्पष्ट कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं है। उनके अनुसार, किसी एक विशेष घटना के आधार पर सरकारी नौकरी देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत समानता और समान अवसर के अधिकार से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने दलील दी कि आवश्यक योग्यता रखने वाले प्रत्येक नागरिक को सरकारी नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा करने का संवैधानिक अधिकार है। यदि बिना किसी समान नीति के इस तरह नियुक्तियां दी जाती हैं तो यह मनमाना फैसला माना जाएगा और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 16 का उल्लंघन होगा।
सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले का हवाला क्यों दिया गया?
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि करूर भगदड़ से जुड़ी कार्यवाही पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। ऐसे में यदि इस दौरान ऐसे प्रशासनिक लाभ दे दिए जाते हैं जिन्हें बाद में वापस लेना संभव न हो, तो इससे अनावश्यक कानूनी और प्रशासनिक जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए उन्होंने मांग की कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में मामला पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता, तब तक नियुक्ति आदेशों पर कोई कार्रवाई न की जाए।
सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने क्या दलीलें दीं?
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कहा कि सरकारी नौकरी देना मौजूदा 'दया के आधार पर नियुक्ति' यानी कंपैशनेट अपॉइंटमेंट से जुड़े नियमों और दिशानिर्देशों का उल्लंघन होगा, जिनका सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। वहीं, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामले में एक इंटरवेनिंग एप्लिकेशन दायर की गई थी, जिसमें सरकारी नौकरी देने पर भी रोक लगाने की मांग की गई थी, लेकिन बाद में वह याचिका वापस ले ली गई। राज्य की ओर से थूथुकुडी पुलिस फायरिंग मामले का भी हवाला दिया गया, जिसमें मृतकों के परिवारों को सरकारी नौकरी दी गई थी।
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थूथुकुडी और करूर मामले में कोर्ट ने क्या अंतर बताया?
इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोनों मामलों की परिस्थितियां अलग हैं। अदालत ने कहा कि थूथुकुडी की घटना राज्य पुलिस की कथित ज्यादती से जुड़ी थी, जबकि करूर भगदड़ की घटना को राज्य पुलिस की ज्यादती का मामला नहीं माना जा सकता। इसलिए दोनों मामलों की तुलना एक समान आधार पर नहीं की जा सकती।