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Lok Sabha: 'लोकसभा अध्यक्ष को विपक्ष का माइक बंद करने में महारत', महुआ मोइत्रा का तीखा हमला; मचा हंगामा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन तिवारी
Updated Tue, 10 Mar 2026 05:29 PM IST
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सार
तृणमूल सांसद महुआ मोइत्रा ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि स्पीकर विपक्ष के माइक बंद कर देते हैं और उनकी आवाज दबाते हैं। मोइत्रा ने डिप्टी स्पीकर का पद खाली होने और सांसदों के रिकॉर्ड निलंबन पर भी सरकार को घेरा।
महुआ मोइत्रा, तृणमूल कांग्रेस की सांसद
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला पर तीखा हमला बोला है। मंगलवार को सदन में बोलते हुए उन्होंने कहा कि स्पीकर ने विपक्षी सांसदों के माइक्रोफोन बंद करने की कला में महारत हासिल कर ली है। वे स्पीकर के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर अपनी बात रख रही थीं। मोइत्रा ने बिरला के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया। उन्होंने सदन में बहस के दौरान संसदीय प्रक्रियाओं को लेकर कई आपत्तियां उठाईं।
महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि सदन में भेदभाव होता है। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी पार्टी के सदस्यों को अंत तक बोलने की इजाजत मिलती है, लेकिन जब भी विपक्ष अपनी बात रखने की कोशिश करता है, तो उनका समय कम कर दिया जाता है। मोइत्रा के अनुसार, स्पीकर ने योजनाबद्ध तरीके से विपक्ष की आवाज को दबाया है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ सांसदों की नहीं, बल्कि उन 41 करोड़ भारतीयों की आवाज को दबाने जैसा है जिन्होंने विपक्ष को चुनकर भेजा है।
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उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए एक और बड़ी कमी बताई। मोइत्रा ने कहा कि नियम के मुताबिक स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के पद खाली होते ही भरे जाने चाहिए। लेकिन वर्तमान लोकसभा में अभी तक कोई डिप्टी स्पीकर नहीं है। उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान कार्यवाही की अध्यक्षता कौन करेगा, इसके लिए सदन की सलाह नहीं ली गई।
महुआ मोइत्रा ने अपने भाषण में खुद को सदन से निकाले जाने की घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह एक विडंबना है कि जिस स्पीकर ने उन्हें अपना बचाव करने का मौका नहीं दिया, आज वे उसी स्पीकर के खिलाफ बहस शुरू कर रही हैं। उन्होंने पिछली सरकार को महिला विरोधी बताते हुए कहा कि एथिक्स कमेटी ने उन्हें गलत तरीके से निकाला था। उन्होंने इसे 'कर्म का फल' बताया और कहा कि कोई भी अपने कर्मों से भाग नहीं सकता।
इतिहास का जिक्र करते हुए मोइत्रा ने बताया कि स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाना एक पुरानी संसदीय परंपरा है। उन्होंने 1954 में पहले स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ आए प्रस्ताव की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद सुझाव दिया था कि बहस में सरकार से ज्यादा समय विपक्ष को मिलना चाहिए। उन्होंने पूछा कि आज हम किस परंपरा का पालन कर रहे हैं? उन्होंने 1966 में सरदार हुकुम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ आए प्रस्तावों का भी उदाहरण दिया।
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मोइत्रा ने ओम बिरला पर सांसदों को सामूहिक रूप से सस्पेंड करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारतीय संसद के इतिहास में सबसे ज्यादा सांसदों को इसी कार्यकाल में निकाला गया। ये सांसद संसद की सुरक्षा में हुई चूक पर सरकार से जवाब मांग रहे थे। उन्होंने दावा किया कि सस्पेंड होने वाले सभी सांसद विपक्ष के थे और सत्ता पक्ष का एक भी सदस्य इसमें शामिल नहीं था।
भाषण के दौरान सदन में काफी हंगामा भी हुआ। जब महुआ मोइत्रा बोल रही थीं, तब उन्होंने एक मार्शल को टोक दिया। उन्होंने मार्शल से कहा कि वे चुप रहें क्योंकि कुर्सी पर सभापति बैठे हैं, मार्शल नहीं। इस पर बीजेपी सदस्यों ने विरोध जताया। सभापति कृष्ण प्रसाद टेनेटी ने कहा कि सांसदों को सदन सस्पेंड करता है, सीधे स्पीकर नहीं। इस पर मोइत्रा ने पलटवार करते हुए कहा कि जब सांसदों को निकाला गया, तब स्पीकर ही सदन की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने अंत में कहा कि जब प्रस्ताव ही स्पीकर के खिलाफ है, तो उनकी बातें भी स्पीकर के खिलाफ ही होंगी।
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महुआ मोइत्रा ने आरोप लगाया कि सदन में भेदभाव होता है। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी पार्टी के सदस्यों को अंत तक बोलने की इजाजत मिलती है, लेकिन जब भी विपक्ष अपनी बात रखने की कोशिश करता है, तो उनका समय कम कर दिया जाता है। मोइत्रा के अनुसार, स्पीकर ने योजनाबद्ध तरीके से विपक्ष की आवाज को दबाया है। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ सांसदों की नहीं, बल्कि उन 41 करोड़ भारतीयों की आवाज को दबाने जैसा है जिन्होंने विपक्ष को चुनकर भेजा है।
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उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए एक और बड़ी कमी बताई। मोइत्रा ने कहा कि नियम के मुताबिक स्पीकर और डिप्टी स्पीकर के पद खाली होते ही भरे जाने चाहिए। लेकिन वर्तमान लोकसभा में अभी तक कोई डिप्टी स्पीकर नहीं है। उन्होंने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि इस प्रस्ताव पर बहस के दौरान कार्यवाही की अध्यक्षता कौन करेगा, इसके लिए सदन की सलाह नहीं ली गई।
महुआ मोइत्रा ने अपने भाषण में खुद को सदन से निकाले जाने की घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि यह एक विडंबना है कि जिस स्पीकर ने उन्हें अपना बचाव करने का मौका नहीं दिया, आज वे उसी स्पीकर के खिलाफ बहस शुरू कर रही हैं। उन्होंने पिछली सरकार को महिला विरोधी बताते हुए कहा कि एथिक्स कमेटी ने उन्हें गलत तरीके से निकाला था। उन्होंने इसे 'कर्म का फल' बताया और कहा कि कोई भी अपने कर्मों से भाग नहीं सकता।
इतिहास का जिक्र करते हुए मोइत्रा ने बताया कि स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव लाना एक पुरानी संसदीय परंपरा है। उन्होंने 1954 में पहले स्पीकर जी.वी. मावलंकर के खिलाफ आए प्रस्ताव की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद सुझाव दिया था कि बहस में सरकार से ज्यादा समय विपक्ष को मिलना चाहिए। उन्होंने पूछा कि आज हम किस परंपरा का पालन कर रहे हैं? उन्होंने 1966 में सरदार हुकुम सिंह और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ आए प्रस्तावों का भी उदाहरण दिया।
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मोइत्रा ने ओम बिरला पर सांसदों को सामूहिक रूप से सस्पेंड करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि भारतीय संसद के इतिहास में सबसे ज्यादा सांसदों को इसी कार्यकाल में निकाला गया। ये सांसद संसद की सुरक्षा में हुई चूक पर सरकार से जवाब मांग रहे थे। उन्होंने दावा किया कि सस्पेंड होने वाले सभी सांसद विपक्ष के थे और सत्ता पक्ष का एक भी सदस्य इसमें शामिल नहीं था।
भाषण के दौरान सदन में काफी हंगामा भी हुआ। जब महुआ मोइत्रा बोल रही थीं, तब उन्होंने एक मार्शल को टोक दिया। उन्होंने मार्शल से कहा कि वे चुप रहें क्योंकि कुर्सी पर सभापति बैठे हैं, मार्शल नहीं। इस पर बीजेपी सदस्यों ने विरोध जताया। सभापति कृष्ण प्रसाद टेनेटी ने कहा कि सांसदों को सदन सस्पेंड करता है, सीधे स्पीकर नहीं। इस पर मोइत्रा ने पलटवार करते हुए कहा कि जब सांसदों को निकाला गया, तब स्पीकर ही सदन की अध्यक्षता कर रहे थे। उन्होंने अंत में कहा कि जब प्रस्ताव ही स्पीकर के खिलाफ है, तो उनकी बातें भी स्पीकर के खिलाफ ही होंगी।
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