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आरएसएस: 'धर्म और राष्ट्र अविभाज्य हैं', अशांत दुनिया में भारत की भूमिका पर क्या बोले संघ प्रमुख मोहन भागवत?
Fri, 02 Oct 2026 01:35 PM IST
शिवम गर्ग
पीटीआई, मुंबई
पीटीआई, मुंबई
Published by: शिवम गर्ग
Updated Fri, 02 Oct 2026 01:35 PM IST
सार
मुंबई में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने धर्म और राष्ट्र के संबंध पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की ज्ञान और आध्यात्मिक परंपरा दुनिया की कई चुनौतियों के समाधान में भूमिका निभा सकती है। उन्होंने वेद, गीता समेत कई परंपराओं का जिक्र किया।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
- फोटो : Amar Ujala Graphics
विस्तार
मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत में धर्म और राष्ट्र को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का उद्देश्य धर्म से जुड़ा है और धर्म राष्ट्र को मजबूती देने का काम करता है। उनके मुताबिक दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। भागवत ने यह बात अखिल भारतीय विहार सेवा समूह के 14वें सम्मेलन को संबोधित करते हुए कही। उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्र कमजोर होता है तो धर्म भी प्रभावित होता है और दोनों को साथ लेकर आगे बढ़ना जिम्मेदारी है।
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दुनिया कई तरह के विरोधाभासों से जूझ रही
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि आज दुनिया के सामने विकास और पर्यावरण संरक्षण, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक जीवन तथा धार्मिक आस्था और संघर्ष के बीच संतुलन बनाने की चुनौती है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कई जगह संतुलन की कमी दिखाई दे रही है। उनके मुताबिक एक समस्या का समाधान करते समय दूसरी समस्या सामने आ जाती है।
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'दुनिया भारत से समाधान की उम्मीद कर रही'
भागवत ने कहा कि भारत की ज्ञान परंपरा दुनिया के सामने मौजूद इन चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकती है। उन्होंने कहा कि भारत ने ऐतिहासिक रूप से दूसरे देशों पर कब्जा किए बिना और लोगों का धर्म परिवर्तन कराए बिना अपने ज्ञान को दुनिया के साथ साझा किया है। उन्होंने कहा कि दुनिया को उम्मीद है कि रास्ता भारत से निकलेगा।
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वेद से गुरु ग्रंथ साहिब तक का किया जिक्र
मोहन भागवत ने भारत की ज्ञान परंपरा का जिक्र करते हुए वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, जैन आगम, त्रिपिटक और गुरु ग्रंथ साहिब समेत संतों की शिक्षाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारत के पास ज्ञान की ऐसी बड़ी विरासत है, जिसकी आज दुनिया को जरूरत है। भागवत के मुताबिक भक्ति और समर्पण के जरिए व्यक्ति ईश्वर के करीब पहुंच सकता है।
'ज्ञान की परंपरा को बचाना मानवता की सेवा'
भागवत ने कहा कि इस ज्ञान और परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लोगों के जीवन और उनकी परंपराओं की रक्षा करना केवल धार्मिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह मानवता की सेवा भी है। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों की रक्षा का मतलब केवल एक व्यक्ति के जीवन की सुरक्षा करना नहीं, बल्कि पूरी मानवता के सुरक्षित भविष्य की रक्षा करना है।