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संघ यात्रा के 100 साल: मोहन भागवत बोले- वीर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है तो पुरस्कार की प्रतिष्ठा बढ़ेगी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई।
Published by: राहुल कुमार
Updated Sun, 08 Feb 2026 06:25 PM IST
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सार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के 100 साल पूरे होने पर मुंबई में रविवार को आयोजित कार्यक्रम में वीर सावरकर को भारत रत्न दिए जाने की मांग को उठाया है। मुंबई में आयोजित 'संघ यात्रा के 100 साल : नए क्षितिज' कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने भारत रत्न दिए जाने में हो रही देरी पर भी अपनी बात रखी।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत
- फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि यदि विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) को भारत रत्न दिया जाता है, तो यह सम्मान खुद इस पुरस्कार की गरिमा को बढ़ाएगा। उन्होंने कहा कि सावरकर को किसी पुरस्कार की जरूरत नहीं है, क्योंकि वे पहले ही देशवासियों के दिलों में स्थान बना चुके हैं।
'बिना किसी सम्मान के भी सावरकर जनता के दिलों पर राज करते हैं'
उन्होंने कहा, मैं उस समिति का हिस्सा नहीं हूं जो इस पर फैसला करती है, लेकिन अगर किसी से मुलाकात होगी तो जरूर पूछूंगा कि इसमें देरी क्यों हो रही है। अगर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है तो यह पुरस्कार के लिए ही सम्मान होगा और उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ेगी। बिना किसी सम्मान के भी सावरकर जनता के दिलों पर राज करते हैं। वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही है। कई संगठन और नेता उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिए जाने की मांग करते रहे हैं। वहीं, कांग्रेस पार्टी इस मांग का विरोध करती रही है। कांग्रेस का आरोप है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सरकार को भेजी गई दया याचिकाओं के कारण सावरकर 'देशद्रोही' थे।
दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना लगातार सावरकर को भारत रत्न देने के पक्ष में खड़ी रही हैं। इन दलों का कहना है कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और समाज सुधारक थे और उनका योगदान देश के इतिहास में महत्वपूर्ण है। अपने संबोधन में मोहन भागवत ने आरएसएस की कार्यशैली और विचारधारा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य प्रचार या आक्रामक अभियान चलाना नहीं, बल्कि समाज में अच्छे संस्कारों का निर्माण करना है। अत्यधिक प्रचार से दिखावा बढ़ता है और इससे अहंकार पैदा हो सकता है। इससे बचना जरूरी है। प्रचार वर्षा की तरह होना चाहिए, समय पर और सीमित मात्रा में।
RSS: 'बांग्लादेश में 1.25 करोड़ हिंदू, एकजुट हो जाएं तो...', पड़ोसी देश में हिंदुओं की स्थिति पर बोले भागवत
संगठन की कार्यप्रणाली में अंग्रेजी भाषा को माध्यम नहीं बनाया जाएगा- भागवत
उन्होंने यह भी बताया कि संघ हाल के वर्षों में समाज से जुड़ने के लिए अपने संपर्क और संवाद कार्यक्रमों का विस्तार कर रहा है। भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया कि संगठन की कार्यप्रणाली में अंग्रेजी भाषा को माध्यम नहीं बनाया जाएगा, क्योंकि यह भारतीय भाषा नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि जहां आवश्यकता होती है, वहां अंग्रेजी का उपयोग किया जाता है। हमें भारतीय लोगों के साथ मिलकर काम करना है। जहां अंग्रेजी जरूरी होगी, वहां हम उसका प्रयोग करेंगे।
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि लोगों को अंग्रेजी भाषा अच्छी तरह आनी चाहिए ताकि वे उसे प्रभावी ढंग से बोल सकें। साथ ही, उन्होंने मातृभाषा के संरक्षण का जिक्र करते हुए कहा, "अंग्रेजी में दक्ष होना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी मातृभाषा को भूल जाएं।" उन्होंने बंगलूरू का एक उदाहरण देते हुए बताया कि दक्षिण भारत के कुछ प्रतिनिधियों को हिंदी समझने में दिक्कत हो रही थी, तब उन्होंने संवाद को प्रभावी बनाने के लिए अंग्रेजी में जवाब दिया।
(इनपुट: आईएएनएस)
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'बिना किसी सम्मान के भी सावरकर जनता के दिलों पर राज करते हैं'
उन्होंने कहा, मैं उस समिति का हिस्सा नहीं हूं जो इस पर फैसला करती है, लेकिन अगर किसी से मुलाकात होगी तो जरूर पूछूंगा कि इसमें देरी क्यों हो रही है। अगर सावरकर को भारत रत्न दिया जाता है तो यह पुरस्कार के लिए ही सम्मान होगा और उसकी प्रतिष्ठा और बढ़ेगी। बिना किसी सम्मान के भी सावरकर जनता के दिलों पर राज करते हैं। वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मांग लंबे समय से राजनीतिक बहस का विषय रही है। कई संगठन और नेता उन्हें देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिए जाने की मांग करते रहे हैं। वहीं, कांग्रेस पार्टी इस मांग का विरोध करती रही है। कांग्रेस का आरोप है कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ब्रिटिश सरकार को भेजी गई दया याचिकाओं के कारण सावरकर 'देशद्रोही' थे।
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दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और शिवसेना लगातार सावरकर को भारत रत्न देने के पक्ष में खड़ी रही हैं। इन दलों का कहना है कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी, लेखक और समाज सुधारक थे और उनका योगदान देश के इतिहास में महत्वपूर्ण है। अपने संबोधन में मोहन भागवत ने आरएसएस की कार्यशैली और विचारधारा पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संघ का उद्देश्य प्रचार या आक्रामक अभियान चलाना नहीं, बल्कि समाज में अच्छे संस्कारों का निर्माण करना है। अत्यधिक प्रचार से दिखावा बढ़ता है और इससे अहंकार पैदा हो सकता है। इससे बचना जरूरी है। प्रचार वर्षा की तरह होना चाहिए, समय पर और सीमित मात्रा में।
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संगठन की कार्यप्रणाली में अंग्रेजी भाषा को माध्यम नहीं बनाया जाएगा- भागवत
उन्होंने यह भी बताया कि संघ हाल के वर्षों में समाज से जुड़ने के लिए अपने संपर्क और संवाद कार्यक्रमों का विस्तार कर रहा है। भाषा के मुद्दे पर बोलते हुए आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया कि संगठन की कार्यप्रणाली में अंग्रेजी भाषा को माध्यम नहीं बनाया जाएगा, क्योंकि यह भारतीय भाषा नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि जहां आवश्यकता होती है, वहां अंग्रेजी का उपयोग किया जाता है। हमें भारतीय लोगों के साथ मिलकर काम करना है। जहां अंग्रेजी जरूरी होगी, वहां हम उसका प्रयोग करेंगे।
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि लोगों को अंग्रेजी भाषा अच्छी तरह आनी चाहिए ताकि वे उसे प्रभावी ढंग से बोल सकें। साथ ही, उन्होंने मातृभाषा के संरक्षण का जिक्र करते हुए कहा, "अंग्रेजी में दक्ष होना जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम अपनी मातृभाषा को भूल जाएं।" उन्होंने बंगलूरू का एक उदाहरण देते हुए बताया कि दक्षिण भारत के कुछ प्रतिनिधियों को हिंदी समझने में दिक्कत हो रही थी, तब उन्होंने संवाद को प्रभावी बनाने के लिए अंग्रेजी में जवाब दिया।
(इनपुट: आईएएनएस)