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नक्सलवाद का पूर्ण खात्मा: बचे हैं 61 दिन... लड़ाई छोड़ भागे नक्सली; प्रेशर IED से चोट पहुंचाने की योजना

Jitendra Bhardwaj जितेंद्र भारद्वाज
Updated Thu, 29 Jan 2026 08:41 PM IST
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Naxal: Complete elimination of Naxalism only 61 days remaining, Naxalites on run due to aggressive offensive
नक्सल के खिलाफ सुरक्षाबलों के अभियान। - फोटो : अमर उजाला

देश में नक्सलवाद के खात्मे का काउंट डाउन प्रारंभ हो चुका है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलवाद के संपूर्ण खात्मे के लिए 31 मार्च 2026, डेड लाइन तय की है। अब महज '61' दिन बचे हैं। नक्सलियों द्वारा सरेंडर करने की संख्या बढ़ रही है। गत वर्ष लगभग 13 सौ माओवादी, जिनमें टॉप और मध्य लेवल के नक्सली शामिल हैं, सरेंडर कर चुके हैं। मौजूदा समय में मध्य क्रम के लगभग सवा सौ नक्सली सक्रिय बताए जा रहे हैं। करीब आधा दर्जन बड़े नक्सली बचे हैं। हालांकि अब नक्सली, फ्रंटफुट की लड़ाई से भाग रहे हैं। वे सुरक्षा बलों के सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। छत्तीसगढ़ के ऑपरेशनल एरिया में मौजूद एक अधिकारी बताते हैं, बचे खुचे नक्सलियों ने अब प्रेशर आईईडी से चोट पहुंचाने का प्लान तैयार किया है। वे जानते हैं कि जंगल/पहाड़ियों पर सुरक्षा बल, सर्च के लिए निकले हैं। ऐसे में वे प्रेशर आईईडी लगा देते हैं। जवानों का पैर पड़ते ही आईईडी फट जाती है। कई जगह 'आईईडी' से नुकसान पहुंचाने की दूसरी तकनीक भी इस्तेमाल की जा रही है। सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी, आईटीबीपी एवं बीएसएफ आदि बलों को आईईडी बाबत सचेत किया जा रहा है।

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अंतिम दौर की लड़ाई में नक्सलियों ने अपने ठिकानों के आसपास बारूद बिछा दिया है। यानी 'इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस' आईईडी लगा दी हैं। इसे कहीं भी बैठकर संचालित किया जा सकता है। अगर सटीक टाइमिंग है तो इससे सुरक्षा बलों को बड़ा नुकसान पहुंचाया जा सकता है। छत्तीसगढ़ में बस्तर रेंज के आईजी सुंदरराज पी के मुताबिक, 25 जनवरी को छत्तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा पर कर्रेगुट्टा हिल्स के निकट नक्सलियों की मूवमेंट का पता लगा था। कोबरा, डीआरजी और एसटीएफ के जवान सर्चिंग पर निकले थे। तभी वे माओवादियों द्वारा लगाई गई प्रेशर आईईडी की चपेट में आ गए। इस घटना में दस जवान घायल हो गए, जिन्हें एयरलिफ्ट कर रायपुर स्थित अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
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सीआरपीएफ, डीआरजी एवं दूसरे बलों ने सर्च के दौरान आईईडी का पता लगाने के लिए तकनीकी उपकरणों एवं स्निफर डॉग की मदद ली है। इसके बावजूद आईईडी विस्फोट एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। नक्सलियों के शीर्ष कमांडरों के ठिकानों को ध्वस्त किया जा रहा है। सीआरपीएफ द्वारा जिस तेजी के साथ पांच-पांच किलोमीटर की दूरी पर एफओबी स्थापित किए जा रहे हैं, उससे नक्सलियों की कोर टीम के पैर उखड़ चुके हैं। अधिकारी के अनुसार, जो नक्सली बचे हैं, वे सुरक्षा बलों का सामना करने की स्थिति में नहीं हैं। नक्सलियों ने जंगलों में ऐसी जगहों पर, जहां से सुरक्षा बलों का मूवमेंट होता है या सर्च होता है, वहां प्रेशर 'इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस' दबा दी जाती है। सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने के लिए नक्सली, इसी तकनीक का सहारा ले रहे हैं। 
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बीजापुर और तेलंगाना बॉर्डर के 'करेगुट्टा' पहाड़ी क्षेत्र के अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी जगह-जगह पर आईईडी लगाई गई हैं। सर्च अभियान में सुरक्षा बलों का फोकस अब 'आईईडी' तलाशने पर है। आईईडी का खतरा, उन क्षेत्रों में ज्यादा है, जहां पर कच्चे रास्ते हैं। वहां नक्सली, आसानी से आईईडी लगा देते हैं। एफओबी के आसपास इस मामले में ज्यादा सर्तकता बरती जाती है। किसी वाहन में सवार होने की बजाए, जवान बाइक पर चलते हैं। इससे आईईडी से होने वाले नुकसान की संभावना कम हो जाती है। हालांकि आईईडी से बचाव के लिए स्निफर डॉग और तकनीकी उपकरणों की मदद ली जा रही है। जिस रास्ते पर सुरक्षा बलों की मूवमेंट होती है, पहले उसे  सेनिटाइज किया जाता है। रोड ओपनिंग पार्टी भी रहती है। आईईडी से बचने के लिए विशेष ट्रेनिंग दी जाती है। 

नक्सलियों द्वारा ज्यादातर प्रेशर आईईडी का इस्तेमाल किया जा रहा है। उस पर जवान या अधिकारी का पैर पड़ते ही वह फट जाती है। दूर बैठा व्यक्ति भी इसे संचालित कर सकता है। सीआरपीएफ द्वारा गत वर्षों में हजारों 'आईईडी/टिफिन' बम बरामद किए गए हैं। जंगल या पहाड़ पर ज्यादातर, प्रेशर आईईडी ही इस्तेमाल में लाई जाती हैं। आईईडी विस्फोट करने में टाइमिंग बहुत अहम प्वाइंट है। एक्सपर्ट व्यक्ति ही इसे सुरक्षित तरीके से ब्लास्ट कर सकता है। भले ही देश में उच्च विस्फोटक जैसे आरडीएक्स/पीईटीएन आसानी से नहीं मिलते हैं, लेकिन कम क्षमता वाले विस्फोटक पोटाशियम, चारकोल, आर्गेनिक सल्फाइड, नाइट्रेट और ब्लैक पाउडर आदि से आईईडी और टिफिन बम तैयार कर लिए जाते हैं। 

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छत्तीसगढ़ में तो पीडब्लूडी एवं माइनिंग विभाग, कई तरह के विकास कार्यों में जिलेटिन स्टिक का इस्तेमाल करते हैं। इसकी मदद से इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस 'आईईडी', टिफिन बम और दूसरे तरह के प्रेशर बम तैयार किए जा सकते हैं। आईईडी को रिमोट कंट्रोल, इंफ्रारेड, मैग्नेटिक ट्रिगर्स, प्रेशर-सेंसिटिव बार्स या ट्रिप वायर की मदद से संचालित किया जाता है। कम आयु के नक्सलियों को रिमोट कंट्रोल से ही आईईडी विस्फोट करने की ट्रेनिंग दी जाती है। प्रेशर कूकर बम कैसे तैयार होता है, ये भी उन्हें सिखाया गया है। नक्सली, यही तरीका प्रयोग में ला रहे हैं। टिफिन बम भी बड़े स्तर पर इस्तेमाल हुए हैं। रिमोट या टाइमर के द्वारा आसानी से यह ब्लास्ट हो जाता है। ऐसे ब्लास्ट तैयार करने के लिए नक्सलियों के पास कंटेनर, केमिकल, डेटोनेटर, इनिशिएटर और वायर सब कुछ होता है। डेटोनेटर को पावर देने के लिए माओवादी, ड्राई बैटरी सेल का इस्तेमाल कर रहे हैं। स्पेशल डेटोनेटर भी आने लगे हैं। 

एक्सपर्ट के अनुसार, नक्सलियों द्वारा स्पेशल डेटोनेटर में घड़ी का सेल लगाया जा रहा है। अगर ज्यादा वोल्टेज की जरूरत है तो वहां तीन चार सेल जोड़ देते हैं। मार्केट में स्विच आसानी से उपलब्ध हो जाता है। ब्लास्ट की घटना में टाइमिंग एक बड़ा फैक्टर होता है। अगर ये ठीक नहीं रहा तो विस्फोट करने वाला खुद भी मारा जाता है। नक्सली, 1.95 डेस्क टाइमर का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन सबके लिए उन्हें ट्रेनिंग दी जाती है। एबीसीडी स्विच की जगह पर दूसरी टर्म आ गई है। अगर एक्सपर्ट नहीं है तो टाइम आगे पीछे हो जाता है। नतीजा, समय पर ब्लास्ट नहीं होता। हालांकि, बचे हुए नक्सली अब ज्यादातर प्रेशर आईईडी का इस्तेमाल कर रहे हैं। 



 


 



 

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