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Padma Awards: जानिए ऐसी अनूठी गुमनाम हस्तियों के बारे में, जिन्होंने चुनौतियों को बनाई आगे बढ़ने की प्रेरणा

अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: शिवम गर्ग Updated Mon, 26 Jan 2026 08:21 AM IST
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सार

2026 के पद्म पुरस्कार विजेताओं की सूची गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जारी की गई है। इसमें देशभर के 45 गुमनाम नायकों को विभिन्न क्षेत्रों में उनके उत्कृष्ट सेवाओं-कार्यों के लिए सम्मानित किया गया है, जिसने लोगों के साथ समाज को भी बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई।

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Padma Awards 2026: Unsung Heroes Honored for Transforming Lives Across India
पद्म पुरस्कार 2026 विजेताओं का एलान - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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2026 के पद्म पुरस्कार विजेताओं की सूची गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जारी की गई। इस साल 45 गुमनाम नायकों को उनके उत्कृष्ट कार्यों और समाज सेवा के लिए सम्मानित किया गया। इन नायकों ने अपने समर्पण और मेहनत से समाज के विभिन्न वर्गों में बदलाव लाया है।
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अंके गौड़ा ने बनाया सबसे बड़ा पुस्तकालय
कर्नाटक के मांड्या जिले के एक छोटे से गांव हरलहल्ली के 75 वर्षीय अंके गौड़ा ने खुद के दम पर देश का सबसे बड़ा निशुल्क पुस्तकालय पुस्तक माने बनाया। इसमें 20 से अधिक भाषाओं में करीब 20 लाख किताबें, दुर्लभ पांडुलिपियां, करीब पांच लाख दुर्लभ विदेशी किताबें और विभिन्न भाषाओं के 5,000 शब्दकोश हैं। गौड़ा का यह सफर बेहद प्रेरणादायक है। किताबें जुटाने का उनका जुनून तब शुरू हुआ, जब वह महज 20 साल के थे और एक बस कंडक्टर के रूप में काम करते थे। किताबों के प्रति उनकी भूख इतनी बढ़ी कि उन्होंने बाद में कन्नड़ साहित्य में मास्टर डिग्री हासिल की। इसके बाद करीब तीन दशकों तक चीनी मिल में काम किया, जिससे होने वाली कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा किताबों की खरीदारी में खर्च हुआ। गौड़ा को छोटे से गांव को ज्ञान की राजधानी बनाने का श्रेय भी जाता है।
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आर्मिडा फर्नांडिस: एशिया के पहले मानव दूध बैंक की स्थापना
महाराष्ट्र की प्रख्यात बाल एवं नवजात शिशु रोग विशेषज्ञ। मुंबई में एशिया के पहले मानव दूध बैंक की स्थापना की। इससे शिशुओं के जीवित रहने की संभावनाओं में व्यापक सुधार देखने को मिला। राज्य में 2,000 से अधिक नर्सों एवं डॉक्टरों को प्रशिक्षित किया और शिशु मृत्यु दर को 70 फीसदी से घटाकर 12 फीसदी के स्तर पर लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्हें इंडियन नियोनेटोलॉजी (भारतीय नवजात शिशु चिकित्सा) की मां के रूप में भी जाना जाता है। मातृ स्वास्थ्य पर भी काम करती हैं।

बुधरी थाती : नक्सली क्षेत्रों में हजारों आदिवासी परिवारों का बदला जीवन
बुधरी थाती छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले की सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जिन्होंने पूरा जीवन आदिवासियों के कल्याण और उन्हें शिक्षा-स्वास््थ्य सेवाएं मुहैया कराने में खपाया है। नक्सल प्रभावित बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण इलाकों में वह गांधीवादी मूल्यों के साथ काम के लिए जानी जाती हैं। कुरीतियों और अंधविश्वास के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है। बड़ी दीदी के नाम से मशहूर बुधरी नशामुक्ति, महिला सशक्तीकरण और आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा की अलख जगाकर हजारों परिवारों का जीवन बदला है।

डॉ. सुरेश : हजारों हीमोफीलिया मरीजों को दे चुके हैं नया जीवन
कर्नाटक के डॉ. सुरेश हनागवाड़ी प्रसिद्ध पैथोलॉजिस्ट और हीमोफीलिया विशेषज्ञ हैं। 70 फीसदी हीमोफीलिया से पीड़ित होने के बावजूद रक्त विकारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। हीमोफीलिया और अन्य रक्त विकारों के लिए स्वास्थ्य सेवा में सुधार को जीवन समर्पित कर दिया। कर्नाटक का पहला हीमोफीलिया उपचार केंद्र स्थापित किया, जहां हजारों मरीज निशुल्क इलाज करा चुके हैं। सरकारी जिला अस्पतालों में हीमोफीलिया की महंगी दवाएं मुफ्त में उपलब्ध कराने के लिए सरकार के साथ सक्रिय रूप से पैरवी की।

डॉ. एसजी सुशीलम्मा : कूड़ा बीनने वाले हजारों बच्चों का जीवन संवारा
कर्नाटक की प्रतिष्ठित सामाजिक कार्यकर्ता और सुमंगली सेवाश्रम की संस्थापक हैं। संस्था 200 से अधिक आंगनवाड़ियों के प्रबंधन के साथ मुफ्त शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करा चुकी है। सुशीलम्मा अब तक कूड़ा बीनने वाले हजारों बच्चों के पुनर्वास और स्लम निवासियों के लिए आवास प्रदान कराने में महत्वपूर्ण भूमिका। 1975 में पति के निधन के बाद मात्र 15 रुपये के साथ तीन बच्चों की परवरिश करते हुए यह सेवा कार्य शुरू किया था। महिलाओं को कानूनी, सामाजिक और आर्थिक अधिकार दिलाने के लिए कौशल प्रशिक्षण भी देती हैं।

डॉ. श्याम सुंदर : बनाई कम कीमत में कालाजार का पता लगाने की कीट
बीएचयू के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के मेडिसिन विभाग के डॉ. श्याम ने कालाजार का पता लगाने के लिए बेहद कम कीमत में कीट बनाई और इसके निदान एवं उपचार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। कालाजार का इलाज करने वाले दुनियाभर के डॉक्टरों में उनकी खास पहचान है। खास बात है कि उन्होंने लिपोसोमल एम्फोटेरिसिन बी की एक खुराक से कालाजार के उपचार की विधि खोजी और इसकी वैक्सीन के शोध में भी प्रमुख रूप से शामिल रहे हैं।

रघुपत सिंह : विकसित कर चुके हैं 400 से अधिक किस्म के पौधे
उत्तर प्रदेश के रघुपत सिंह कृषि क्षेत्र और खासतौर पर बीज संरक्षण में नवाचार के लिए विख्यात हैं। पांच दशक से अधिक समय के अपने खेती-किसानों के अनुभवों और नई तकनीकी के इस्तेमाल से 400 से अधिक नए किस्म के पौधे विकसित कर चुके हैं। इसमें 1.5 मीटर लंबी लौकी भी शामिल है। 32 देसी किस्मों के संरक्षण के साथ नई टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर खेती-किसानी को मुनाफा लायक बनाया और कमाई बढ़ाकर लाखों किसानों के जीवन को बेहतर करने में अहम भूमिका निभाई।

चिरंजी लाल यादव : अपनी कारीगरी से बन गए पीतल नगरी के शिल्प गुरु
पीतल नगरी मुरादाबाद के चिरंजी लाल यादव अपनी कारीगरी और कड़ी मेहनत से पीतल उत्पादों को नया स्वरूप देने के लिए मशहूर हैं। पीतल पर अपने व्यापक कार्यों के लिए उन्हें दुनियाभर में पहचान मिली। गुरु-शिष्य परंपरा को कायम रखते हुए उन्होंने युवाओं को प्रशिक्षित करने, परंपरागत कार्यों को संरक्षित करने और समाज के कमजोर वर्गों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। पीतल हैंडीक्राफ्ट को आगे बढ़ाने के साथ उन्होंने बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका।

भीकल्या लडक्या ढिंडा : झोपड़ी में रहकर बचाई आदिवासी संस्कृति
महाराष्ट्र निवासी ढिंडा सूखी लौकी और बांस से बने आदिवासी वाद्ययंत्र तारपा को बजाने वाले देश में इस समय एकमात्र लीविंग लेजेंड हैं। उनके पास तारपा बजाने की चार पीढ़ी की लंबी विरासत है, जिसे आदिवासी संस्कृति का प्रतीक माना जाता है। झोपड़ी में जीवन-बसर करने वाले ढिंडा 92 साल की उम्र में भी वारली और अन्य आदिवासी परंपराओं एवं कला को बचाने के साथ उनका प्रचार-प्रसार करते हैं। चकाचौंध से दूर ढिंडा युवाओं को इन परंपराओं के प्रति जागरुकता फैलाने पर अधिक जोर देते हैं।

श्रीरंग देवबा लाड : खेती में नवाचार से बढ़ाई हजारों किसानों की कमाई
दादा के नाम से मशहूर लाड का सफर किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि खेत की मेड़ से शुरू हुआ। खेती-किसानी में नवाचार के लिए मशहूर हैं। उन्होंने दादा लाड कॉटन टेक्निक नामक एक ऐसी तकनीक का ईजाद किया, जिसने महाराष्ट्र में कपास की खेती में क्रांति ला दी। गांव-गांव जाकर किसानों और उससे जुड़े लोगों को प्रशिक्षित किया। नतीजा यह हुआ कि कपास की उपज 300 फीसदी तक बढ़ गई, जिससे हजारों किसानों की कमाई 40 फीसदी तक बढ़ाने में मदद मिली।

रघुवीर तुकाराम : लोक संस्कृति को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका
महाराष्ट्र के मशहूर तमाशा कलाकार हैं, जो पिछले पांच दशक से अधिक समय में 12,000 से ज्यादा शो कर चुके हैं। वह अपने तमाशा के जरिये, दहेज प्रथा, भ्रष्टाचार, परिवार नियोजन, अपराध, साफ-सफाई और शिक्षा समेत अन्य को लेकर जागरुकता फैलाने के लिए जाने जाते हैं। महाराष्ट्र की पारंपरिक लोक कला एवं संस्कृति को बचाने के साथ उन्हें आधुनिक बनाने में महत्वपू्र्ण भूमिका निभा रहे हैं। लोक संस्कृतियों से युवाओं को रूबरू कराने पर उनका जोर रहता है, ताकि विरासत आगे बढ़ सके।

रामचंद्र-सुनीता गोडबोले: दुर्गम इलाकों में मरीजों को मुफ्त इलाज
डॉ. रामचंद्र त्र्यंबक गोडबोले पिछले 37 वर्षों से बस्तर और अबूझमाड़ जैसे दुर्गम आदिवासी इलाकों में मुफ्त चिकित्सा सेवा दे रहे हैं। वह एक आयुर्वेद चिकित्सक हैं और पत्नी सुनीता गोडबोले के साथ मिलकर स्वास्थ्य जागरूकता और कुपोषण के खिलाफ लगातार काम कर रहे हैं। दोनों ने मिलकर ट्रस्ट फॉर हेल्थ के माध्यम से ऐसे गांवों तक इलाज पहुंचाया, जहां सड़क, बिजली और मोबाइल नेटवर्क तक नहीं है। वे इन इलाकों में खुद पैदल जाकर स्वास्थ्य शिविर लगाते हैं और मरीजों का इलाज करते हैं।

कोल्लकेयिल देवकी अम्मा: पर्यावरण संरक्षण की जीवंत मिसाल
अलाप्पुझा जिले की 92 वर्षीय कोल्लकेयिल देवकी अम्मा पर्यावरण संरक्षण की जीवंत मिसाल हैं। अथक मेहनत से 4.5 एकड़ बंजर भूमि को घने जंगल में तब्दील कर दिया जिसे तपोवनम के नाम से जाना जाता है। इस जंगल में आज 3,000 से अधिक पेड़ और 1,500 से ज्यादा दुर्लभ औषधीय पौधे मौजूद हैं। 

हली वार: जड़ों से बुनकर बनाया पुल  
रबड़ प्रजाति के पेड़ फिकस की जड़ों के संरक्षण में अहम भूमिका। मेघालय के पूर्वी खासी जिले के हली वार जब 10 वर्ष के थे, तभी आर्द्र, मानसूनी जलवायु में भी पनपने वाले फिकस इलास्टिका की जड़ों को बुनकर 600 वर्षों तक टिकने वाला पुल बनाया था। वह ग्रामीणों के साथ मिलकर पर्यावरण संरक्षण पर भी काम करते हैं।

तगा राम: अलगोजा की छुपकर प्रैक्टिस
जैसलमेर निवासी तगा राम मशहूर अलगोजा वादक हैं। अलगोजा वादन की शैली से यूरोपीय देशों, रूस, अमेरिका और जापान तक के कलाप्रेमियों को प्रभावित किया है। 10 साल की उम्र में ही इसमें महारत हासिल कर ली और 11 साल की उम्र में खुद का अलगोजा खरीद सफर की शुरुआत की। तब से कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

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