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अभी कितनी बार बढ़ेंगे पेट्रोल-डीजल के दाम: क्यों 10 दिन में चार बार हो चुकी बढ़ोतरी, कब तक चलेगा यह सिलसिला?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 25 May 2026 07:25 PM IST
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सार

भारत में 25 मई को चौथी बार पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की गई। विश्लेषकों का मानना है कि अगर वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में कमी नहीं आती और यह लंबे समय में स्थिर नहीं होतीं तो देश में ईंधन की कीमतें और बढ़ सकती हैं। 

Petrol Diesel Price Rise in India Fuel Costs increase in 10 days Cities States VAT Excise Duty Hormuz Crisis U
भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने के कारण। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 25 मई 2026 (सोमवार) को फिर बढ़ोतरी कर दी गई। इस बार तेल कंपनियों ने पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की। बीते 10 दिन में यह चौथा मौका है, जब ईंधन की कीमतें बढ़ाई गई हैं। राजधानी दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया है। वहीं, दूसरे राज्यों में भी ईंधन की कीमतें अलग-अलग टैक्स दरों की वजह से उच्च स्तर पर बनी हुई हैं। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर भारत में ईंधन की कीमतों के अचानक तेजी से बढ़ने की क्या वजहे हैं? यह कब से जारी है और किन शहरों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सबसे ज्यादा हो गई हैं? पेट्रोल-डीजल की कीमतों में यह बढ़ोतरी कब तक जारी रह सकती है? सरकार इस तेज बढ़ोतरी से निपटने के लिए क्या योजना बना रही है? आइये जानते हैं...
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भारत में ईंधन की कीमतों के अचानक तेजी से बढ़ने की क्या वजह है?

देशभर में बीते 10 दिन में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में अचानक और तेजी से बढ़ोतरी की गई है। यह बढ़ोतरी अब तक करीब 7.50 रुपये प्रति लीटर तक हो चुकी है। इस पूरे घटनाक्रम के लिए न सिर्फ वैश्विक, बल्कि कुछ घरेलू स्तरों की परेशानियां हैं। 

वजह-1: ईरान-अमेरिका संघर्ष और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल

ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की सबसे बड़ी वजह 28 फरवरी, 2026 को शुरू हुआ ईरान-अमेरिका युद्ध है। इस भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में 50 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। जहां युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड की कीमतें करीब 65-72 डॉलर प्रति बैरल के बीच थीं, वहीं संघर्ष के दौरान इसकी कीमत लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। जो फिलहाल करीब 97 डॉलर प्रति बैरल है। 

वजह-2: होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावट

अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध के दौरान तेहरान ने अचानक होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया। यह जल मार्ग दुनिया की जरूरत का लगभग पांचवां हिस्सा (20%) कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए जिम्मेदार है। युद्ध की वजह से इस बेहद अहम समुद्री मार्ग से तेल-गैस लाने वाले जहाजों को निकलने में भारी दिक्कत हो रही है। जहां एक तरफ होर्मुज के करीब से निकलने वाले जहाजों को बिना इजाजत के निकलने पर ईरान निशाना बना रहा है तो वहीं ईरान के करीब से निकलने पर अमेरिकी नौसेना भी कुछ तेल टैंकरों को कब्जे में ले चुकी है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि वैश्विक बाजार में तेल की कमी की आशंका भारी पड़ रही है और तेल-गैस ले जाने वाले जहाजों के बीमा प्रीमियम के साथ-साथ माल ढुलाई की लागत भी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। 

इसका सबसे ज्यादा असर दक्षिण एशियाई, पूर्वी एशियाई और कुछ यूरोपीय देशों पर भी देखा जा रहा है, जो कि लंबे समय से तेल आपूर्ति के लिए पश्चिम एशिया के इसी जल मार्ग पर निर्भर रहे हैं। नतीजतन दूसरे स्रोतों से खरीदी जा रही तेल-गैस या तो महंगी साबित हो रही है या फिर उन्हें लाने और ले जाने का खर्च काफी ज्यादा है, जिससे ईंधन की कीमत बढ़ रही है। उदाहरण के तौर पर भारत ने होर्मुज बंद होने के बाद से अमेरिका-वेनेजुएला से तेल-गैस खरीद बढ़ाई है। लेकिन लंबी दूरी के कारण वहां से टैंकरों के आने का खर्च और अवधि दोनों ही ज्यादा हैं। यानी आपूर्ति के लिए न सिर्फ ज्यादा खर्च हो रहा है, बल्कि लगातार आपूर्ति बनाए रखना भी चुनौती बना हुआ है।
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3. भारत की उच्च आयात निर्भरता और कमजोर रुपया

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 85-90 फीसदी हिस्सा आयात करता है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की खरीद अमेरिकी डॉलर में होती है, इसलिए तेल की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के कमजोर होने से तेल का आयात करना और भी ज्यादा महंगा हो गया है। मौजूदा समय में एक डॉलर की कीमत करीब 95 रुपये के आसपास है। यह रुपये की सर्वकालिक खराब स्थिति है। 

4. तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) का भारी घाटा

न्यूज एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (पीटीआई) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही थीं, तब भारत की सरकारी तेल कंपनियों (इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम) ने चुनाव और उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाने के लिए करीब 78 दिनों तक पेट्रोल-डीजल की खुदरा कीमतें नहीं बढ़ाईं। महंगे दाम पर तेल-गैस खरीदकर पुरानी सस्ती दरों पर बेचने से इन कंपनियों को रोजाना लगभग 1,600 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाया। जब तक पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने का फैसला लिया गया, तब तक तेल कंपनियों का कुल घाटा 1.2 लाख करोड़ रुपये के पार जा चुका था। अब इसी पुराने घाटे की भरपाई करने के लिए तेल कंपनियों को कीमतें बढ़ानी पड़ रही हैं।

बीते हफ्ते जब सरकार ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों को करीब तीन रुपये तक बढ़ाया था, तब तेल विपणन कंपनियों का घाटा कम होकर 750 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई थी। इससे पहले सरकार लगातार एलपीजी, खासकर वाणिज्यिक सिलिंडरों की कीमत बढ़ाती चली जा रही है। 

भारत में कबसे जारी है ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी?

भारत में पांच राज्यों (असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुदुचेरी) के चुनाव के समापन के बाद पहली बार तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की गई। चार साल से ज्यादा समय (49 महीने) के बाद पहली बार तेल की कीमतों को बढ़ाया गया। इससे पहले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पेट्रोल-डीजल की कीमतों को दो रुपये तक कम किया गया था। आखिरी बार तेल की कीमतें भारत में 2022 में बढ़ाई गई थीं।

इस तरह महज 10 दिनों (15 मई से 25 मई, 2026) के अंदर कीमतों में लगातार चार बार बदलाव किया गया है। इस दौरान कुल मिलाकर पेट्रोल लगभग 7.35 रुपये और डीजल लगभग 7.53 रुपये प्रति लीटर महंगा हो चुका है। 

किन शहरों में पेट्रोल-डीजल की कीमतें सबसे ज्यादा हो गई हैं?

भारत में अलग-अलग राज्यों में टैक्स दरों में अंतर के कारण ईंधन की कीमतें अलग-अलग हैं, लेकिन हालिया बढ़ोतरी के बाद देश में सबसे ज्यादा कीमतें आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में दर्ज की गई हैं।



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इसकी तुलना में दिल्ली, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कीमतें कम हैं। दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर है। वहीं, यूपी में पेट्रोल 101.86 रुपये और डीजल 95.34 रुपये तक पहुंच गया है। 

शहरों में इन कीमतों में इतना अंतर क्यों?

ईंधन पर केंद्र सरकार की तरफ से लगाया गया उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) पूरे देश में समान रहता है। हालांकि, अलग-अलग राज्यों में कीमतें वहां की राज्य सरकारों द्वारा लगाए जाने वाले वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) पर निर्भर करती हैं। 

आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, केरल, राजस्थान, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में वैट की दरें काफी अधिक (25% से 30% से ज्यादा) हैं और कुछ राज्य प्रति-लीटर के हिसाब से अतिरिक्त इंफ्रास्ट्रक्चर सेस भी वसूलते हैं। यही कारण है कि इन राज्यों के शहरों में आपको पेट्रोल और डीजल के लिए देश में सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ती है।

कितना बड़ा है टैक्स और वैट का बोझ?

पेट्रोल और डीजल की रिफाइनिंग और कच्चे तेल की लागत खुदरा कीमत का सिर्फ 35% से 45% ही होती है। आप पेट्रोल पंप पर जो कीमत चुकाते हैं, उसका 40 फीसदी से 55 फीसदी हिस्सा सीधे तौर पर टैक्स होता है। इसमें केंद्र सरकार का उत्पाद शुल्क (एक्साइज ड्यूटी) और राज्य सरकारों का वैट शामिल होता है। जब तेल का मूल मूल्य बढ़ता है, तो उस पर लगने वाले ऊंचे राज्य-स्तरीय टैक्स भी अंतिम कीमत को काफी बढ़ा देते हैं। पेट्रोल-डीजल की मौजूदा कीमतें इसी वजह से कुछ राज्यों में ज्यादा ऊंचे स्तर पर हैं।

पेट्रोल-डीजल की कीमतों में यह बढ़ोतरी कब तक जारी रह सकती है? 

विशेषज्ञों के मुताबिक, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में यह बढ़ोतरी अभी थमने वाली नहीं है और आने वाले दिनों में कीमतें और भी बढ़ सकती हैं। इसकी मुख्य वजह यह है कि हाल ही में की गई लगभग 7.5 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि तेल कंपनियों (ओएमसी) के भारी घाटे की पूरी तरह भरपाई करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

1. क्रिसिल इंटेलिजेंस के निदेशक सेहुल भट्ट ने एक मीडिया संस्थान को बताया कि हालिया बढ़ोतरी कंपनियों के मार्जिन को बहाल करने के बजाय केवल उनके बैलेंस शीट के दबाव को कम करने के लिए है। उन्होंने इसे एक तरह की नीतिगत स्वीकृति बताया है कि जो लागत कंपनियों ने झेली है, उसका असर अंततः कीमतों पर दिखना ही था।

2. वाणिज्यिक बैंकिंग कंपनी इक्रा (आईसीआरए) के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट और को-ग्रुप हेड (कॉर्पोरेट रेटिंग्स) प्रशांत वशिष्ठ ने हाल ही में कहा था कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में की गई बढ़ोतरी मामूली है। उनका अनुमान है कि अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें (105-110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास) ऊंची बनी रहती हैं, तो तेल कंपनियों को खुदरा कीमतों पर फिर से विचार करना होगा।

3. रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब तक ब्रेंट क्रूड तेल के दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के काफी नीचे आकर लंबे समय तक स्थिर नहीं हो जाते, तब तक कीमतों में पांचवीं बार बढ़ोतरी होने की पूरी संभावना है। दिग्गज बैंकर उदय कोटक ने भी भू-राजनीतिक अस्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ी बेहद जटिल समस्याओं को लेकर आगाह किया है।  


सरकार इस तेज बढ़ोतरी से निपटने के लिए क्या योजना बना रही है?

1. किस्तों में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी
केंद्र सरकार इस ईंधन संकट और कीमतों में तेज बढ़ोतरी से निपटने के लिए एक बहुआयामी रणनीति अपना रही है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, एकमुश्त बड़ी बढ़ोतरी से अर्थव्यवस्था और आम जनता पर बुरा असर पड़ सकता था। इसलिए सरकार धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाकर महंगाई दर पर इसके प्रभाव पर लगातार नजर रख रही है।

2. उत्पाद शुल्क में भारी कटौती
वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के महंगे के असर को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने अपने उत्पाद शुल्क में बड़ी कटौती की है। मार्च के अंत में पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की गई थी, जिससे सरकारी खजाने को सालाना करीब 1.7 लाख करोड़ रुपये की कमी होगी।  

3. राज्यों से वैट कम करने का आग्रह
केंद्र सरकार की तरफ से एक्साइज ड्यूटी घटाने के बाद अब उन राज्य सरकारों पर वैट कम करने का दबाव भी डाला जा रहा है, जो अभी भी 30% तक का भारी टैक्स वसूल रहे हैं।  
4. ईंधन संरक्षण की अपील
देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने और आयात बिल को कम करने के लिए, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से ईंधन बचाने की विशेष अपील भी की है। उन्होंने लोगों से कार पूलिंग अपनाने, सार्वजनिक परिवहन का ज्यादा इस्तेमाल करने और अनावश्यक यात्राओं से बचने का आग्रह किया है।  

5. राशनिंग पर सरकार का रुख
भले ही दुनिया के कई देशों में संकट के कारण ईंधन की राशनिंग शुरू हो गई हो, लेकिन भारत सरकार की फिलहाल पेट्रोल और डीजल की राशनिंग करने की कोई योजना नहीं है। हालांकि, घरों में इस्तेमाल होने वाली रसोई गैस (एलपीजी) की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कमर्शियल और इंडस्ट्रियल एलपीजी की आपूर्ति में कुछ हद तक राशनिंग की गई है।
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