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Explainer: 16 महीने बाद मिलेंगे मोदी-ट्रंप, पिछली मुलाकात के बाद से कितने बदल चुके हैं भारत-अमेरिका के रिश्ते?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Mon, 15 Jun 2026 08:53 AM IST
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सार

डोनाल्ड ट्रंप के जनवरी 2025 में राष्ट्रपति पद संभालने के बाद अमेरिका और भारत के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं। पहले ट्रंप प्रशासन की व्यापार, टैरिफ की नीति और इसके बाद ईरान युद्ध की वजह से भारत के अमेरिका से रिश्तों को परोक्ष रूप से नुकसान पहुंचा है। ऐसे में जी-7 शिखर सम्मेलन से इतर होने वाली ट्रंप-मोदी की बैठक में कई ऐसे मुद्दों पर चर्चा हो सकती है, जिन पर दोनों नेताओं की 16 महीने पहले हुई बैठक में सहमति बनी थी। 

PM Narendra Modi to meet US President Donald Trump know how US India relations went Up and Down G7 Summit Meet
जी7 सम्मेलन से इतर पीएम मोदी और ट्रंप करेंगे बातचीत। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच 17 जून (बुधवार) को फ्रांस में मुलाकात होनी है। ग्रुप ऑफ सेवेन (जी-7) सम्मेलन के इतर होने वाली इस बैठक पर भारत-अमेरिका के साथ-साथ दुनियाभर की नजरें रहेंगी। दरअसल, दोनों ही नेता फरवरी 2025 में मुलाकात के करीब 16 महीने बाद अब बैठक करने वाले हैं। पहली बैठक के बाद से अब तक दोनों ही देशों के रिश्तों से लेकर वैश्विक स्तर पर भी कई चीजों में बड़ा बदलाव आया है। 


ऐसे में यह जानना अहम है कि 12 फरवरी 2025 को ट्रंप और मोदी की पहली बैठक के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में कितना बदलाव आया है? इस दौरान अमेरिका-भारत के मुद्दे क्या रहे हैं? किन-किन बातों पर दोनों देशों में विवाद की स्थिति पैदा हुई है? इस दौरान पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच आपसी रिश्ते कैसे रहे हैं? अब जब दोनों नेताओं की जी7 के इतर बैठक होगी तो किन मुद्दों को लेकर चर्चा तय है? आइये जानते हैं...
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पहले जानें- मोदी-ट्रंप की पिछली बैठक में क्या हुआ था?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच पिछली बैठक फरवरी 2025 में वॉशिंगटन के व्हाइट हाउस में हुई थी। इस मुलाकात को ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों की एक मजबूत शुरुआत के रूप में देखा गया था। 

1. कॉम्पैक्ट पहल का शुभारंभ
इस बैठक की सबसे अहम घोषणा अमेरिका-भारत कॉम्पैक्ट (Catalyzing Opportunities for Military Partnership, Accelerated Commerce & Technology) नाम की एक नई पहल की शुरुआत थी। इस समझौते का मकसद रक्षा सहयोग और विनिर्माण को बढ़ावा देना और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना था।

2. व्यापार और आर्थिक साझेदारी पर चर्चा
दोनों नेताओं के बीच ट्रंप के पारस्परिक व्यापार एजेंडे पर गहन चर्चा हुई। राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत के साथ अमेरिका के लगभग 46 अरब डॉलर के व्यापार घाटे को कम करने और अमेरिकी वस्तुओं पर भारतीय आयात कर को घटाने के विषय पर जोर दिया। इस दौरान दोनों देशों के बीच एक नए व्यापार समझौते की रूपरेखा की घोषणा भी की गई थी, हालांकि, इस पर शुरुआती विवाद और फिर ट्रंप की तरफ से टैरिफ लगाए जाने के बाद समझौते पर अभी तक अंतिम रूप से हस्ताक्षर नहीं हो पाए हैं। 

3. ऊर्जा और परमाणु सहयोग
बैठक में दोनों देशों ने तेल, गैस और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में व्यापार बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। सबसे खास बात यह रही कि इसमें भारत में अमेरिका की ओर से डिजाइन किए गए परमाणु मॉड्यूलर रिएक्टर विकसित करने की योजना को भी शामिल किया गया था।

4. कूटनीतिक और रक्षा समन्वय
राष्ट्रपति ट्रंप ने रक्षा, व्यापार, निवेश, बहुपक्षीय समन्वय और दोनों देशों के नागरिकों के बीच संबंधों को भविष्य के सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों के रूप में रेखांकित किया। 
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ट्रंप-मोदी की बैठक के बाद दोनों देशों के रिश्तों में कितना बदलाव आया है?

12 फरवरी 2025 की बैठक के दौरान एक मजबूत साझेदारी की उम्मीद साफ तौर पर दिखाई दी थी, जहां पीएम मोदी ने विश्वास जताते हुए कहा था कि दोनों देश मिलकर दोगुनी गति से काम करेंगे। हालांकि, इस बेहतर शुरुआत के बावजूद बाद के महीनों में आयात शुल्क, भारतीयों के वीजा के मुद्दे, ऑपरेशन सिंदूर, ईरान युद्ध के प्रभाव और भू-राजनीतिक बदलावों की वजहों से दोनों देशों के रिश्तों में तनाव और चुनौतियां सामने आई हैं।

1. व्यापारिक तनाव और आयात शुल्क
ट्रंप प्रशासन ने अल्पकालिक और लेन-देन वाला रवैया अपनाते हुए भारत समेत 70 से ज्यादा देशों पर 25% का टैरिफ लगा दिया। इसके अलावा, भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदना जारी रखने के कारण, अमेरिका ने भारत पर अतिरिक्त 25% (जिसे बाद में बढ़ाकर 50% कर दिया गया) का दंडात्मक शुल्क लगा दिया। हालाँकि अमेरिकी अदालतों ने इन शुल्कों को रद्द कर दिया, फिर भी एक व्यापक व्यापार समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच गतिरोध बना हुआ है।

2. पाकिस्तान के साथ अमेरिका की बढ़ती नजदीकियां
भारत के लिए सबसे बड़ी निराशा वॉशिंगटन की ओर से पाकिस्तान के साथ फिर से कूटनीतिक बातचीत शुरू करना रहा है। अमेरिका ने अप्रैल में भारत की आतंकवाद विरोधी कार्रवाइयों का समर्थन नहीं किया और ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान की अपील पर भारत से युद्ध रोकने की अपील करता रहा। इतना ही नहीं, पाकिस्तान की तरफ से ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित करने के बाद से अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस देश के साथ निजी स्तर पर रिश्तों को बढ़ाया। इसके अलावा पाकिस्तान की तरफ से कथित दुर्लभ खनिजों की अमेरिका को पेशकश और ट्रंप के क्रिप्टोकरेंसी साम्राज्य में दिलचस्पी दिखाने का भी उसे फायदा मिला और ट्रंप ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख को व्हाइट हाउस में आमंत्रित किया, जिससे नई दिल्ली की चिंताएं और बढ़ गईं।  

3. क्वाड और रणनीतिक अनिश्चितता
ट्रंप प्रशासन की तरफ से भारत पर व्यापारिक दबाव डालने और पाकिस्तान की ओर झुकाव दिखाने से क्वाड (भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के गठबंधन) की मूल भावना कमजोर हुई है। इससे भारत में यह संदेश गया है कि अमेरिका अपनी दीर्घकालिक हिंद-प्रशांत रणनीति के बजाय अल्पकालिक फायदों को ज्यादा प्राथमिकता दे रहा है। हालांकि, हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री ने जब भारत का दौरा किया तो उन्होंने क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक में भी हिस्सा लिया था। 

4. रिश्तों को सुधारने के प्रयास
इन तनावों के बावजूद दोनों देशों के नेता लगातार संपर्क में हैं। मई 2026 में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने रिश्तों को सुधारने के लिए भारत की यात्रा की, जहां दोनों देशों ने क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क (दुर्लभ खनिजों का समझौता) पर हस्ताक्षर किए। 



5. ईरान युद्ध और भारतीय नाविकों की मौत
अमेरिका-ईरान युद्ध और उसके कारण उपजे ऊर्जा संकट ने भारत को काफी प्रभावित किया है। हाल ही में ओमान के तट के पास एक वाणिज्यिक जहाज पर हुए अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत हो गई, जिसने रिश्तों में कड़वाहट घोल दी है। भारत ने इस घटना का कड़ा विरोध करते हुए अमेरिकी राजनयिकों को तलब किया है। हालांकि, अमेरिका की तरफ से इस घटना पर माफी मांगने या संवेदना जताने की जगह उल्टे जहाज के क्रू को ही इस घटना का जिम्मेदार करार दिया गया है और मनमाने तरीके से कार्रवाई को सही ठहराया गया है। 

बीते 16 महीने में कैसे रहे पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के आपसी रिश्ते?

ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान भारत-अमेरिका के बीच जो बेहतरीन व्यक्तिगत तालमेल और सौहार्दपूर्ण संबंध बने थे, उसी के आधार पर ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में भारत-अमेरिका संबंधों के और अधिक मजबूत होने की उम्मीद थी। हालांकि, अब तक ऐसा होता नहीं दिखा। इस बीच अमेरिका और भारत के बीच ही व्यापार और कूटनीतिक स्तर पर कई तनाव सामने आए हों, लेकिन पीएम मोदी और डोनाल्ड ट्रंप के बीच व्यक्तिगत तौर पर रिश्ते संतुलित ही रहे हैं।

व्यापारिक तनावों और भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, दोनों नेताओं ने एक-दूसरे से लगातार संपर्क बनाए रखा है। 2025 के बाद से अब तक दोनों के बीच फोन पर कम से कम आठ बार बातचीत हो चुकी है। इनमें फरवरी में एक व्यापार समझौते की रूपरेखा की घोषणा करने के लिए की गई कॉल और अप्रैल में अमेरिका-ईरान युद्ध को लेकर हुई 40 मिनट की लंबी बातचीत शामिल है। 


- डोनाल्ड ट्रंप का 24 मई 2026 का बयान

यूं तो दोनों के व्यक्तिगत संबंध अब तक अच्छे दिखते रहे हैं, लेकिन ट्रंप प्रशासन की तरफ से भारत पर लगाए गए दंडात्मक और कड़े आयात शुल्कों ने इन मजबूत व्यक्तिगत संबंधों के सामने कुछ हद तक एक असहज स्थिति पैदा कर दी है। इससे काफी हद तक यह स्पष्ट हुआ है कि बेहतरीन पर्सनल केमिस्ट्री होने के बावजूद ट्रंप के लिए उनके अमेरिका फर्स्ट और लेन-देन वाले रणनीतिक फैसले ज्यादा मायने रखते हैं। दूसरी ओर पीएम मोदी ने भी अलग-अलग मौकों पर ट्रंप के दावों को लेकर कई प्रतिक्रिया देने से परहेज किया है।

इसका एक उदाहरण बीते साल कनाडा में हुए जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान दिखा था, जब ट्रंप ने पीएम मोदी को व्हाइट हाउस आने के लिए आमंत्रित किया था। हालांकि, पीएम ने साफ तौर पर अपने पूर्व में तय कार्यक्रमों का हवाला देते हुए ट्रंप से अमेरिका जाकर मिलने में असमर्थता जता दी थी। 


 

जी-7 से इतर बैठक में किन मुद्दों को ट्रंप के सामने उठा सकते हैं मोदी?

दोनों नेताओं के बीच संवाद अभी भी प्राथमिकता पर है। इसी क्रम में पीएम मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप फ्रांस के एवियन में जी-7 शिखर सम्मेलन के मौके पर मुलाकात करने वाले हैं। फरवरी 2025 के बाद यह उनकी पहली व्यक्तिगत मुलाकात होगी, जिसमें व्यापार सौदे पर स्पष्टता और ईरान युद्ध जैसी अहम चिंताओं पर चर्चा होने की उम्मीद है। 

1. व्यापार समझौता और आयात शुल्क 
इस बैठक में व्यापार से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से छाए रहने की उम्मीद है। पीएम मोदी लंबित व्यापार समझौते की रूपरेखा पर अधिक स्पष्टता की मांग कर सकते हैं। खासकर ट्रंप प्रशासन की तरफ से मार्च 2026 में व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत भारत के खिलाफ अनुचित व्यापार प्रथाओं की जांच शुरू करने के फैसले को लेकर। यह जांच अमेरिकी व्यवसायों को नुकसान पहुंचाने वाले देशों की अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता और द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन का आकलन करने के लिए की जा रही है। इसके जरिए अमेरिका आने वाले समय में किसी व्यापार समझौते के बावजूद मित्र देश पर टैरिफ लगा सकेगा। ऐसे में भारत व्यापार समझौते के लिए इस तरह की जांच से पूरी तरह सुरक्षा की मांग कर रहा है। पीएम मोदी इसी मुद्दे को सख्ती से ट्रंप के सामने उठा सकते हैं।

इसके अलावा भारत की तरफ से रूस से तेल खरीदने के कारण अमेरिका की तरफ से जो टैरिफ लगाए गए हैं, पीएम मोदी उसका मुद्दा भी उठा सकते हैं। इन टैरिफ को भारत पहले ही दो देशों के रिश्तों में अमेरिका का दखल बताते हुए अनुचित और तर्कहीन करार दे चुका है।

2. अमेरिका-ईरान युद्ध और ऊर्जा सुरक्षा
पीएम मोदी ईरान युद्ध को लेकर वॉशिंगटन की भविष्य की योजनाओं के बारे में जानकारी मांग सकते हैं। इस युद्ध और संघर्ष के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में वैश्विक शिपिंग मार्ग बाधित हुए हैं, जिसका सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ रहा है। 

3. भारतीय नाविकों की मौत
ओमान के तट के पास वाणिज्यिक जहाज- एमटी सेट्टेबेलो पर अमेरिकी हमले में तीन भारतीय नाविकों की मौत का मुद्दा इस बैठक में बेहद अहम होगा। खासकर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की तीखी बयानबाजी के बाद दोनों देशों के बीच अविश्वास की स्थिति बढ़ी है। पीएम मोदी इस चिंता को व्यक्तिगत रूप से ट्रंप के सामने उठा सकते हैं। 

4. रक्षा सौदे और रणनीतिक सहयोग
हालिया तनावों से पहले, यह उम्मीद की जा रही थी कि इस बैठक में रक्षा मोर्चे पर कुछ नई घोषणाएं हो सकती हैं, जिनमें अमेरिकी जैवलिन मिसाइलों की खरीद पर चर्चा भी शामिल है। इसके साथ ही हाल ही में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा के दौरान तय हुआ क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क और तकनीकी नवाचार को आगे बढ़ाने पर भी बात हो सकती है। 

5. पाकिस्तान की ओर अमेरिका का झुकाव
पीएम मोदी इस बात को लेकर भी भारत की चिंताएं स्पष्ट कर सकते हैं कि अमेरिका की अल्पकालिक नीतियां और भारत-पाकिस्तान मामलों में उसका हस्तक्षेप भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक हितों के अनुकूल नहीं है। खासकर पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों के बावजूद ट्रंप प्रशासन का उसके समर्थन का मुद्दा बैठक के केंद्र में रह सकता है।
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