India-China Relations: दोस्ती की पिच पर चीन साथ मैच की तैयारी, ब्रिक्स 2026 से और परवान चढ़ेंगी उम्मीदें
चीन की विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने पहले ही कहा है कि उनका देश भारत में ब्रिक्स के आयोजन और इसे सफल बनाने का पूरी तरह समर्थन करता है। भारत ने भी चीन के इस वक्तव्य का स्वागत किया था।
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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के प्रोटोकॉल का पालन करते हुए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा का प्रयास नई दिल्ली ने तेज कर दिया है। ऐसा हुआ तो 12-13 सितंबर को ब्रिक्स शिखर सम्मेलन-2026 भारत और चीन के बीच में मधुरता की राह खोलेगा। शी जिनपिंग 2019 में महाबलिपुरम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ द्विपक्षीय संवाद के सात साल बाद यहां होंगे। विदेश मंत्रालय के सूत्र बताते हैं कि दोनों देशों के एनएसए में तमाम मुद्दों पर सहमति है। विदेश मंत्री एस जयशंकर और वांग यी दोनों चाहते हैं कि भारत और चीन के बीच आपसी चिंताओं का समाधान होना चाहिए। 27-28 जुलाई 2026 को विदेश सचिव विक्रम मिस्री बीजिंग के दौरे पर गए थे। मिस्री की यात्रा का मुख्य मकसद भारत और चीन के बीच में द्विपक्षीय संबंधों को सुधारना, व्यापार, कारोबार के अवसर को बढ़ावा देना, वास्तविक नियंत्रण रेखा क्षेत्र पर शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के प्रयास करना था। इस दौरान विक्रम मिश्री चीन के उप विदेश मंत्री हुआ चुनयिंग, सीपीसी के अंतरराष्ट्रीय विभाग के मंत्री सुन हैयान, सीपीपीसीसी के उप महासचिव होंग लियांग, ली वेनतांग से मिलकर लौटे हैं। माना जा रहा है कि विदेश सचिव का यह दौरा काफी सफल रहा।
विदेश मंत्री जयशंकर ने भी की समकक्ष वांग यी से बात
22 जुलाई को फिलीपींस (मनीला) में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने समकक्ष वांग यी से द्विपक्षीय चर्चा की। दोनों विदेश मंत्रियों की चर्चा में सीमा पर शांति और स्थिरता बनाए रखने, व्यापार के असंतुलन को तर्कसंगत बनाने, भारतीय बाजार को चीन के बाजार में सम्यक पहुंच बनाने देने, वैश्विक सप्लाई चेन को सरल बनाने, सीधी उड़ानों की बहाली, चीन और भारत के लोगों की आवाजाही बढ़ाकर आपसी विश्वास पर जोर देने जैसे विषयों पर चर्चा हुई। दोनों देशों के बीच में सीधी उड़ान सेवा, कैलाश मानसरोवर यात्रा और वीजा नियमों ढील देने के प्रयास हुए हैं। विदेश मंत्री जयशंकर का कहना है कि भारत और चीन के संबंध पारस्परिक सम्मान, पारस्परिक सहयोग, पारस्परिक विश्वास, पारस्परिक हितों की समझ और पारस्परिक संवेदनशीलता से स्थायित्व को पा सकते हैं।
जून 2026 में अजीत डोभाल से वांग यी चर्चा के बाद निकले रास्ते
22 जून 2026 को ब्रिक्स एनएसए की बैठक में भाग लेने के लिए चीन के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वांग यी दिल्ली में थे। इस दौरान उनकी अपने समकक्ष अजीत डोभाल से अलग से बात हुई थी। माना जा रहा है कि इस रचनात्मक चर्चा के बाद भारत और चीन के संबंधों में थोड़ी तेजी आने का रोड-मैप बना। ऐसा माना जा रहा है कि अजीत डोभाल, विदेश मंत्री एस जयशंकर दोनों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदल रही भू-राजनीतिक स्थिति को ध्यान में रखकर भारत-चीन संबंधों पर पारस्परिक जोर देने के पक्ष में है।
गलवां वैली के बाद बिगड़े रिश्ते
2020 में चीन के सैनिकों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा(एलएसी) के पास भारतीय क्षेत्र में आने की कोशिश की। इस दौरान दशकों बाद हुई हिंसक झड़प में दोनों देशों के सैनिकों को जान गंवानी पड़ी थी। भारत ने इसे चीन के साथ द्विपक्षीय स्तर पर बनी सहमति का उल्लंघन और अंतरराष्ट्रीय नियमों की चीन द्वारा अवहेलना बताया था। यह आपसी विश्वास पर आघात बताया और इसके कारण संबंध बहुत तल्ख हो गए थे। इससे पहले चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री के बीच में काफी अच्छा रिश्ता था। दोनों शिखर नेता औपचारिक और अनौपचारिक वार्ता की मेज साझा करते थे। 2019 में इस कायर्क्रम के तहत चीन के राष्ट्रपति ने महाबलिपुरम में हिस्सा लिया था। लेकिन गलवां वैली की झड़प के बाद जिनपिंग अब तक भारत नहीं आए।
प्रधानमंत्री 2025 में गए थे चीन
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 31 अगस्त से 1 सितंबर तक चीन के तियानजिन शहर में एससीओ शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने गए थे। इस दौरान प्रधानमंत्री की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन के साथ केमिस्ट्री ने खूब अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां बटोरी थी। 2020 में गलवां वैली विवाद के बाद प्रधानमंत्री मोदी पहली बार चीन गए थे, लेकिन इस यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच संवाद, आपसी सहयोग का वातावरण बनाने में काफी बढ़ावा मिला।
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बन रहे हैं तालमेल के रास्ते
2020 के बाद से भारत और चीन की लद्दाख क्षेत्र में अपने क्षेत्रों में सेनाएं तैनात हैं। भारत ने भी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों को तैनात कर रखा है। दोनों देशों के बीच में ऐसी तनावपूर्ण स्थिति 1962 के बाद आई। भारत और चीन अब दोनों इस पर सहमत हैं कि आपसी मतभेदों को विवाद का कारण नहीं बनने देना चाहिए। सीमा विवाद के मतभेदों को स्थाई शांति और स्थायित्व को ध्यान में रखते हुए सुलझाया जाना चाहिए। परस्पर विश्वास बहाली पर जोर देना चाहिए।