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हत्या के आरोपियों को बोनट पर बांधकर घुमाया: अब पुणे पुलिस को मानवाधिकार आयोग का नोटिस, क्या है पूरा मामला?
Wed, 05 Aug 2026 06:33 PM IST
राकेश कुमार
पीटीआई, पुणे।
पीटीआई, पुणे।
Published by: राकेश कुमार
Updated Wed, 05 Aug 2026 06:33 PM IST
सार
पुणे में हत्या के तीन आरोपियों को पुलिस वाहन के बोनट पर बांधकर घुमाने की घटना पर महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। आयोग ने इसे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन और पुलिस की बर्बर कार्रवाई बताते हुए राज्य सरकार व पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। मामले की जांच के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की गई है, जिसे एक सप्ताह में रिपोर्ट सौंपनी होगी।
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मानवाधिकार आयोग ने पुणे पुलिस के खिलाफ की कार्रवाई
- फोटो : @अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
महाराष्ट्र के पुणे में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। हत्या के एक मामले में गिरफ्तार तीन आरोपियों को पुलिस वाहन के बोनट पर बांधकर शहर में घुमाने का वीडियो सामने आने के बाद महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग ने इस पूरी घटना को बर्बर, अमानवीय और कानून के शासन के खिलाफ बताते हुए राज्य सरकार और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एएम बादर ने कहा कि किसी भी आरोपी को अदालत से दोषी ठहराए जाने से पहले इस तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित करना संविधान और मानवाधिकारों दोनों का उल्लंघन है। आयोग ने पूछा है कि क्या कानून लागू करने वाली एजेंसियां स्वयं कानून हाथ में ले सकती हैं?
आयोग ने अनुच्छेद 21 के उल्लंघन की बात कही
मानवाधिकार आयोग ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस की यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को मिले जीवन और गरिमा के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। आयोग के अनुसार, आरोपियों को वाहन के बोनट पर बांधकर घुमाना और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करना किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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भीड़ को हमला करने की छूट देने पर भी उठे सवाल
आयोग ने वायरल वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि आरोपियों को केवल बोनट पर नहीं बांधा गया, बल्कि कथित तौर पर भीड़ को उन पर हमला करने की भी छूट दी गई। इसके अलावा, मौके पर मौजूद बच्चों को पुलिस द्वारा धमकाने के आरोपों पर भी आयोग ने गंभीर चिंता जताई। आयोग ने कहा कि यदि ऐसा हुआ है तो यह बाल न्याय (जुवेनाइल जस्टिस) कानून की भावना के भी विपरीत है और बच्चों पर मानसिक रूप से नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
यह भी पढ़ें: डीपफेक और बाल शोषण पर घिरा मेटा: जुकरबर्ग ने सरकार से मांगी माफी; क्या छिन गया सेफ हार्बर का सुरक्षा कवच?
कश्मीर की घटना का भी किया उल्लेख
आयोग ने अपने आदेश में कश्मीर की उस चर्चित घटना का भी जिक्र किया, जिसमें एक व्यक्ति को सेना की गाड़ी के बोनट पर बांधकर घुमाया गया था। आयोग ने कहा कि उस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुआवजा देने का निर्देश दिया था। वर्तमान घटना भी मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला प्रतीत होती है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस, जांच समिति गठित
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), पुणे पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार, डीसीपी (जोन-3) मिलिंद मोहिते और भारती विद्यापीठ पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ निरीक्षक मानसिंह पाटिल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की जांच के लिए विशेष पुलिस महानिरीक्षक दत्ता कराले की अध्यक्षता में फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाई गई है। समिति को एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। जांच दल ने बुधवार को संबंधित पुलिस स्टेशन पहुंचकर अधिकारियों और अन्य लोगों के बयान भी दर्ज किए।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पुणे के भारती विद्यापीठ थाना क्षेत्र का है, जहां 17 वर्षीय एक युवक की हत्या के आरोप में पुलिस ने तीन युवकों को गिरफ्तार किया था। आरोप है कि गिरफ्तारी के बाद पुलिस उन्हें अपनी गाड़ी के बोनट पर बांधकर घटनास्थल और आसपास की सड़कों पर ले गई। वायरल वीडियो में आरोपियों को घुटनों के बल चलाया जाता और लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता दिखाई दिया। इसी मामले में अब आयोग ने कार्रवाई की है।
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आयोग के अध्यक्ष जस्टिस एएम बादर ने कहा कि किसी भी आरोपी को अदालत से दोषी ठहराए जाने से पहले इस तरह सार्वजनिक रूप से अपमानित करना संविधान और मानवाधिकारों दोनों का उल्लंघन है। आयोग ने पूछा है कि क्या कानून लागू करने वाली एजेंसियां स्वयं कानून हाथ में ले सकती हैं?
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आयोग ने अनुच्छेद 21 के उल्लंघन की बात कही
मानवाधिकार आयोग ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस की यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक व्यक्ति को मिले जीवन और गरिमा के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। आयोग के अनुसार, आरोपियों को वाहन के बोनट पर बांधकर घुमाना और उन्हें सार्वजनिक रूप से अपमानित करना किसी भी सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
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भीड़ को हमला करने की छूट देने पर भी उठे सवाल
आयोग ने वायरल वीडियो का हवाला देते हुए कहा कि आरोपियों को केवल बोनट पर नहीं बांधा गया, बल्कि कथित तौर पर भीड़ को उन पर हमला करने की भी छूट दी गई। इसके अलावा, मौके पर मौजूद बच्चों को पुलिस द्वारा धमकाने के आरोपों पर भी आयोग ने गंभीर चिंता जताई। आयोग ने कहा कि यदि ऐसा हुआ है तो यह बाल न्याय (जुवेनाइल जस्टिस) कानून की भावना के भी विपरीत है और बच्चों पर मानसिक रूप से नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
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कश्मीर की घटना का भी किया उल्लेख
आयोग ने अपने आदेश में कश्मीर की उस चर्चित घटना का भी जिक्र किया, जिसमें एक व्यक्ति को सेना की गाड़ी के बोनट पर बांधकर घुमाया गया था। आयोग ने कहा कि उस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने मुआवजा देने का निर्देश दिया था। वर्तमान घटना भी मानवाधिकारों के गंभीर उल्लंघन का मामला प्रतीत होती है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस, जांच समिति गठित
महाराष्ट्र राज्य मानवाधिकार आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक (डीजीपी), पुणे पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार, डीसीपी (जोन-3) मिलिंद मोहिते और भारती विद्यापीठ पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ निरीक्षक मानसिंह पाटिल को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मामले की जांच के लिए विशेष पुलिस महानिरीक्षक दत्ता कराले की अध्यक्षता में फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी बनाई गई है। समिति को एक सप्ताह के भीतर अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं। जांच दल ने बुधवार को संबंधित पुलिस स्टेशन पहुंचकर अधिकारियों और अन्य लोगों के बयान भी दर्ज किए।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पुणे के भारती विद्यापीठ थाना क्षेत्र का है, जहां 17 वर्षीय एक युवक की हत्या के आरोप में पुलिस ने तीन युवकों को गिरफ्तार किया था। आरोप है कि गिरफ्तारी के बाद पुलिस उन्हें अपनी गाड़ी के बोनट पर बांधकर घटनास्थल और आसपास की सड़कों पर ले गई। वायरल वीडियो में आरोपियों को घुटनों के बल चलाया जाता और लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से अपमानित किया जाता दिखाई दिया। इसी मामले में अब आयोग ने कार्रवाई की है।