पंजाब चुनाव: फिर हो सकता है अकाली और भाजपा का गठबंधन! अकाल तख्त जत्थेदार के बयान के बाद निकाले जा रहे ये मायने

Ashish Tiwari आशीष तिवारी
Updated Mon, 22 Nov 2021 03:03 PM IST

सार

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरीके से अकाली दल का हस्तक्षेप शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में है। उसके उसके बाद जिस तरीके से यह बयान आया है उससे राजनीतिक हलकों में इस बात के मायने निकाले जा रहे हैं कि अकाली दल इस मामले में थोड़ा सा केंद्र सरकार के प्रति नरम पड़ रहा है...
पंजाब चुनाव 2022: शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन
पंजाब चुनाव 2022: शिरोमणि अकाली दल और भाजपा गठबंधन - फोटो : PTI (File Photo)
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विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कृषि कानून बिल वापस लिए जाने की घोषणा के बाद श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पूरी कैबिनेट को धन्यवाद दिया है। सिखों की सुप्रीम संस्था श्री अकाल तख्त के जत्थेदार के इस बयान के बाद तमाम तरीके के मायने निकाले जाने लगे हैं। पंजाब के राजनीतिक विशेषज्ञों के मुताबिक इस बयान के बाद सुगबुगाहट यह भी है कि क्या वक्त आने पर पंजाब में एक बार फिर से अकाली और भाजपा कहीं एक रास्ते पर एक साथ भी आ सकते हैं।
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क्या अकाली दल पड़ गया है नरम?

पंजाब की राजनीति को बहुत बारीकी से समझने वाले राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगले साल होने वाले पंजाब के चुनावों से पहले श्री अकाल तख्त के जत्थेदार का यह बयान इस लिहाज से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि दो राजनीतिक दल एक रास्ते पर फिर से तो आगे बढ़ने की राह नहीं तलाश रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जिस तरीके से अकाली दल का हस्तक्षेप शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में है। उसके उसके बाद जिस तरीके से यह बयान आया है उससे राजनीतिक हलकों में इस बात के मायने निकाले जा रहे हैं कि अकाली दल इस मामले में थोड़ा सा केंद्र सरकार के प्रति नरम पड़ रहा है।


नरम पड़ने की वजह के पीछे पंजाब सरकार में पूर्व मंत्री रहे एक वरिष्ठ नेता का कहना है दरअसल जिस तरीके से हरसिमरत कौर बादल ने कृषि कानून के बिल मुद्दे पर भाजपा से न सिर्फ नाता तोड़ा था, बल्कि गठबंधन खत्म करके पंजाब में अलग चलने की घोषणा की थी वह राजनीतिक मायनों में अब अकाली दल को छोड़कर दूसरे अन्य राजनीतिक पार्टियों को माइलेज देने जैसा दिख रही है। यही वजह है कि इस संदेश से माना जा रहा है कि अकाली दल ने एक तरीके से अपरोक्ष रूप से संदेश देने की कोशिश की है कि वह केंद्र सरकार की बिल वापसी का समर्थन और धन्यवाद देती है। हालांकि राजनीतिक पार्टी अकाली दल का इस मामले में कोई भी भाजपा को समर्थन देने जैसा संदेश और इशारा सीधे तौर पर नहीं आया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि लेकिन श्री अकाल तख्त के जत्थेदार की ओर से आया बयान राजनीतिक हलकों में निश्चित तौर पर तमाम तरीके के मायने बताता है।

दलित सीएम बना कर कांग्रेस को मिला फायदा

दरअसल पंजाब में बीते कुछ समय से अचानक बदले हुए राजनीतिक घटनाक्रम से पंजाब की पूरी राजनीति का सीन बदलने लगा है। पंजाब की राजनीति में दखल रखने वाली एक पूर्व केंद्रीय मंत्री का कहना है कि जिस तरीके से अकाली दल और बसपा ने गठबंधन के बाद उप मुख्यमंत्री के पद पर दलित को बिठाने की बात की वह राजनीति की एक बड़ी चाल थी। वह सवाल उठाते हुए कहती हैं कि पंजाब में कांग्रेस ने चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर दलित राजनीति में एक बड़ा दांव खेला है और उसका फायदा पंजाब में होता हुआ उनको दिख रहा है। उनका कहना है सिर्फ दलित मुख्यमंत्री बनने से ही पंजाब में कांग्रेस को बढ़त नहीं मिल रही बल्कि मुख्यमंत्री की कार्यशैली और कार्यप्रणाली से भी चीजें बदलती हुई नजर आ रही हैं।

पूर्व मंत्री का कहना है कि ऐसे दौर में अकाली-भाजपा गठबंधन की कोई भी हैसियत पंजाब में नहीं दिखती और भाजपा तो कहीं पर स्टैंड भी नहीं करती है। वह कहती हैं कि जिस तरीके से भारतीय जनता पार्टी और बसपा ने सूबे का सबसे बड़ा पद दलित को न देने की बजाय उप मुख्यमंत्री बनाए जाने का वादा किया है, वह दर्शाता है कि उनकी प्राथमिकता में दलित कहीं पर नहीं टिकते हैं। अकाली और बसपा महज वोट लेने के लिए उपमुख्यमंत्री जैसे पद पर दलित को बिठाने की बात कर रही है। भाजपा तो हमेशा से अकालियों के साथ रही है कि ऐसे में उनकी भी प्राथमिकता में दलित कभी शामिल नहीं हुए।

पूर्व मंत्री कहती हैं कि दरअसल अकाल तख्त के जत्थेदार की ओर से दिया गया यह बयान निश्चित तौर पर यह इशारा करता है कि अकाली दल बैकफुट पर है और अब अकाली दल भाजपा से देर-सवेर गठबंधन की राह पर भी चलेगा। हालांकि वह कहती हैं अब इससे किसी भी तरीके का कोई राजनीतिक फायदा उनको मिलता हुआ नहीं दिखता। क्योंकि किसानों के लिए भाजपा और अकाली दल क्या राय रखते हैं या उनके बारे में क्या सोचते हैं यह स्पष्ट हो चुका है। उनके मुताबिक किसी कानून के वापस होने से कुछ नहीं होने वाला है जब तक कि प्रधानमंत्री किसानों के दूसरे मुद्दे पर सब कुछ साफ नहीं कर देते।
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