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'लोकतंत्र में सवाल पूछना बंद न हो': जान दांव पर लगी हो तो सरकार चुप क्यों? वांगचुक के समर्थन में बोले सिब्बल

Thu, 16 Jul 2026 02:09 PM IST
प्रशांत तिवारी पीटीआई, नई दिल्ली
पीटीआई, नई दिल्ली Published by: प्रशांत तिवारी Updated Thu, 16 Jul 2026 02:09 PM IST
सार

राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल ने सोनम वांगचुक के 18वें दिन के आमरण अनशन पर सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकार को विरोध कर रहे लोगों से संवाद करना चाहिए। सिब्बल ने महात्मा गांधी और अन्ना हजारे के आंदोलनों का उदाहरण देते हुए कहा कि बातचीत ही लोकतांत्रिक व्यवस्था का सबसे प्रभावी रास्ता है।

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Questioning must not stop in democracy Why government silent when life stake Sibal speaks in support Wangchuk
कपिल सिब्बल, सांसद, राज्यसभा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

नीट परीक्षा में हुई गड़बड़ी को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अनिश्चितकालीन अनशन कर रहे हैं। उनके इस अनशन और भूख हड़ताल को राज्यसभा सांसद और सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील कपिल सिब्बल का समर्थन मिला है। सिब्बल ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाते हुए कहा कि आज सोनम वांगचुक के आमरण अनशन का 18वां दिन है, लेकिन सरकार की ओर से अब तक बातचीत की कोई पहल नहीं की गई है।

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क्या सरकार को बातचीत की पहल नहीं करनी चाहिए?
कपिल सिब्बल ने कहा कि कोई व्यक्ति आखिर भूख हड़ताल पर क्यों बैठता है? महात्मा गांधी ने उपवास क्यों किए थे? जब भी यह महसूस हुआ कि सरकार अन्याय के रास्ते पर चल रही है, तब विरोध होना स्वाभाविक था। विरोध के कई तरीके होते हैं और उपवास भी उनमें से एक है। 
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आमरण अनशन पर बैठे व्यक्ति की बात क्यों नहीं सुनी जा रही?
उन्होंने कहा कि जब कोई व्यक्ति आमरण अनशन पर बैठता है और अपनी जान तक दांव पर लगा देता है, तो सरकार का दायित्व बनता है कि वह कम से कम उससे बातचीत का रास्ता अपनाए। लोकतंत्र में संवाद ही किसी भी विवाद का सबसे प्रभावी समाधान होता है। 
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अन्ना हजारे आंदोलन से सरकार ने क्या सीखा?
सिब्बल ने कहा कि मुझे अन्ना हजारे का आंदोलन याद है। जब भी अन्ना हजारे भूख हड़ताल पर बैठते थे और जन लोकपाल विधेयक को लेकर आंदोलन होता था, तब सरकार उनसे बातचीत करती थी। सरकार का काम लोगों की बात सुनना और उनकी समस्याओं का समाधान निकालना होता है। लेकिन जब ऐसी स्थिति आ जाए कि सरकार यह कहने लगे कि वह किसी की बात नहीं सुनेगी, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंताजनक है। आज भारतीय राजनीति ऐसे ही एक मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है।

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