Rahul Gandhi: '₹16500 करोड़ के सरकारी ठेके, बहुजन समाज को कितना हिस्सा?' राहुल बोले- सरकार के पास डाटा ही नहीं
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार के पास सार्वजनिक निर्माण ठेकों में एससी/एसटी और ओबीसी उद्यमियों की हिस्सेदारी का डेटा नहीं है, जो सामाजिक न्याय की नीतियों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है। आइए विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने देश में सार्वजनिक निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर ठेकों में दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के उद्यमियों की हिस्सेदारी को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के पास इस बात का कोई डाटा ही नहीं है कि इन वर्गों को कितने ठेके दिए गए।
16,500 करोड़ रुपये का कोई आंकड़ा मौजूद नहीं
राहुल गांधी ने फेसबुक पोस्ट के जरिए कहा कि उन्होंने पिछले साल दिए गए 16,500 करोड़ रुपये से अधिक के सार्वजनिक निर्माण ठेकों में एससी/एसटी और OBC उद्यमियों की भागीदारी का पता लगाने की कोशिश की, लेकिन जवाब बेहद चिंताजनक था। उन्होंने कहा कि सरकार के पास इस संबंध में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है।
राहुल गांधी ने लोकसभा में पूछा था सवाल
दरअसल, राहुल गांधी ने लोकसभा में अतारांकित प्रश्न संख्या 6264 के तहत आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय से पिछले पांच वर्षों में दिए गए ठेकों की संख्या और कुल मूल्य की जानकारी मांगी थी। इसके साथ ही उन्होंने यह भी पूछा था कि इनमें से कितने ठेके एससी/एसटी और ओबीसी स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए और क्या सरकार ने एससी/एसटी उद्यमों के लिए तय चार प्रतिशत लक्ष्य को पूरा किया है। उन्होंने ओबीसी उद्यमियों के लिए भी ऐसे लक्ष्य तय करने की योजना पर सवाल उठाया।
केंद्रीय मंत्री ने क्या दिया जवाब?
इस सवाल के जवाब में केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के राज्य मंत्री तोखन साहू ने बताया कि कुल ठेकों का डेटा तो उपलब्ध है, लेकिन एससी/एसटी और ओबीसी स्वामित्व वाले व्यवसायों को दिए गए ठेकों का कोई अलग ट्रैकिंग सिस्टम मौजूद नहीं है। उन्होंने कहा कि निर्माण ठेकों के लिए ऐसी ट्रैकिंग अनिवार्य नहीं है।
राहुल गांधी ने क्या आरोप लगाया?
राहुल गांधी ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार की नीति के मुताबिक लघु व मध्यम उद्यमों (MSME) से कम से कम 25 प्रतिशत सार्वजनिक खरीद होनी चाहिए, जिसमें SC/ST स्वामित्व वाले उद्यमों के लिए 4 प्रतिशत का प्रावधान है। लेकिन उन्होंने आरोप लगाया कि सबसे बड़े और लाभदायक सार्वजनिक निर्माण ठेकों में इस नीति को लागू नहीं किया जाता। उन्होंने इसे केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि एक ऐसा सिस्टम बताया जो जानबूझकर सामाजिक और आर्थिक न्याय को कमजोर करता है।
संसदीय आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में केंद्रीय सार्वजनिक निर्माण ठेकों की संख्या और उनका मूल्य लगातार बढ़ा है। सिर्फ 2025-26 में ही 8,402 ठेके दिए गए, जिनकी कुल कीमत 16,587 करोड़ रुपये रही।
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