{"_id":"6a4e6dd8503d4c893a07c9c0","slug":"rare-himalayan-flowering-plant-recorded-in-arunachal-after-158-years-2026-07-08","type":"story","status":"publish","title_hn":"Cyananthus Hookeri: 1867 के बाद भारत में पहली बार मिला दुर्लभ पौधा, वैज्ञानिक हुए हैरान; क्या है इसकी खासियत?","category":{"title":"India News","title_hn":"देश","slug":"india-news"}}
Cyananthus Hookeri: 1867 के बाद भारत में पहली बार मिला दुर्लभ पौधा, वैज्ञानिक हुए हैरान; क्या है इसकी खासियत?
Wed, 08 Jul 2026 09:03 PM IST
निर्मल कांत
पीटीआई, ईटानगर।
पीटीआई, ईटानगर।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 08 Jul 2026 09:03 PM IST
सार
Cyananthus Hookeri: अरुणाचल प्रदेश में 158 साल बाद एक दुर्लभ हिमालयी पौधे सैयान्थस हुकेरी की मौजूदगी की पुष्टि हुई है। लंबे इंतजार के बाद मिली इस खोज से वैज्ञानिकों को हिमालयी वनस्पतियों को समझने में नई मदद मिलेगी। हिमालयी जैव विविधता के संरक्षण के लिए यह बेहद अहम है। पढ़िए रिपोर्ट-
विज्ञापन
सैयान्थस हुकेरी
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में 158 साल बाद एक बेहद दुर्लभ फूल वाला हिमालयी पौधा 'सैयान्थस हुकेरी' मिला है। अधिकारियों ने बुधवार को बताया कि भारत में यह पौधा आखिरी बार 1867 में सिक्किम में देखा गया था। इसके बाद अब पहली बार इसकी पुष्टि हुई है।
यह पौधा आखिर मिला कहां?
अधिकारियों के अनुसार, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने तवांग जिले के मागो गांव के पास चुना घाटी में करीब 3,600 मीटर की ऊंचाई पर सर्वेक्षण किए। इस दौरान इस पौधे को खोजा गया। इस खोज की जानकारी अंतरराष्ट्रीय संरक्षण पत्रिका 'ओरिक्स' में प्रकाशित की गई है।
इस पौधे की खासियत क्या है?
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस पौधे में बैंगनी-नीले रंग के फूल खिलते हैं। भारत में इसे आखिरी बार 1867 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक जोसेफ डाल्टन हूकर ने सिक्किम में दर्ज किया था। यह पहली बार है, जब इस पौधे के अरुणाचल प्रदेश में मिलने की आधिकारिक पुष्टि हुई है।
विज्ञापन
सर्वे में कितने विकसित पौधे मिले?
सितंबर 2025 में किए गए सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों को इसके 50 से भी कम विकसित पौधे मिले। ये ऊंचे पहाड़ी घास वाले इलाकों और चट्टानी ढलानों पर उग रहे थे। इससे पता चलता है कि भारत में ये पौधे बहुत कम बचे हैं।
वैज्ञानिकों ने क्या चेतावनी दी?
वैज्ञानिकों ने कहा कि इस पौधे की संख्या बहुत कम है और यह बहुत छोटे इलाके में ही मिलता है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया है कि भारत में इसे लुप्त होने के खतरे वाली प्रजाति घोषित किया जाए।
यह पौधा और किन देशों में मिलता है?
अधिकारियों ने बताया कि यह पौधा भूटान, चीन और नेपाल के कुछ हिस्सों में भी मिलता है। लेकिन भारत में यह बहुत ही दुर्लभ है। यह अध्ययन भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वैज्ञानिक सुभजीत लाहिड़ी, मोनालिसा दास और सुधांशु शेखर दास ने किया।
ये भी पढ़ें: DRDO को बड़ी कामयाबी: पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल परीक्षण, स्वदेशी रक्षा तकनीक में अहम उपलब्धि हासिल
उपमुख्यमंत्री ने क्या कहा?
अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चाउना मीन ने इस खोज को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि 158 साल बाद तवांग में सैयान्थस हुकेरी का मिलना अरुणाचल प्रदेश की समृद्ध प्राकृतिक संपदा को दिखाता है। साथ ही यह बताता है कि हिमालय के नाजुक पर्यावरण को बचाने की जरूरत है।
यह खोज क्यों है इतनी अहम?
अरुणाचल प्रदेश पूर्वी हिमालय के उस इलाके का हिस्सा है, जिसे दुनिया में जैव विविधता के लिए जाना जाता है। यहां हजारों तरह के पौधे पाए जाते हैं, जिनमें कई बेहद दुर्लभ हैं और दुनिया में केवल यहीं मिलते हैं। अधिकारियों ने कहा कि इस नई खोज से साफ होता है कि अरुणाचल प्रदेश पौधों के संरक्षण और उन पर शोध के लिए बहुत अहम राज्य है।
विज्ञापन
यह पौधा आखिर मिला कहां?
अधिकारियों के अनुसार, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वैज्ञानिकों ने तवांग जिले के मागो गांव के पास चुना घाटी में करीब 3,600 मीटर की ऊंचाई पर सर्वेक्षण किए। इस दौरान इस पौधे को खोजा गया। इस खोज की जानकारी अंतरराष्ट्रीय संरक्षण पत्रिका 'ओरिक्स' में प्रकाशित की गई है।
विज्ञापन
इस पौधे की खासियत क्या है?
वैज्ञानिकों ने बताया कि इस पौधे में बैंगनी-नीले रंग के फूल खिलते हैं। भारत में इसे आखिरी बार 1867 में ब्रिटिश वनस्पति वैज्ञानिक जोसेफ डाल्टन हूकर ने सिक्किम में दर्ज किया था। यह पहली बार है, जब इस पौधे के अरुणाचल प्रदेश में मिलने की आधिकारिक पुष्टि हुई है।
विज्ञापन
सर्वे में कितने विकसित पौधे मिले?
सितंबर 2025 में किए गए सर्वेक्षण के दौरान वैज्ञानिकों को इसके 50 से भी कम विकसित पौधे मिले। ये ऊंचे पहाड़ी घास वाले इलाकों और चट्टानी ढलानों पर उग रहे थे। इससे पता चलता है कि भारत में ये पौधे बहुत कम बचे हैं।
वैज्ञानिकों ने क्या चेतावनी दी?
वैज्ञानिकों ने कहा कि इस पौधे की संख्या बहुत कम है और यह बहुत छोटे इलाके में ही मिलता है। इसलिए उन्होंने सुझाव दिया है कि भारत में इसे लुप्त होने के खतरे वाली प्रजाति घोषित किया जाए।
यह पौधा और किन देशों में मिलता है?
अधिकारियों ने बताया कि यह पौधा भूटान, चीन और नेपाल के कुछ हिस्सों में भी मिलता है। लेकिन भारत में यह बहुत ही दुर्लभ है। यह अध्ययन भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वैज्ञानिक सुभजीत लाहिड़ी, मोनालिसा दास और सुधांशु शेखर दास ने किया।
ये भी पढ़ें: DRDO को बड़ी कामयाबी: पिनाका लॉन्ग रेंज गाइडेड रॉकेट का सफल परीक्षण, स्वदेशी रक्षा तकनीक में अहम उपलब्धि हासिल
उपमुख्यमंत्री ने क्या कहा?
अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चाउना मीन ने इस खोज को भारत के लिए बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि 158 साल बाद तवांग में सैयान्थस हुकेरी का मिलना अरुणाचल प्रदेश की समृद्ध प्राकृतिक संपदा को दिखाता है। साथ ही यह बताता है कि हिमालय के नाजुक पर्यावरण को बचाने की जरूरत है।
यह खोज क्यों है इतनी अहम?
अरुणाचल प्रदेश पूर्वी हिमालय के उस इलाके का हिस्सा है, जिसे दुनिया में जैव विविधता के लिए जाना जाता है। यहां हजारों तरह के पौधे पाए जाते हैं, जिनमें कई बेहद दुर्लभ हैं और दुनिया में केवल यहीं मिलते हैं। अधिकारियों ने कहा कि इस नई खोज से साफ होता है कि अरुणाचल प्रदेश पौधों के संरक्षण और उन पर शोध के लिए बहुत अहम राज्य है।