रविशंकर प्रसाद: लालू के साथ सियासी पारी की शुरुआत, वकालत की, फिर बने पीएम मोदी के विश्वस्त मंत्री
भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी के बाद पहली कतार में खड़े अहम नेताओं में रविशंकर प्रसाद अहम स्थान रखते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्वस्त सलाहकारों में रविशंकर प्रसाद यूं ही अहम स्थान नहीं रखते, केंद्र सरकार पर विपक्ष का वार हो या फिर कानूनी मसलों पर विरोधियों के आरोप, भाजपा की प्रेस कांफ्रेंस में रविशंकर अक्सर तर्कों और दस्तावेजों के साथ जवाब देते नजर आते हैं।
पटना साहिब सीट से शत्रुघ्न सिन्हा का बागी होना रविशंकर प्रसाद के लिए अच्छा रहा। भाजपा ने सिन्हा का टिकट काट कर प्रसाद को लोकसभा चुनाव के मैदान में उतारा। कायस्थ बाहुल्य इस क्षेत्र में समाज ने सिन्हा को कम, प्रसाद को ज्यादा पसंद किया। प्रसाद जीते और राज्यसभा सदस्य पद से इस्तीफा दिया। अब वह 17वीं लोकसभा का हिस्सा हैं और पीएम मोदी ने एक बार फिर उन पर भरोसा जताते हुए कैबिनेट में जगह दी।
जेपी आंदोलन में उभरे, जेल भी गए, फिर वकालत की
30 अगस्त 1954 को पटना में जन्मे रविशंकर प्रसाद ने पटना विश्वविद्यालय से स्नातक, स्नातकोत्तर और फिर कानून की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान उन्होंने 1970 के दशक में लालू यादव के साथ छात्र नेता के तौर पर अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था। तब देश में इंदिरा गांधी की सरकार थी और छात्र नेता के तौर पर सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में प्रसाद ने बढ़-चढ़कर शिरकत की।
रविशंकर प्रसाद ने छात्र जीवन में 1974 के जेपी आंदोलन में हिस्सा लिया और आपातकाल के दौरान जेल यात्रा भी की। अपने कॉलेज के दिनों में वह पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ के सहायक महासचिव बने, जबकि उस वक्त लालू प्रसाद संघ के अध्यक्ष थे।
वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद साल 1980 से पटना हाई कोर्ट में वकालत की शुरुआत की। साल 1999 में उन्हें पटना हाई कोर्ट का वरिष्ठ अधिवक्ता बनाया गया, जबकि एक साल बाद वह सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हो गए।
अटल सरकार से मोदी सरकार तक कई मंत्रालयों का प्रभार
रविशंकर प्रसाद अटल सरकार से लेकर मोदी सरकार तक कई मंत्रालय संभाल चुके हैं। साल 2000 में उन्हें अटल सरकार ने कोयला एवं खनन राज्य मंत्री बनाया था, जबकि जुलाई 2002 में विधि एवं न्याय राज्य मंत्री का भी प्रभार दिया गया।
कानून राज्य मंत्री रहते हुए उन्हें फास्ट ट्रैक कोर्ट की प्रक्रिया में तेजी लाने का श्रेय जाता है। बाद में एनडीए सरकार में उन्हें सूचना और प्रसारण मंत्री भी बनाया गया। साल 2012 में बिहार से राज्य सभा सदस्य के रूप में तीसरी बार चुने गए। लोकसभा सांसद के तौर पर निर्वाचित होने के बाद उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दिया।