Supreme Court: मतदाता सूची से नाम कटे तो क्या होगा? सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की शक्ति पर उठाए गंभीर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने कहा कि वोटर लिस्ट से नाम कटने के गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं और चुनाव आयोग की शक्ति असीमित नहीं है। आयोग ने अपने फैसले का बचाव किया। आइए इस पूरे मामले को विस्तार से जानते हैं।
विस्तार
सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण कोई साधारण प्रक्रिया नहीं है। अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से बाहर हो जाता है, तो इसके गंभीर नागरिक परिणाम हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि किसी भी संवैधानिक संस्था की शक्ति असीमित नहीं हो सकती। यह टिप्पणी उन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आई, जिनमें चुनाव आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन को चुनौती दी गई है।
मामला क्या है?: चुनाव आयोग के फैसले पर सवाल
यह मामला उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट में कई याचिकाएं दायर की गई हैं। इन याचिकाओं में बिहार सहित कई राज्यों में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण को चुनौती दी गई है। मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह देखा कि क्या यह प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बने नियमों के अनुरूप है या नहीं। अदालत ने कहा कि अगर किसी प्रक्रिया से नागरिक अधिकार प्रभावित होते हैं, तो कानून के तय तरीके का पालन जरूरी है।
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क्या कानून से हटकर काम हो सकता है?
मुख्य न्यायाधीश ने धारा 21(2) का हवाला देते हुए पूछा कि जब कानून में मतदाता सूची संशोधन की स्पष्ट प्रक्रिया दी गई है, तो उससे हटकर काम कैसे किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि वोटर लिस्ट से नाम हटना किसी व्यक्ति के लोकतांत्रिक अधिकारों को सीधे प्रभावित करता है। जस्टिस बागची ने भी कहा कि कोई भी शक्ति अनियंत्रित नहीं हो सकती और वह न्यायिक समीक्षा से परे नहीं है।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि धारा 21(3) आयोग को एक अलग और स्वतंत्र शक्ति देती है। उनके मुताबिक, यह शक्ति नियमित या वार्षिक पुनरीक्षण से अलग है और इसमें आयोग को लचीलापन दिया गया है। उन्होंने कहा कि धारा 21(2) और 21(3) एक ही क्षेत्र में काम नहीं करतीं। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि आयोग मनमाने ढंग से काम नहीं कर सकता और उसे प्रक्रिया को न्यायसंगत, पारदर्शी और निष्पक्ष रखना होगा।
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दस्तावेजों को लेकर चिंता
अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब फॉर्म-6 में सात दस्तावेज तय हैं, तो विशेष गहन पुनरीक्षण में 11 दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं। जस्टिस बागची ने पूछा कि क्या चुनाव आयोग अपनी मर्जी से दस्तावेज जोड़ या घटा सकता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे बड़ी संख्या में लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटने का खतरा है और यह वयस्क मताधिकार के संवैधानिक अधिकार के खिलाफ हो सकता है।
इन याचिकाओं में प्रमुख याचिका गैर-सरकारी संगठन एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स की है। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि यह प्रक्रिया नागरिकता तय करने जैसी बनती जा रही है, जिससे मताधिकार छीना जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अंतिम फैसला नहीं सुनाया है और सुनवाई अभी जारी है। मामला अब आगे की तारीख पर सुना जाएगा।
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